सीबीएसई के 10 जुलाई को जारी परिपत्र के अनुसार, यदि कोई विद्यार्थी बोर्ड परीक्षा वाले वर्ष में इस आंतरिक मूल्यांकन में सफल नहीं हो पाता है, तो विद्यालय अंतिम परीक्षा परिणाम घोषित होने से पहले उसका पुनर्मूल्यांकन कराएगा, ताकि वह आवश्यक योग्यता प्राप्त कर सके।
बोर्ड ने कक्षा 9 के विद्यार्थियों के लिए भी विशेष व्यवस्था की है। यदि कोई विद्यार्थी विद्यालय-आधारित आर-3 मूल्यांकन में उत्तीर्ण नहीं हो पाता, तो भी उसे शैक्षणिक सत्र 2027-28 के लिए कक्षा 10 में पदोन्नत कर दिया जाएगा। हालांकि, कक्षा 10 में अध्ययन के दौरान उसे कक्षा 9 की लंबित आर-3 मूल्यांकन प्रक्रिया सफलतापूर्वक पूरी करनी होगी।
यह परिपत्र 29 जून को जारी सीबीएसई के पूर्व निर्देशों के क्रम में जारी किया गया है। उन निर्देशों के अनुसार कक्षा 6 से तीन-भाषा सूत्र लागू किया गया है, जिसके अंतर्गत प्रत्येक विद्यार्थी को तीन भाषाओं का अध्ययन करना होगा। इनमें से दो भाषाओं का भारतीय होना अनिवार्य है।
कक्षा 7, 8 और 9 के वे विद्यार्थी, जिन्होंने पहले ही अंग्रेज़ी के अतिरिक्त किसी विदेशी भाषा का चयन किया है, वे उस विदेशी भाषा का अध्ययन जारी रख सकेंगे। इसके साथ ही उन्हें भारत की एक तीसरी भाषा का अध्ययन भी करना होगा।
तीन-भाषा नीति से संबंधित सीबीएसई के परिपत्रों को न्यायालय में चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं ने मांग की है कि सीबीएसई 9 अप्रैल की अपनी पूर्व स्थिति को पुनः लागू करे, जिसके अनुसार कक्षा 9 में तीसरी भाषा को अनिवार्य बनाने का निर्णय शैक्षणिक सत्र 2029-30 तक स्थगित कर दिया गया था।
13 जुलाई को न्यायालय में दाखिल नौ पृष्ठों के प्रतिशपथ-पत्र (काउंटर एफिडेविट), जिसकी प्रति द हिंदू को प्राप्त हुई है, में शिक्षा मंत्रालय ने इस नीति का समर्थन किया है। उच्चतम न्यायालय द्वारा 27 मई 2026 को जारी नोटिस के बाद, स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग के अवर सचिव सुभाष चंद ने केंद्र सरकार की ओर से यह जवाब प्रस्तुत किया।
केंद्र सरकार ने अपने प्रतिशपथ-पत्र में कहा है कि भारतीय संविधान की समवर्ती सूची में शिक्षा का विषय शामिल है। इसलिए राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 के प्रावधानों को लागू करने की जिम्मेदारी केंद्र और राज्य सरकारों की समान रूप से साझा जिम्मेदारी है।
सरकार का कहना है कि तीन-भाषा सूत्र का कार्यान्वयन व्यापक जनहित से जुड़ा है। इसके माध्यम से बहुभाषिकता को बढ़ावा देना, भारतीय भाषाओं का संरक्षण, विद्यार्थियों के संज्ञानात्मक (बौद्धिक) विकास को प्रोत्साहित करना तथा राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक विविधता जैसे संवैधानिक मूल्यों को सुदृढ़ करना प्रमुख उद्देश्य हैं।
केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) ने वर्ष 1929 से अब तक उल्लेखनीय विकास और विस्तार किया है। स्थापना के समय इसका नाम बोर्ड ऑफ हाई स्कूल एंड इंटरमीडिएट एजुकेशन, राजपूताना था। वर्ष 1952 में इसका वर्तमान नाम केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) रखा गया। इसके पश्चात 1962 में बोर्ड का पुनर्गठन किया गया।
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