संदर्भ
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने उस प्रावधान को असंवैधानिक एवं भेदभावपूर्ण मानते हुए निरस्त कर दिया है जिसके तहत तीन महीने से अधिक आयु के बच्चे को गोद लेने वाली सरकारी महिला कर्मचारियों को मातृत्व अवकाश नहीं दिया जाता था। न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की खंडपीठ ने हाल ही में ‘हंसानंदिनी नंदूरी बनाम भारत संघ मामले’ में यह निर्णय दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
- मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 और बाद में लागू सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 में संशोधन कर गोदनामा से जुड़े लाभों को शामिल किया गया था। किंतु सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 की धारा 60(4) के अनुसार केवल तीन महीने से कम आयु के बच्चों को गोद लेने पर ही मातृत्व अवकाश प्रदान किया जाता था।
- याचिकाकर्ताओं का कहना था कि यह तीन महीने की सीमा मनमानी है और संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत प्रदत्त समानता के अधिकार का उल्लंघन करती है। सरकार ने यह तर्क दिया कि अधिक आयु के बच्चों को गोद लेने वाली महिलाएँ क्रेच सुविधाओं का सहारा ले सकती हैं किंतु न्यायालय ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।
न्यायालय के प्रमुख अवलोकन
- पीठ ने यह माना कि संस्थानों में पले-बढ़े बच्चों का वहाँ के देखभाल करने वालों से भावनात्मक जुड़ाव बन जाता है।
- न्यायालय ने ‘मातृत्व’ की व्याख्या केवल जैविक प्रक्रिया तक सीमित न रखते हुए ‘माँ बनने की स्थिति’ के रूप में की है।
- न्यायालय ने शोधों का हवाला देते हुए कहा कि किसी बच्चे के भावनात्मक विकास में देखभाल की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
असंभव मानदंड – प्रमुख कानूनी निष्कर्ष (Impossible Criteria)
- किशोर न्याय (बाल देखभाल एवं संरक्षण) अधिनियम, 2015 तथा गोद लेने के केंद्रीय नियमों के तहत किसी बच्चे को गोद देने से पहले उसे ‘कानूनी रूप से मुक्त’ घोषित करना आवश्यक होता है जिसमें समय लगता है।
- न्यायालय ने कहा कि जब तक बच्चा कानूनी रूप से गोद लेने योग्य बनता है तब तक अधिकांश मामलों में निर्धारित आयु सीमा समाप्त हो चुकी होती है जिससे यह प्रावधान व्यवहार में अप्रभावी हो जाता है।
- अनुच्छेद 14 के अनुसार, किसी भी वर्गीकरण को तभी वैध माना जाएगा जब वह तर्कसंगत एवं वास्तविक आधार पर हो। न्यायालय ने पाया कि यहाँ ऐसा कोई आधार नहीं है।
- न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 14 के साथ-साथ अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्रजनन स्वायत्तता को भी समाहित करता है जो केवल जैविक मातृत्व तक सीमित नहीं है।
- दत्तक माताओं को स्वायत्तता, गरिमा एवं शारीरिक समग्रता जैसे अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता है।
- साथ ही, न्यायालय ने कहा कि गोद लेना भी अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्रजनन स्वायत्तता का एक वैध रूप है और इसे जैविक मातृत्व से कमतर नहीं आंका जा सकता है।
मातृत्व लाभ का उद्देश्य
- न्यायालय ने मातृत्व अवकाश के उद्देश्य को दो प्रमुख हिस्सों में स्पष्ट किया:
- जैविक देखभाल: माँ और बच्चे के बीच भावनात्मक संबंध स्थापित करने के लिए समय प्रदान करना।
- परिवार में समावेशन: दत्तक माताओं के मामले में प्रारंभिक समय कानूनी औपचारिकताओं में व्यतीत हो जाता है जिससे निर्धारित दो महीने की अवधि अपर्याप्त साबित होती है।
- न्यायालय ने ‘वोलस्टोनक्राफ्ट दुविधा (Wollstonecraft Dilemma)’ का उल्लेख करते हुए यह बताया कि यह महिलाओं के कार्यस्थल पर समान अवसर और पारिवारिक देखभाल की जिम्मेदारियों के बीच उत्पन्न तनाव को दर्शाता है।
- न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि अभिभावकत्व (Guardianship) केवल एक व्यक्ति का कार्य नहीं है बल्कि यह दोनों अभिभावकों की साझा जिम्मेदारी होती है।
वोलस्टोनक्राफ्ट दुविधा (Wollstonecraft Dilemma)
वॉल्स्टनक्राफ्ट द्वंद्व (Wollstonecraft's Dilemma) एक नारीवादी दुविधा है जिसे ‘कैरोल पैटमैन’ ने प्रसिद्ध रूप से परिभाषित किया है। यह इस बात को रेखांकित करता है कि महिलाओं के समक्ष दो समान रूप से चुनौतीपूर्ण विकल्प होते हैं कि या तो वे पुरुषों के मानकों को अपनाकर समानता की मांग करें (जिसमें लैंगिक भिन्नताओं की उपेक्षा होती है) अथवा वे अपनी विशिष्ट आवश्यकताओं को उजागर करें (जिससे इन भिन्नताओं को हीनता के रूप में कलंकित किए जाने का जोखिम रहता है)।
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निर्णय का महत्व
- समानता और भेदभाव-निषेध का सिद्धांत: न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि दत्तक माताओं को भी जैविक माताओं के समान अधिकार मिलना चाहिए। बच्चे की आयु के आधार पर मातृत्व लाभ से वंचित करना भेदभावपूर्ण है।
- दत्तक अभिभावकत्व की मान्यता: यह निर्णय इस तथ्य को स्वीकार करता है कि गोद लेना भी भावनात्मक, मनोवैज्ञानिक एवं देखभाल से जुड़ी जिम्मेदारियों को शामिल करता है जो जैविक पालन-पोषण के समान ही महत्वपूर्ण हैं।
व्यापक कानूनी एवं सामाजिक महत्व
यह निर्णय महिलाओं के अधिकारों एवं कार्यस्थल पर समानता को सुदृढ़ करता है। यह गोद लेने की प्रक्रिया को सामाजिक रूप से मान्यता प्राप्त और एक समर्थित संस्था के रूप में प्रोत्साहित करता है। यह संविधान के मूल सिद्धांतों ‘गरिमा, समानता एवं सामाजिक न्याय’ के अनुरूप है।