संदर्भ
- गृह मंत्रालय के अधीन इंडियन साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर (I4C) द्वारा ब्लूटूथ आधारित विकेंद्रीकृत मैसेजिंग एप्लिकेशन BitChat से जुड़े GitHub रिपॉजिटरी हटाने का निर्देश डिजिटल स्वतंत्रता और राज्य की सुरक्षा चिंताओं के बीच संतुलन की बहस को फिर सामने लाता है। 23 जुलाई, 2026 को जारी आदेश में I4C ने GitHub को BitChat से संबंधित तीन रिपॉजिटरी हटाने को कहा, जिनमें एंड्रॉयड एप्लिकेशन और रिलीज फाइलें शामिल थीं। सरकार का कहना है कि ऐसे प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल अवैध गतिविधियों के समन्वय, निगरानी से बचने और सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़े प्रतिबंधों को दरकिनार करने के लिए किया जा सकता है।
- यह कार्रवाई ऐसे समय हुई है, जब विरोध प्रदर्शनों और संवेदनशील क्षेत्रों में इंटरनेट बंद होने के बाद पारंपरिक इंटरनेट से अलग वैकल्पिक संचार माध्यमों का उपयोग बढ़ा है।
क्या है बिटचैट और यह कैसे काम करता है?
- बिटचैट एक विकेंद्रीकृत (decentralised) पीयर-टू-पीयर मैसेजिंग एप्लिकेशन है, जो इंटरनेट या केंद्रीय सर्वर के बिना केवल ब्लूटूथ मैश नेटवर्क के जरिए काम करता है।
- बुनियादी ढांचे से स्वतंत्रता: पारंपरिक मैसेजिंग ऐप्स के विपरीत, जिन्हें सेंसर या बंद किया जा सकता है, बिटचैट भौतिक रूप से आसपास मौजूद डिवाइसों का उपयोग करके एक अस्थायी संचार नेटवर्क तैयार करता है।
- मल्टीपल हॉप्स तकनीक: इस व्यवस्था में हर डिवाइस क्लाइंट और सर्वर दोनों की तरह काम करती है। यह अपने दायरे में आने वाले अन्य उपकरणों को स्वतः खोजती है और कई चरणों (multiple hops) के माध्यम से संदेशों को आगे बढ़ाती है।
- उपयोग: इंटरनेट बंदी, प्राकृतिक आपदाओं या सीमित कनेक्टिविटी वाले क्षेत्रों में यह तकनीक संचार को बनाए रखने में सक्षम है।
I4C का आदेश और उसके आधार
- I4C द्वारा जारी आदेश में गिटहब को निर्देश दिया गया कि वह एंड्रॉयड ऐप और उसकी रिलीज फाइलों सहित तीन रिपॉजिटरी को तीन घंटे के भीतर हटाए। आदेश की अवहेलना करने पर आपराधिक कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई है।
- सरकार का तर्क है कि यह एप्लिकेशन बिना किसी उपयोगकर्ता पंजीकरण, फोन नंबर सत्यापन या केंद्रीकृत रिकॉर्डिंग के गुमनाम संचार की सुविधा देता है। अधिकारियों का मानना है कि यह तकनीकी ढांचा कानून प्रवर्तन एजेंसियों की वैध निगरानी में बड़ी बाधा पैदा करता है।
कानूनी पहलू: आईटी अधिनियम की धारा 79(3)(b) का दायरा
यह नोटिस सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 79(3)(b) और आईटी (मध्यस्थ दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 के नियम 3(1)(d) के तहत जारी किया गया है।
- सेफ हार्बर सुरक्षा: धारा 79(3)(b) के अनुसार, यदि किसी मध्यस्थ (intermediary) को सरकार या उसकी एजेंसी द्वारा सूचित किया जाता है कि उसके प्लेटफॉर्म पर मौजूद डेटा किसी अवैध गतिविधि के लिए इस्तेमाल हो रहा है, और वह तुरंत उसे हटाने में विफल रहता है, तो उसे मिलने वाली कानूनी सुरक्षा (safe harbour) समाप्त हो सकती है।
- प्रक्रिया पर सवाल: कानूनी विशेषज्ञों का पॉइंट यह है कि धारा 79 स्वयं सीधे तौर पर सामग्री ब्लॉक करने का अधिकार नहीं देती। आमतौर पर इंटरनेट सामग्री को ब्लॉक करने के लिए आईटी अधिनियम की धारा 69A और ब्लॉकिंग नियमों का उपयोग किया जाता है, जिसमें लिखित कारणों, सुनवाई और एक तय समीक्षा प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य होता है।
न्यायिक मिसालें और श्रेया सिंघल फैसले का महत्व
- डिजिटल अधिकारों की पैरोकारी करने वाले इस कार्रवाई को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर एक और प्रहार मान रहे हैं। इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ (2015) फैसले का बार-बार जिक्र हो रहा है।
- इस मामले में शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया था कि मध्यस्थों को सामग्री हटाने के निर्देश तभी दिए जा सकते हैं जब ऐसा आदेश किसी अदालत या उचित कानूनी प्रक्रिया के तहत काम कर रही एजेंसी द्वारा दिया गया हो। अदालत ने यह भी माना था कि इंटरनेट पर अभिव्यक्ति को वही संवैधानिक सुरक्षा प्राप्त है जो ऑफलाइन दुनिया में मिलती है, और अस्पष्ट कानून नागरिकों के मौलिक अधिकारों (अनुच्छेद 19(1)(a)) को कमजोर करते हैं।
इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन की आपत्तियां
- डिजिटल अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठन इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन (IFF) ने इस आदेश की तीखी आलोचना की है। IFF का कहना है कि किसी संचार उपकरण के संभावित दुरुपयोग की आशंका उस उपकरण को प्रतिबंधित करने का कोई वैध कानूनी आधार नहीं हो सकता।
- संगठन के अनुसार, आधी रात के करीब जारी किया गया यह नोटिस सुप्रीम कोर्ट द्वारा अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ (2020) मामले में निर्धारित आनुपातिकता (Proportionality) के सिद्धांत का भी उल्लंघन करता है। अनुराधा भसीन मामले में कोर्ट ने फैसला सुनाया था कि किसी भी प्रतिबंध की सीमा और उसका दायरा वास्तविक आपात स्थिति से निपटने के लिए आवश्यक स्तर के अनुरूप होना चाहिए, जिसमें क्षेत्रीय विस्तार, तात्कालिकता और अवधि जैसे पैमाने शामिल हैं।
आगे की राह
बिटचैट पर की गई यह कार्रवाई केवल एक ऐप को हटाने या साइबर सुरक्षा सुनिश्चित करने तक सीमित नहीं है। यह तकनीक और कानून के बीच उस जटिल संतुलन को उजागर करती है जहाँ एक ओर राज्य की प्राथमिकता राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना है, वहीं दूसरी ओर नागरिकों की निजता, डिजिटल स्वतंत्रता और संवाद का अधिकार दांव पर है। यह देखना अहम होगा कि तकनीकी प्लेटफॉर्म और न्यायपालिका आने वाले समय में इस नए डिजिटल विमर्श को किस दिशा में ले जाते हैं।