फुटपाथ पर चलने के अधिकार और आजीविका के अधिकार के बीच संतुलन
संदर्भ
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सुरक्षित एवं अतिक्रमण-मुक्त फुटपाथ पर चलने के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दिए जाने के बाद कर्नाटक के बेंगलुरु विकास मंत्री कृष्णा बायरे गौड़ा ने ग्रेटर बेंगलुरु प्राधिकरण के अधीन पांच नगर निगमों में 10 दिवसीय सेफ फुटपाथ अभियान शुरू करने के निर्देश दिए। अभियान के तहत फुटपाथों से हजारों रेहड़ी-पटरी विक्रेताओं को हटाकर अतिक्रमण हटाया गया।
हालांकि इस पहल का व्यापक स्वागत हुआ, लेकिन इसने यह बहस भी छेड़ दी कि क्या यह कार्रवाई स्ट्रीट वेंडर्स (आजीविका की सुरक्षा एवं स्ट्रीट वेंडिंग का विनियमन) अधिनियम, 2014 के अनुरूप थी। यह अधिनियम पैदल यात्रियों के सुरक्षित आवागमन के अधिकार और स्ट्रीट वेंडर्स के आजीविका के अधिकार के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करता है।
स्ट्रीट वेंडर्स अधिनियम क्यों बनाया गया था?
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सुरक्षित फुटपाथ पर चलने के अधिकार को मौलिक अधिकार मान लेने का अर्थ यह नहीं है कि सार्वजनिक सड़कों पर स्ट्रीट वेंडिंग का कोई स्थान नहीं रह जाता।
वास्तव में, इस हालिया निर्णय से बहुत पहले ही सर्वोच्च न्यायालय अनेक मामलों में यह स्पष्ट कर चुका था कि स्ट्रीट वेंडिंग संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत संरक्षित एक वैध व्यवसाय (Legitimate Occupation) है। हालांकि न्यायालय ने यह भी कहा था कि जनहित में इस गतिविधि का नियमन किया जा सकता है।
इन निर्णयों की पृष्ठभूमि में एक सामान्य समस्या यह थी कि नगर निकाय और पुलिस बिना पूर्व सूचना दिए रेहड़ी-पटरी विक्रेताओं को हटाते थे, जिससे वर्षों से स्थापित उनकी आजीविका एक झटके में समाप्त हो जाती थी।
इसी प्रकार की मनमानी कार्रवाइयों को रोकने और स्ट्रीट वेंडिंग को विधिक ढांचे के भीतर विनियमित करने के उद्देश्य से स्ट्रीट वेंडर्स (आजीविका का संरक्षण एवं स्ट्रीट वेंडिंग का विनियमन) अधिनियम, 2014 बनाया गया। वस्तुतः यह न तो अतिक्रमण हटाने का कानून है और न ही यह स्ट्रीट वेंडर्स को सार्वजनिक स्थानों पर असीमित अधिकार प्रदान करता है।
इसका मूल उद्देश्य दो संवैधानिक हितों के बीच संतुलन स्थापित करना है -
नागरिकों का सुरक्षित एवं बाधारहित फुटपाथ पर चलने का अधिकार।
स्ट्रीट वेंडर्स का सम्मानपूर्वक आजीविका अर्जित करने का अधिकार।
इसी उद्देश्य से अधिनियम यह निर्धारित करता है कि किसी शहर में कौन, कहां और किन शर्तों पर सड़क किनारे व्यापार कर सकता है तथा किन परिस्थितियों में उसे हटाया या स्थानांतरित किया जा सकता है।
विक्रेताओं को हटाने के संदर्भ में अधिनियम के प्रावधान
टाउन वेंडिंग कमेटी (Town Vending Committee-TVC):
इस कानून का सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान टाउन वेंडिंग कमेटी (Town Vending Committee-TVC) का गठन है, जिसे पूरे कानून की आधारशिला माना जाता है।
इस समिति में प्रशासनिक अधिकारी, पुलिस, नगर नियोजन प्राधिकरण, स्थानीय निवासी तथा स्वयं स्ट्रीट वेंडर्स शामिल होते हैं।
समिति के कम-से-कम 40 प्रतिशत सदस्य स्ट्रीट वेंडर्स होने चाहिए, साथ ही महिलाओं और अन्य वंचित वर्गों का भी पर्याप्त प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
