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जलवायु-संवेदनशील (लचीला) अवसंरचना

संदर्भ

तेजी से बढ़ते वैश्विक तापमान और लगातार तीव्र होती चरम मौसमी घटनाओं के कारण जलवायु-संवेदनशील अवसंरचना का महत्व अत्यधिक बढ़ गया है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, आगामी लगभग 15 वर्षों में तापमान वृद्धि की 1.5 °C की सीमा पार होने की आशंका है जिससे भारत जैसे देशों के समक्ष जोखिम अधिक गंभीर हो सकते हैं। ऐसे परिदृश्य में जीवन, अर्थव्यवस्था व पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा हेतु मजबूत अवसंरचना का निर्माण अत्यावश्यक हो जाता है।

जलवायु-संवेदनशील अवसंरचना (Climate Resilient Infrastructure)

  • जलवायु-संवेदनशील अवसंरचना उन प्रणालियों को दर्शाती है जिन्हें इस प्रकार विकसित किया जाता है कि वे बाढ़, हीटवेव (ताप लहर) और तूफानों जैसे जलवायु जनित आघातों को सहन कर सकें, उनके अनुसार स्वयं को ढाल सकें तथा शीघ्र पुनर्स्थापित हो सकें।
  • इसमें अनुकूलन (Adaptation) व शमन (Mitigation) दोनों रणनीतियों का समावेश होता है जिससे दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित होती है, आर्थिक नुकसान कम होता है और समुदायों की सहनशीलता बढ़ती है। साथ ही, बदलती जलवायु परिस्थितियों में भी विकास की प्रक्रिया जारी रहती है। 

जलवायु-संवेदनशील अवसंरचना की विशेषताएँ 

ऐसी अवसंरचना को इस तरह डिज़ाइन एवं संचालित किया जाता है कि वह विभिन्न क्षेत्रों में जलवायु जोखिमों के बावजूद प्रभावी ढंग से कार्य करती रहे -

  • जोखिम का पूर्व आकलन (Risk Anticipation) : भविष्य में संभावित खतरों, जैसे- बाढ़, हीटवेव और समुद्र स्तर वृद्धि को ध्यान में रखते हुए योजना बनाई जाती है, ताकि दीर्घकालिक क्षति को कम किया जा सके।
  • मजबूती व टिकाऊपन (Durability) : निर्माण सामग्री एवं डिज़ाइन को इस प्रकार तैयार किया जाता है कि वे उच्च तापमान, भारी वर्षा व चक्रवात जैसी परिस्थितियों का सामना कर सकें तथा लंबे समय तक टिके रहें।
  • लचीला डिज़ाइन (Adaptive Design) : अवसंरचना को इस तरह बनाया जाता है कि समय के साथ उसमें आवश्यक बदलाव और उन्नयन आसानी से किए जा सकें तथा पूरी संरचना को दोबारा बनाने की आवश्यकता न हो।
  • वैकल्पिक व्यवस्थाएँ (Redundancy Systems) : विद्युत, जल एवं परिवहन के वैकल्पिक नेटवर्क उपलब्ध कराए जाते हैं ताकि आपदा के समय भी सेवाएँ बाधित न हों।
  • प्रारंभिक चेतावनी का समावेश (Early Warning Integration) : इन प्रणालियों को रियल-टाइम मौसम जानकारी और चेतावनी तंत्र से जोड़ा जाता है जिससे जोखिम कम होते हैं तथा आपदा के लिए तैयारी बेहतर होती है।
  • प्रकृति-आधारित उपाय (Nature-based Solutions) : मैंग्रोव, आर्द्रभूमि एवं हरित अवसंरचना का उपयोग बाढ़, कटाव व तापीय प्रभाव को कम करने के साथ-साथ जैव विविधता के संरक्षण में सहायक होता है।
  • संसाधनों का कुशल उपयोग (Resource Efficiency) : जल, ऊर्जा और अपशिष्ट प्रबंधन में दक्षता लाकर पर्यावरणीय दबाव को कम किया जाता है और स्थिरता को बढ़ावा मिलता है।
  • त्वरित पुनर्स्थापन क्षमता (Rapid Recovery Capacity) : आपदाओं के बाद सेवाओं को जल्द से जल्द बहाल करने की क्षमता विकसित की जाती है जिससे समय की बर्बादी और आर्थिक नुकसान दोनों कम होते हैं। 

भारत में जलवायु-संवेदनशील अवसंरचना 

भारत इस दिशा में विभिन्न नीतियों, कार्यक्रमों एवं निवेशों के माध्यम से आगे बढ़ रहा है। हालांकि, इसके क्रियान्वयन में वित्तीय, तकनीकी और प्रशासनिक चुनौतियाँ बनी हुई हैं :

