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ब्रिक्स : समावेशी वैश्विक व्यवस्था की तलाश में ग्लोबल साउथ की नई आवाज

संदर्भ 

  • विश्व व्यवस्था तेजी से बदल रही है। वैश्विक अर्थव्यवस्था में शक्ति का केंद्र धीरे-धीरे पारंपरिक पश्चिमी शक्तियों से आगे बढ़कर एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका की उभरती अर्थव्यवस्थाओं की ओर खिसक रहा है। इसी बदलती तस्वीर के बीच ब्रिक्स आज केवल उभरती अर्थव्यवस्थाओं का आर्थिक समूह नहीं, बल्कि वैश्विक शासन व्यवस्था को अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण, लोकतांत्रिक और संतुलित बनाने की आकांक्षा का एक महत्वपूर्ण मंच बन चुका है। विकास, वित्त, व्यापार, प्रौद्योगिकी, जलवायु परिवर्तन और लोगों के बीच संपर्क जैसे मुद्दों पर सहयोग के माध्यम से ब्रिक्स, ग्लोबल साउथ की आवाज को वैश्विक विमर्श में अधिक प्रभावी बनाने का प्रयास कर रहा है।
  • भारत के लिए वर्ष 2026 इस यात्रा में विशेष महत्व रखता है। भारत 1 जनवरी 2026 को चौथी बार ब्रिक्स की अध्यक्षता संभाल चुका है और 12-13 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी करेगा। भारत की अध्यक्षता का मार्गदर्शक विषय है— “सुदृढ़शीलता, नवाचार, सहयोग और सतत विकास के लिए निर्माण”। इसका उद्देश्य ब्रिक्स को केवल विमर्श के मंच के बजाय रचनात्मक, समाधान-केंद्रित और परिणामोन्मुख मंच के रूप में और मजबूत करना है।

चार देशों के समूह से 11 देशों का मंच

  • ब्रिक्स की शुरुआत वर्ष 2006 में ब्राजील, रूस, भारत और चीन के बीच राजनीतिक एवं आर्थिक सहयोग के मंच के रूप में हुई थी। वर्ष 2009 में रूस के येकातेरिनबर्ग में पहला ब्रिक शिखर सम्मेलन आयोजित हुआ। इसके पीछे 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट की महत्वपूर्ण भूमिका थी। इस संकट ने मौजूदा वैश्विक वित्तीय संस्थाओं की कमजोरियों को उजागर किया और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की अधिक प्रभावी भागीदारी की आवश्यकता को रेखांकित किया।

ब्रिक्स का उद्भव 

  • ‘ब्रिक’ (BRIC) संक्षिप्त नाम वर्ष 2001 में गोल्डमैन सैक्स द्वारा प्रकाशित ग्लोबल इकोनॉमिक्स पेपर ‘The World Needs Better Economic BRICs’ में गढ़ा गया था। इकोनॉमेट्रिक एनालिसिस के आधार पर इस शोध-पत्र में अनुमान लगाया गया था कि ब्राजील, रूस, भारत और चीन अगले पाँच दशकों के दौरान विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होंगे।
  • इन देशों की बढ़ती आर्थिक शक्ति और तीन महाद्वीपों में फैली उनकी विशाल भौगोलिक पहुँच ने उनके उभरते वैश्विक महत्व को रेखांकित किया। इसके बाद ब्रिक की अवधारणा एक औपचारिक समूह के रूप में विकसित हुई। वर्ष 2010 में दक्षिण अफ्रीका के शामिल होने के साथ ब्रिक का विस्तार होकर ब्रिक्स बन गया। यह बदलाव केवल विश्लेषकों द्वारा पहचाने गए एक आर्थिक समूह से आगे बढ़कर राजनीतिक, आर्थिक और विकासात्मक सहयोग के लिए एक औपचारिक मंच के रूप में इसके रूपांतरण को दर्शाता है।
  • वर्ष 2011 में दक्षिण अफ्रीका के शामिल होने के बाद ब्रिक, ब्रिक्स बना। इसके बाद जनवरी 2024 में मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात पूर्ण सदस्य बने और जनवरी 2025 में इंडोनेशिया 11वाँ पूर्ण सदस्य बना। 
  • आज ब्रिक्स में 11 देश - ब्राजील, चीन, मिस्र, इथियोपिया, भारत, इंडोनेशिया, ईरान, रूस, सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हैं। सामूहिक रूप से ये देश विश्व की लगभग 49.5 प्रतिशत आबादी, वैश्विक जीडीपी के 40 प्रतिशत और विश्व व्यापार के 26 प्रतिशत का प्रतिनिधित्व करते हैं। एशिया, अफ्रीका, मध्य पूर्व और लैटिन अमेरिका तक फैला यह समूह प्राकृतिक संसाधनों, बड़े बाजारों, जनसांख्यिकीय क्षमता और तकनीकी दक्षताओं का अनूठा संगम प्रस्तुत करता है।
  • ब्रिक्स का विस्तार केवल संख्या बढ़ने की कहानी नहीं है। इसके साथ ‘पार्टनर कंट्री’ यानी साझेदार देश की नई व्यवस्था भी विकसित हुई है। वर्ष 2025 में बेलारूस, बोलीविया, क्यूबा, कजाकिस्तान, मलेशिया, नाइजीरिया, थाईलैंड, युगांडा, उज़्बेकिस्तान और वियतनाम इस ढाँचे से जुड़े। इससे ब्रिक्स की पहुँच और व्यापक हुई तथा दक्षिण-दक्षिण सहयोग को नया आधार मिला।