टाउन वेंडिंग कमेटी का पहला दायित्व शहर के सभी स्ट्रीट वेंडर्स का सर्वेक्षण करना होता है। इस सर्वेक्षण के माध्यम से यह निर्धारित किया जाता है कि वर्तमान में कौन-कौन लोग सड़क विक्रय कर रहे हैं और किन्हें आगे भी व्यापार करने की अनुमति दी जाएगी।
मौजूदा विक्रेताओं को विशेष संरक्षण:
अधिनियम इस पूरी प्रक्रिया के दौरान मौजूदा विक्रेताओं को विशेष संरक्षण भी प्रदान करता है। इसमें स्पष्ट प्रावधान है कि जब तक सर्वेक्षण पूरा न हो जाए और पात्र विक्रेताओं को सर्टिफिकेट ऑफ वेंडिंग जारी न कर दिया जाए, तब तक किसी भी स्ट्रीट वेंडर को न तो बेदखल किया जा सकता है और न ही उसका पुनर्वास किया जा सकता है। वस्तुतः यह प्रावधान इसलिए जोड़ा गया ताकि मनमाने ढंग से बेदखली की घटनाओं पर रोक लगाई जा सके।
सर्वेक्षण पूरा होने के बाद पात्र विक्रेताओं को सर्टिफिकेट ऑफ वेंडिंग जारी किया जाता है। यह प्रमाण-पत्र उन्हें निर्धारित स्थान और निर्धारित शर्तों के अंतर्गत व्यापार करने की आधिकारिक अनुमति देता है। हालांकि, इससे उन्हें सार्वजनिक भूमि पर स्वामित्व का अधिकार प्राप्त नहीं होता, बल्कि केवल अधिनियम के अनुरूप व्यापार करने की वैधानिक अनुमति मिलती है।
अधिनियम स्ट्रीट वेंडर्स को हटाने पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाता, बल्कि यह सुनिश्चित करता है कि ऐसी प्रत्येक कार्रवाई कानून में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार ही की जाए।
बेंगलुरु का सेफ फुटपाथ अभियान विवाद
बेंगलुरु में नगर निगमों ने स्ट्रीट वेंडर्स को हटाने की कार्रवाई ऐसे समय शुरू कर दी, जब अधिनियम के तहत आवश्यक संस्थागत व्यवस्था अभी तक पूरी तरह स्थापित नहीं हुई थी।
हालांकि बाद में कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने प्रभावित विक्रेताओं के पुनर्वास का आश्वासन दिया, लेकिन अधिनियम के अनुसार पहले टाउन वेंडिंग कमेटी का गठन होना चाहिए, जो वेंडिंग और नो-वेंडिंग जोन की पहचान करे। वर्तमान में बेंगलुरु में ऐसी समिति का गठन नहीं हुआ है।
सरकार द्वारा पुनर्वास का आश्वासन दिए जाने के बाद एक अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न भी सामने आया कि पुनर्वास किन विक्रेताओं का किया जाएगा?
स्ट्रीट वेंडर्स का कहना है कि दो वर्ष पुराने सर्वेक्षण के आधार पर निर्णय लेना उचित नहीं होगा और नए सिरे से सर्वेक्षण कराया जाना चाहिए।
वर्ष 2024 के सर्वेक्षण में बेंगलुरु में 27,665 स्ट्रीट वेंडर्स की पहचान की गई थी, जबकि विक्रेताओं का दावा है कि यह संख्या वास्तविकता से काफी कम है।
सरकारी आंकड़े भी इस दावे का समर्थन करते प्रतीत होते हैं। पूर्ववर्ती बृहत बेंगलुरु महानगर पालिका (BBMP) के अभिलेखों के अनुसार, प्रधानमंत्री स्वनिधि (PM SVANidhi) योजना के तहत लगभग 1.34 लाख स्ट्रीट वेंडर्स ऋण का लाभ प्राप्त कर चुके हैं। यह संख्या आधिकारिक सर्वेक्षण में दर्ज विक्रेताओं की संख्या से लगभग पांच गुना अधिक है।
निष्कर्ष
सर्वोच्च न्यायालय ने जहां नागरिकों के सुरक्षित और अवरोध-मुक्त फुटपाथ पर चलने के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में स्वीकार किया है, वहीं स्ट्रीट वेंडर्स अधिनियम, 2014 यह भी स्पष्ट करता है कि सार्वजनिक स्थानों को अतिक्रमण-मुक्त बनाने की प्रक्रिया स्ट्रीट वेंडर्स की आजीविका से जुड़े वैधानिक अधिकारों की अनदेखी करके नहीं अपनाई जा सकती।
अधिनियम का मूल दर्शन किसी एक अधिकार को दूसरे पर वरीयता देना नहीं, बल्कि पैदल यात्रियों के सुरक्षित आवागमन के अधिकार और स्ट्रीट वेंडर्स के सम्मानजनक आजीविका के अधिकार के बीच न्यायसंगत एवं संवैधानिक संतुलन स्थापित करना है।