  • वर्ष 1993 से 2022 के बीच भारत विश्व के सर्वाधिक प्रभावित देशों में छठे स्थान पर रहा, जहाँ 180 अरब डॉलर से अधिक का नुकसान दर्ज किया गया। यह मजबूत अवसंरचना की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
  • वैश्विक तापमान पहले ही 1.1°C तक बढ़ चुका है जिसके कारण चरम मौसम घटनाएँ अब टाली नहीं जा सकतीं हैं और विभिन्न क्षेत्रों की अवसंरचना पर दबाव बढ़ रहा है।
  • शहरी क्षेत्रों में 80% से अधिक आबादी जोखिम-प्रवण इलाकों में निवास करती है। वहीं 2050 तक वैश्विक स्तर पर अनुकूलन लागत 295 अरब डॉलर प्रतिवर्ष तक पहुँचने का अनुमान है।
  • वर्ष 2024 में चरम मौसम ने लगभग 40.7 लाख हेक्टेयर भूमि को प्रभावित किया, जो 2023 की तुलना में 84% अधिक है। यह सिंचाई व फसल सुरक्षा से जुड़ी अवसंरचना की कमियों को उजागर करता है।
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुमान के अनुसार, 2030 के दशक तक जलवायु परिवर्तन के कारण प्रतिवर्ष लगभग 2.5 लाख अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं जिससे स्वास्थ्य अवसंरचना को अधिक लचीला बनाना आवश्यक हो जाता है।
  • वर्ष 2050 तक विश्व स्तर पर लगभग 21.6 करोड़ लोगों के विस्थापित होने की संभावना है जिससे मजबूत आवास और शहरी ढाँचों की मांग बढ़ेगी।
  • भारत की राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना (NAPCC) में आठ प्रमुख मिशन शामिल हैं जिनके अंतर्गत लगभग 30 परियोजनाएँ चलाई जा रही हैं।
  • जल जीवन मिशन के माध्यम से 11.95 करोड़ ग्रामीण परिवारों को नल जल कनेक्शन प्रदान किए गए हैं जिससे जल संकट और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति उनकी क्षमता मजबूत हुई है।
  • आपदा प्रतिरोधी अवसंरचना गठबंधन (Coalition for Disaster Resilient Infrastructure: CDRI) पहल के तहत दूरसंचार क्षेत्र में लगभग 7.7 लाख टावरों को शामिल करते हुए आपदा के दौरान निर्बाध संचार सुनिश्चित करने हेतु एक ढाँचा विकसित किया गया है।
  • भारत की लगभग 7,500 किमी. लंबी तटरेखा का एक-तिहाई भाग कटाव के खतरे से प्रभावित है जिससे अवसंरचना, आजीविका और बस्तियों पर खतरा बढ़ रहा है।
  • वर्ष 2024 में दिल्ली जैसे शहरों में तापमान 46°C से अधिक दर्ज किया गया, जो ताप-संवेदनशील (Heat-Resilient) भवनों व बेहतर शहरी नियोजन की आवश्यकता को दर्शाता है।
  • वर्ष 2011 से 2024 के बीच हिमालयी ग्लेशियल झीलों में 10.81% की वृद्धि हुई है, जिससे बाढ़ का खतरा बढ़ गया है और निचले क्षेत्रों की अवसंरचना पर अतिरिक्त दबाव उत्पन्न हो रहा है। 

आपदा-प्रतिरोधी अवसंरचना गठबंधन (CDRI) के बारे में 

  • CDRI एक वैश्विक गठबंधन है जिसका उद्देश्य जलवायु परिवर्तन और आपदा जोखिमों के प्रति अवसंरचना की लचीलापन (Resilience) को मजबूत करना है। 
  • इसमें 53 सदस्य देश और 12 साझेदार संगठन शामिल हैं जिनमें राष्ट्रीय सरकारें, अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ एवं निजी क्षेत्र के व्यवसाय शामिल हैं। ये सभी मिलकर ज्ञान साझाकरण, अनुसंधान को बढ़ावा देने और आपदा-प्रतिरोधी अवसंरचना में निवेश के लिए सहयोग करते हैं।
  • इस गठबंधन के सदस्य देशों को वैश्विक विशेषज्ञता, वित्तीय संसाधन, तकनीकी सहायता, अनुसंधान के अवसर, नवाचारपूर्ण समाधान व अंतरराष्ट्रीय सर्वोत्तम प्रथाओं तक पहुंच प्राप्त होती है।
  • भारत के नई दिल्ली में स्थित CDRI का सचिवालय एक अंतर्राष्ट्रीय संगठन का दर्जा रखता है।
  • CDRI का लक्ष्य है कि वर्ष 2050 तक लगभग 10 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के नए व मौजूदा अवसंरचना निवेश और सेवाओं को प्राकृतिक आपदाओं एवं जलवायु परिवर्तन के प्रति अधिक लचीला बनाया जाए। इसके लिए क्षमता निर्माण, सूचित नीतियाँ, बेहतर योजना और प्रभावी प्रबंधन पर बल दिया जाएगा। 
  • इस प्रयास के माध्यम से वैश्विक स्तर पर 3 अरब से अधिक लोगों के पर्यावरणीय गुणवत्ता, आजीविका और समग्र जीवन स्तर में सुधार लाने का उद्देश्य रखा गया है।
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