ब्रिक्स का मूल लक्ष्य 

  • ब्रिक्स का मूल उद्देश्य ऐसी वैश्विक व्यवस्था के निर्माण में योगदान देना है जो अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण, लोकतांत्रिक, न्यायसंगत और संतुलित हो। यह विशेष रूप से संयुक्त राष्ट्र, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक और विश्व व्यापार संगठन जैसी संस्थाओं में उभरती अर्थव्यवस्थाओं के अधिक प्रभावी प्रतिनिधित्व की मांग करता रहा है।
  • समय के साथ इसका एजेंडा भी व्यापक हुआ है। आतंकवाद, जलवायु परिवर्तन, खाद्य एवं ऊर्जा सुरक्षा, कृषि, व्यापार, श्रम एवं रोजगार, दूरसंचार, स्वास्थ्य, प्रौद्योगिकी और वैश्विक वित्त जैसे मुद्दे अब इसके सहयोग के महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं।
  • इस अर्थ में ब्रिक्स किसी सैन्य गठबंधन के बजाय बहुपक्षीय सहयोग और नीति-समन्वय का मंच है, जहाँ अलग-अलग राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्थाओं वाले देश साझा हितों के आधार पर सहयोग की संभावनाएँ तलाशते हैं। 

भारत की अध्यक्षता : सहमति से समाधान तक 

  • भारत पहले 2012, 2016 और 2021 में ब्रिक्स की अध्यक्षता कर चुका है। प्रत्येक अध्यक्षता ने अपने समय की वैश्विक चुनौतियों और भारत की प्राथमिकताओं को प्रतिबिंबित किया।
  • 2012 में नई दिल्ली में आयोजित चौथे शिखर सम्मेलन का विषय था— “वैश्विक स्थिरता, सुरक्षा और समृद्धि के लिए ब्रिक्स साझेदारी”। इसमें वैश्विक शासन सुधार, सतत विकास, खाद्य एवं ऊर्जा सुरक्षा पर जोर दिया गया।
  • 2016 के गोवा शिखर सम्मेलन का विषय “उत्तरदायी, समावेशी और सामूहिक समाधान का निर्माण” था। आतंकवाद-रोधी सहयोग, व्यापार और नवाचार प्रमुख विषय रहे।
  • 2021 में भारत ने कोविड-19 के दौर में आभासी शिखर सम्मेलन की मेजबानी की। इसका विषय था— “ब्रिक्स@15: निरंतरता, मजबूती और सहमति के लिए ब्रिक्स देशों के बीच सहयोग”। स्वास्थ्य, डिजिटल प्रौद्योगिकी और आतंकवाद-रोधी सहयोग पर विशेष ध्यान दिया गया।
  • 2026 की अध्यक्षता इन अनुभवों को आगे बढ़ाते हुए सहमति, व्यावहारिक सहयोग और संस्थागत प्रभावशीलता पर जोर दे रही है। 

