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विकासशील देशों में जलवायु न्याय एवं वित्तीय चुनौतियां : UN रिपोर्ट

(प्रारंभिक परीक्षा: समसामयिक घटनाक्रम)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र-3: पर्यावरण संरक्षण, प्रदूषण एवं जैव विविधता)

संदर्भ

संयुक्त राष्ट्र (UN) की नई रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए वर्तमान में उपलब्ध धन से लगभग 12 गुना अधिक वित्तीय सहायता की आवश्यकता है। 

UN रिपोर्ट के बारे में

  • यह रिपोर्ट "Running on Empty" नाम से अक्टूबर 2025 में जारी की गई है, जो आगामी जलवायु सम्मेलन (COP-30) से पहले प्रकाशित की गई है।
    • COP-30 का आयोजन 10-21 नवंबर 2025 को बेलेम, ब्राजील में किया जाएगा।
  • रिपोर्ट के अनुसार, जलवायु परिवर्तन से जुड़ी आपदाओं, जैसे बाढ़, सूखा, गर्मी की लहरें और समुद्री जलस्तर में वृद्धि से निपटने के लिए विकासशील देशों को भारी निवेश की जरूरत है। 
  • लेकिन इन देशों को जो अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सहायता मिल रही है, वह उनकी जरूरतों के मुकाबले बहुत कम है।

मुख्य बिंदु

  • रिपोर्ट के अनुसार, विकासशील देशों को वर्ष 2035 तक हर साल 310 से 365 अरब डॉलर (लगभग 27 लाख करोड़) की आवश्यकता होगी।
  • वर्ष 2023 में इन्हें मात्र 26 अरब डॉलर (लगभग 2.2 लाख करोड़) ही मिले।
  • यह अंतर लगभग 12 गुना है।
  • COP-26 (ग्लासगो, स्कॉटलैंड, यूनाइटेड किंगडम) में तय किया गया था कि वर्ष 2025 तक अनुकूलन (adaptation) के लिए वित्तीय सहायता को $40 अरब डॉलर तक दोगुना किया जाएगा, लेकिन यह लक्ष्य भी अब तक अधूरा है।

प्रमुख चिंताएँ

रिपोर्ट बताती है कि जो धन अब तक दिया जा रहा है, उसका बड़ा हिस्सा ऋण (debt) के रूप में है, न कि अनुदान (grant) के रूप में।

  • वर्ष 2022-23 में 70% सहायता रियायती ऋण थी, लेकिन कुल वित्त प्रवाह में 58% हिस्सा कर्ज का था।
  • इससे कई गरीब और छोटे द्वीपीय देश (SIDS) कर्ज के जाल में फँस सकते हैं।
  • इन देशों ने जलवायु संकट में बहुत कम योगदान दिया है, लेकिन असर सबसे अधिक इन्हीं पर हो रहा है।

विकसित देश

  • विकसित देशों से अपेक्षा की जाती है कि वे ऐतिहासिक जिम्मेदारी निभाते हुए अधिक सहायता दें।
  • COP-29 (बाकू, अज़रबैजान) में विकासशील देशों ने $1.3 ट्रिलियन (1300 अरब डॉलर) वार्षिक सहायता की मांग की थी, लेकिन विकसित देशों ने केवल $300 अरब डॉलर पर सहमति दी।
  • आलोचकों का कहना है कि यह राशि भविष्य की महंगाई को ध्यान में नहीं रखती और न ही यह स्पष्ट करती है कि इसमें से कितना हिस्सा अनुकूलन के लिए होगा।

विकासशील देश

  • विकासशील देशों ने अपनी ओर से काफी तैयारी की है- 172 देशों ने जलवायु अनुकूलन योजनाएँ तैयार की हैं, लेकिन पर्याप्त वित्तीय सहायता न मिलने के कारण उनका क्रियान्वयन रुक गया है। 
  • सिविल सोसाइटी संगठनों का कहना है कि यह स्थिति “जलवायु न्याय” के विपरीत है।

चुनौतियाँ

  • बढ़ता हुआ जलवायु ऋण बोझ
  • वित्तीय असमानता
  • अंतरराष्ट्रीय वादों का अधूरा रहना
  • जलवायु आपदाओं से लगातार बढ़ता नुकसान

आगे की राह

  • विकसित देशों को अनुदान आधारित सहायता बढ़ानी होगी, न कि ऋण आधारित।
  • वैश्विक स्तर पर नई वित्तीय व्यवस्था की आवश्यकता है जो पारदर्शी और न्यायसंगत हो।
  • निजी क्षेत्र और बहुपक्षीय संस्थानों को भी अधिक योगदान देना चाहिए।
  • विकासशील देशों की स्थानीय जरूरतों के अनुरूप लचीली और सुलभ वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जानी चाहिए।

निष्कर्ष

अत: जलवायु परिवर्तन का खतरा अब केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि आर्थिक और सामाजिक असमानता का भी प्रश्न बन गया है। यदि वित्तीय अंतर जल्द नहीं भरा गया, तो दुनिया के सबसे कमजोर देश इस संकट की सबसे भारी कीमत चुकाएँगे।

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