संदर्भ
इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (Indian Council of Medical Research - ICMR) के एक अध्ययन ने भारत में बढ़ते एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (Antimicrobial Resistance - AMR) संकट की गंभीर तस्वीर सामने रखी है। अध्ययन के अनुसार, एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी ग्राम-नेगेटिव बैक्टीरिया (Antibiotic-resistant Gram-negative bacteria) से होने वाले संक्रमण अधिक जानलेवा होने के साथ-साथ उनके इलाज को महंगा भी बनाते हैं। हालांकि, भारत की एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस समस्या को केवल एंटीबायोटिक के अत्यधिक उपयोग तक सीमित नहीं किया जा सकता। देर से निदान, अस्पतालों में संक्रमण का प्रसार और कमजोर संक्रमण-नियंत्रण व्यवस्था भी इसके प्रमुख कारण हैं।
ग्राम-नेगेटिव बैक्टीरिया और कार्बापेनेम
- ग्राम-नेगेटिव बैक्टीरिया की कोशिका-भित्ति में पेप्टिडोग्लाइकैन की पतली परत और उसके बाहर लिपोपॉलीसैकराइड युक्त झिल्ली होती है। ग्राम स्टेनिंग (Gram Staining) में ये सामान्यतः गुलाबी या लाल दिखाई देते हैं। ये फेफड़ों, मूत्र मार्ग, घावों और रक्तप्रवाह में संक्रमण पैदा कर सकते हैं। ई. कोलाई (E. coli), क्लेबसिएला न्यूमोनिया (Klebsiella pneumoniae), एसीनेटोबैक्टर बॉमानी (Acinetobacter baumannii) और स्यूडोमोनास एरुगिनोसा (Pseudomonas aeruginosa) इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
- कार्बापेनेम (Carbapenems) गंभीर संक्रमणों के उपचार में इस्तेमाल होने वाली शक्तिशाली एंटीबायोटिक दवाएँ हैं और कई मामलों में इन्हें उपचार की अंतिम महत्वपूर्ण पंक्ति माना जाता है। जब बैक्टीरिया इन दवाओं के प्रति भी प्रतिरोधी हो जाते हैं, तो प्रभावी उपचार के विकल्प बेहद सीमित हो जाते हैं।
अध्ययन के चिंताजनक निष्कर्ष
- आईसीएमआर का यह अध्ययन अप्रैल 2022 से अप्रैल 2025 के बीच 20 तृतीयक देखभाल अस्पतालों (Tertiary-care Hospitals) में किया गया। चार प्रमुख रोगजनकों से जुड़े कार्बापेनेम-प्रतिरोधी संक्रमणों में मृत्यु का जोखिम लगातार अधिक पाया गया। ऐसे मरीजों में मृत्यु का सापेक्ष जोखिम 1.16 से 1.43 गुना अधिक था। अध्ययन में शामिल ग्राम-नेगेटिव संक्रमणों में 61 प्रतिशत से अधिक मामले कार्बापेनेम-प्रतिरोधी पाए गए।
- हालांकि, विशेषज्ञों के अनुसार प्रतिरोध को मृत्यु का एकमात्र कारण नहीं माना जा सकता। बीमारी की गंभीरता, उपचार शुरू होने का समय, संक्रमण के स्रोत पर नियंत्रण और मरीज की स्वास्थ्य स्थिति भी परिणामों को प्रभावित करती है। इसके अलावा, अस्पताल से जुड़े संक्रमण, चिकित्सकीय उपकरणों का इस्तेमाल, हाल की सर्जरी और संक्रमण-नियंत्रण में कमियाँ भी एएमआर को बढ़ावा देती हैं।
आर्थिक बोझ भी गंभीर
- एंटीबायोटिक प्रतिरोध का प्रभाव केवल मरीज की सेहत तक सीमित नहीं है। अध्ययन में दवाओं की लागत का आकलन जन औषधि योजना (Jan Aushadhi Scheme) के तहत उपलब्ध एंटीबायोटिक के आधार पर किया गया। इसमें आईसीयू, अस्पताल के बिस्तर, जांच, प्रक्रियाओं और अन्य उपचार खर्चों को शामिल नहीं किया गया। इसके बावजूद प्रतिरोधी संक्रमणों में एंटीबायोटिक की लागत 1.1 से 2 गुना अधिक पाई गई। वास्तविक आर्थिक बोझ इससे कहीं ज्यादा हो सकता है।
नई दवा नहीं, बेहतर रणनीति जरूरी
- अध्ययन में सेफ्टाजिडाइम-एविबैक्टम (Ceftazidime-avibactam) को कुछ प्रतिरोधी ई. कोलाई और क्लेबसिएला संक्रमणों में बेहतर परिणामों से जोड़ा गया। लेकिन यह अध्ययन ऑब्जर्वेशनल था, इसलिए इसे किसी दवा की श्रेष्ठता का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता। इसका संदेश स्पष्ट है कि उपचार के लिए नई और व्यापक एंटीबायोटिक पर निर्भरता बढ़ाने के बजाय बेहतर निदान जरूरी है।
- अध्ययन में 85 प्रतिशत से अधिक रक्तप्रवाह संक्रमण स्वास्थ्य सेवा से जुड़े पाए गए। यह अस्पतालों में संक्रमण-रोकथाम की व्यवस्था मजबूत करने की आवश्यकता दर्शाता है। इसके लिए हैंड हाइजीन (Hand Hygiene), चिकित्सा उपकरणों से जुड़े संक्रमणों की रोकथाम, अस्पताल की सफाई, सर्जिकल संक्रमण नियंत्रण और संक्रमण की निगरानी को प्राथमिकता देनी होगी।
आगे की राह
- भारत को एएमआर से निपटने के लिए इंटीग्रेटेड सर्विलांस (Integrated Surveillance), तेज और सटीक डायग्नोस्टिक्स (Diagnostics) तथा नियमित एंटीमाइक्रोबियल स्टुअर्डशिप (Antimicrobial Stewardship) को मजबूत करना होगा। नई एंटीमाइक्रोबियल दवाओं तक जिम्मेदार पहुँच भी जरूरी है, ताकि उनका प्रभाव लंबे समय तक बना रहे।
निष्कर्ष
- कार्बापेनेम प्रतिरोध भारत के लिए स्वास्थ्य और आर्थिक, दोनों दृष्टियों से गंभीर चुनौती है। हर बार पुरानी एंटीबायोटिक के विफल होने पर नई दवा तलाशना स्थायी समाधान नहीं है। संक्रमण की रोकथाम, समय पर निदान और मौजूदा एंटीबायोटिक दवाओं का विवेकपूर्ण उपयोग ही एएमआर के खिलाफ दीर्घकालिक रणनीति का आधार होना चाहिए।