2026 : विचार से आगे, ठोस सहयोग की ओर 

  • भारत की अध्यक्षता में 25 शहरों में 350 से अधिक बैठकें और उच्चस्तरीय सहभागिताएँ आयोजित की गईं। विभिन्न मंत्रिस्तरीय बैठकों में कृषि, स्वास्थ्य, ऊर्जा, शहरी विकास, एमएसएमई, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं जैसे क्षेत्रों में अनेक पहल सामने आईं।
  • कृषि क्षेत्र में प्राकृतिक, जैविक और पुनर्स्थापनात्मक कृषि के लिए ब्रिक्स उत्कृष्टता केंद्रों, डिजिटल कृषि नेटवर्क और ब्रिक्स एग्रीन जैसे सहयोगी ढाँचों को आगे बढ़ाया गया। इससे कृत्रिम बुद्धिमत्ता, इंटरनेट ऑफ थिंग्स, भू-स्थानिक तकनीक और आँकड़ा विश्लेषण को कृषि से जोड़ने की दिशा मजबूत होगी।
  • स्वास्थ्य क्षेत्र में स्वस्थ जीवनशैली के लिए ब्रिक्स रोडमैप 2026-29, पारंपरिक, सहायक एवं एकीकृत चिकित्सा पर विशेषज्ञ कार्य समूह और मानसिक स्वास्थ्य के लिए प्रशिक्षण एवं उत्कृष्टता केंद्रों का नेटवर्क महत्वपूर्ण पहल हैं। मानसिक स्वास्थ्य क्षेत्र में भारत के निमहांस को समन्वय केंद्र बनाया गया है।
  • ऊर्जा एवं शहरी विकास में स्मार्ट ग्रिड और ऊर्जा भंडारण के लिए डिजिटल उत्कृष्टता केंद्र, ब्रिक्स अर्बन मोबिलिटी हब तथा जलवायु-सुदृढ़ शहरी अवसंरचना के स्वैच्छिक सिद्धांत महत्वपूर्ण हैं।
  • वहीं, आर्थिक सहयोग को मजबूत करने के लिए ब्रिक्स एमएसएमई सहयोग पोर्टल, ब्रिक्स स्टार्टअप नवाचार कोष, ब्रिक्स इनक्यूबेटर नेटवर्क और विज्ञान एवं अनुसंधान रिपॉजिटरी जैसी पहलों को आगे बढ़ाया गया है। वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं को अधिक मजबूत और विविध बनाने के लिए जीवीसी कार्ययोजना 2026-2030 तथा लॉजिस्टिक्स आपूर्ति-श्रृंखला सहयोग ढाँचा भी महत्वपूर्ण हैं।
  • सीमा शुल्क सहयोग, मानकीकरण और व्यापार सुगमता से संबंधित पहलों का उद्देश्य लेन-देन लागत कम करना, व्यापार को सरल बनाना और तकनीकी बाधाओं को घटाना है। 

बढ़ती शक्ति के साथ बढ़ती चुनौतियाँ 

  • ब्रिक्स की बढ़ती शक्ति के साथ उसकी चुनौतियाँ भी बढ़ी हैं। सदस्य देशों की राजनीतिक व्यवस्थाएँ, आर्थिक हित और विदेश नीति प्राथमिकताएँ काफी अलग हैं। भारत-चीन संबंधों में तनाव, रूस से जुड़े भू-राजनीतिक प्रश्न और पश्चिमी देशों के साथ विभिन्न सदस्यों के अलग-अलग संबंध सर्वसम्मति निर्माण को जटिल बना सकते हैं।
  • इसके अलावा, ब्रिक्स को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि विस्तार के साथ उसकी निर्णय क्षमता और संस्थागत प्रभावशीलता कमजोर न हो। केवल सदस्य संख्या और आर्थिक आकार बढ़ना पर्याप्त नहीं है; वास्तविक प्रभाव तभी पैदा होगा जब घोषणाएँ ठोस परियोजनाओं और परिणामों में बदलें।

आगे की राह 

  • भारत की अध्यक्षता के लिए सबसे बड़ी चुनौती ब्रिक्स की विविधता को उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि सामूहिक शक्ति में बदलना है। इसके लिए तीन प्राथमिकताएँ महत्वपूर्ण हैं — 
    • पहली, वैश्विक वित्तीय एवं शासन संस्थाओं में सुधार की आवाज को मजबूत करना
    • दूसरी, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वास्थ्य, कृषि और हरित ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में व्यावहारिक सहयोग बढ़ाना; और 
    • तीसरी, ग्लोबल साउथ के विकासशील देशों की वास्तविक आवश्यकताओं को ब्रिक्स के एजेंडे के केंद्र में रखना।
  • यदि ब्रिक्स व्यापार, तकनीक और वित्त से आगे बढ़कर जलवायु न्याय, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य, कौशल और सतत विकास के क्षेत्रों में ठोस परिणाम देने में सफल होता है, तो यह 21वीं सदी की वैश्विक व्यवस्था को आकार देने वाली महत्वपूर्ण शक्ति बन सकता है। 

निष्कर्ष  

  • ब्रिक्स की यात्रा चार उभरती अर्थव्यवस्थाओं के संवाद से शुरू होकर आज 11 देशों के व्यापक वैश्विक मंच तक पहुँच चुकी है। 49.5 प्रतिशत वैश्विक आबादी, 40 प्रतिशत वैश्विक जीडीपी और 26 प्रतिशत विश्व व्यापार का प्रतिनिधित्व करने वाला यह समूह अब वैश्विक दक्षिण की बढ़ती आर्थिक और राजनीतिक आकांक्षाओं का महत्वपूर्ण प्रतिबिंब है।
  • भारत की 2026 की अध्यक्षता ऐसे समय में हो रही है, जब विश्व को टकराव से अधिक सहयोग, प्रतिनिधित्व से अधिक समावेशन और घोषणाओं से अधिक परिणाम की आवश्यकता है। यदि भारत अपनी अध्यक्षता के दौरान विविध हितों के बीच सहमति बनाते हुए ब्रिक्स को व्यावहारिक और परिणामोन्मुख दिशा दे पाता है, तो ब्रिक्स केवल उभरती अर्थव्यवस्थाओं का समूह नहीं रहेगा, बल्कि अधिक संतुलित, समावेशी और बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था के निर्माण का प्रभावी माध्यम बन सकता है। 
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