संदर्भ
भारतीय राजनीति और नीतिगत हलकों में शिक्षा का मुद्दा एक बार फिर केंद्र के साथ-साथ राज्यों के पटल पर सबसे ऊपर आ गया है। हालिया युवा प्रदर्शनों और केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग के बीच, देश में शिक्षा की स्थिति, वित्तीय प्रतिबद्धताओं और शासन की प्राथमिकताओं पर गंभीर बहस छिड़ गई है। हाल ही में जारी एक व्याख्यात्मक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में शिक्षा क्षेत्र को मिलने वाले वित्तीय संसाधनों में निरंतर कमी दर्ज की गई है, जो नीतिगत प्राथमिकताओं पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगाती है।
केंद्र सरकार के बजट में शिक्षा की घटती हिस्सेदारी
- वित्तीय वर्ष 2013-14 (जब यूपीए सरकार का कार्यकाल था) में केंद्रीय बजट में शिक्षा मंत्रालय की हिस्सेदारी 4.6% थी, जो वर्ष 2025-26 के आते-आते घटकर मात्र 2.5% रह गई। यह तीव्र गिरावट इस बात का संकेत है कि पिछले एक दशक में केंद्र स्तर पर शिक्षा क्षेत्र को मिलने वाले वित्तीय आवंटन में प्राथमिकता घटाई गई है।
- यह स्थिति राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के उस दीर्घकालिक लक्ष्य के भी विपरीत प्रतीत होती है, जिसमें सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का 6% हिस्सा शिक्षा पर खर्च करने की बात कही गई है।
संवैधानिक ढांचा और राज्यों की भूमिका
भारतीय संघवाद (Federalism) में शिक्षा एक साझा उत्तरदायित्व वाला क्षेत्र है।
- समवर्ती सूची (Concurrent List): भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची की समवर्ती सूची के तहत शिक्षा को शामिल किया गया है। इसका अर्थ यह है कि इस विषय पर केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं।
- सहज वित्तीय उत्तरदायित्व: चूंकि शिक्षा की धुरी राज्यों के प्रशासनिक नियंत्रण और कार्यान्वयन पर टिकी है, इसलिए यह जानना अनिवार्य हो जाता है कि राज्य सरकारें अपने वित्तीय संसाधनों का कितना हिस्सा इस क्षेत्र पर व्यय कर रही हैं।
सकल नामांकन अनुपात (GER): राज्यों की असमान तस्वीर
माध्यमिक शिक्षा (कक्षा 9 से 12) के सकल नामांकन अनुपात (Gross Enrolment Ratio - GER) के आंकड़े देश के विभिन्न राज्यों में शिक्षा की पहुंच और गुणवत्ता की गहरी असमानता को उजागर करते हैं:
- सकल नामांकन अनुपात: किसी भी शैक्षिक स्तर पर अध्ययनरत कुल छात्रों की संख्या (आयु की परवाह किए बिना) को उस स्तर की आधिकारिक आयु वर्ग की कुल आबादी से भाग देकर 100 से गुणा करने पर जीईआर प्राप्त होता है।
- क्षेत्रीय विषमता: जहाँ एक ओर केरल का माध्यमिक जीईआर 94 है, वहीं बिहार का जीईआर केवल 45 है।
यह भारी अंतर स्पष्ट करता है कि बिहार जैसे राज्यों को बुनियादी शैक्षिक अधोसंरचना (Infrastructure) और नामांकन दरों में सुधार के लिए अभी एक लंबी दूरी तय करनी है, जिसके लिए पर्याप्त वित्तीय निवेश नितांत आवश्यक है।
राज्यों के बजट और व्यय के बदलते रुझान
राज्यों द्वारा शिक्षा पर किए जाने वाले खर्च का विश्लेषण करने पर कई रोचक और चिंताजनक तथ्य सामने आते हैं:
- औसत में गिरावट: वर्ष 2013-14 में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों का औसत शिक्षा व्यय उनके कुल बजट का लगभग 17% था, जो समय के साथ लगातार घटता गया है। यह प्रवृत्ति केंद्र सरकार के बजट में आई गिरावट के समानांतर ही है।
- बिहार और दिल्ली: ये दोनों क्षेत्र अपने कुल बजट का एक बड़ा हिस्सा शिक्षा पर आवंटित करने के लिए जाने जाते हैं, हालांकि 2025-26 से पूर्व के वर्षों की तुलना में हालिया स्तरों में कुछ बदलाव आए हैं।
- पारंपरिक राज्य: तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों में, जो साक्षरता के मामले में अग्रणी माने जाते हैं, शिक्षा पर बजट का हिस्सा राष्ट्रीय औसत से कम रहा है। तमिलनाडु लंबे समय तक औसत के आसपास रहा, जबकि केरल ने कोविड-19 महामारी (2020) तक राष्ट्रीय औसत से अधिक खर्च किया, किंतु उसके बाद इसमें कमी आई। गुजरात का व्यय भी अधिकांश समय राष्ट्रीय औसत से नीचे ही दर्ज किया गया है।
- दिल्ली का अपवाद: इस व्यापक गिरावट के दौर में दिल्ली एक प्रमुख अपवाद के रूप में उभरी है। आम आदमी पार्टी (AAP) के शासनकाल (2014-15 से 2024-25) के दौरान दिल्ली सरकार ने शिक्षा और स्वास्थ्य को अपनी शीर्ष प्राथमिकताओं में रखा, जिसके परिणामस्वरूप शिक्षा पर खर्च की हिस्सेदारी में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई जो कि राष्ट्रीय स्तर पर गिरते रुझान के बिल्कुल उलट थी।
नीतिगत निहितार्थ
- वर्तमान परिदृश्य यह इंगित करता है कि भारत की सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली एक दोराहे पर खड़ी है। जहाँ एक ओर नीति निर्माताओं द्वारा ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था (Knowledge Economy) के निर्माण के दावे किए जाते हैं, वहीं दूसरी ओर केंद्र और अधिकांश राज्य सरकारों के बजट में शिक्षा की हिस्सेदारी का लगातार कम होना इन दावों के क्रियान्वयन पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
- सतत विकास लक्ष्य (SDG-4) और समावेशी विकास की प्राप्ति के लिए यह अनिवार्य है कि संघ और राज्य दोनों स्तरों पर वित्तीय संसाधनों के आवंटन को प्राथमिकता दी जाए। जब तक शिक्षा में सार्वजनिक निवेश को पर्याप्त रूप से बढ़ाया नहीं जाता, तब तक क्षेत्रीय असमानताओं को पाटना और जनसांख्यिकी लाभांश (Demographic Dividend) का सही उपयोग करना एक कठिन चुनौती बना रहेगा।