संदर्भ
- वैश्विक तापमान में हो रही वृद्धि अब सीधे तौर पर हमारी थाली और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर असर डालने लगी है। एक नए वैज्ञानिक अध्ययन से यह चिंताजनक बात सामने आई है कि जलवायु परिवर्तन के कारण भारत में (विशेष रूप से उत्तर-पश्चिम भारत के ट्रांस-गंगा के मैदानी इलाकों में) दूध उत्पादन में भारी गिरावट आई है। यह क्षेत्र देश में दुग्ध आपूर्ति का सबसे बड़ा केंद्र माना जाता है, इसलिए भैंसों और मवेशियों के दूध में आ रही यह कमी पूरे डेयरी उद्योग और आम उपभोक्ताओं के लिए एक बड़ा संकट बन चुकी है।
- प्रसिद्ध शोध पत्रिका साइंटिफिक रिपोर्ट्स (Scientific Reports) में प्रकाशित यह अध्ययन बताता है कि ग्लोबल वार्मिंग का सबसे तीखा असर ग्लोबल साउथ (विकासशील देशों) के डेयरी क्षेत्र पर पड़ रहा है, जिसमें भारत का अग्रणी राज्य हरियाणा सबसे संवेदनशील बनकर उभरा है।
शोध का दायरा: एक दशक से अधिक का विश्लेषण
- दुनिया के सबसे बड़े दुग्ध उत्पादक देश भारत में इस संकट की गहराई को समझने के लिए वैज्ञानिकों ने हरियाणा के 1,148 गांवों के विशाल पशुधन डेटा का विश्लेषण किया। इस अध्ययन में 3.55 करोड़ भैंसें, 46.6 लाख संकर (क्रॉस-ब्रीड) गायें और 28.6 लाख देसी गायें शामिल थीं।
दूध उत्पादन में कमी के लिए मुख्य कारक:
वर्ष 2004 से 2019 तक के आंकड़ों का अध्ययन करने के बाद शोधकर्ताओं ने पाया कि दूध उत्पादन में कमी के लिए मुख्य रूप से निम्नलिखित कारक जिम्मेदार हैं:
- थ्रेशोल्ड लिमिट (अंतिम सीमा): जुलाई और अगस्त (उमस और मानसून के चरम दिन) के दौरान जब तापमान 38°C से ऊपर और आर्द्रता (Humidity) 70% को पार कर जाती है, तो दूध उत्पादन में भारी गिरावट आती है।
- सर्दियों का प्रभाव: इसके विपरीत, सर्दियों के मौसम में तापमान के उतार-चढ़ाव का दूध उत्पादन पर नगण्य (न के बराबर) प्रभाव देखा गया।
भैंसें और संकर गायें क्यों हैं सबसे अधिक प्रभावित ?
इस मौसमी बदलाव की मार हर पशु पर एक जैसी नहीं पड़ रही है। जैविक संरचना के कारण भैंसों पर इसका सबसे प्रतिकूल असर देखा गया है:
भैंसों की शारीरिक संवेदनशीलता:
- भैंसों की त्वचा का रंग काला और बाल रहित (Bare skin) होने के कारण वे सौर विकिरण (धूप की गर्मी) को अधिक अवशोषित करती हैं।
- इसके अलावा, गायों की तुलना में उनमें पसीने की ग्रंथियां भी कम होती हैं। यही कारण है कि संभावित वाष्पोत्सर्जन (Potential Evapotranspiration) में प्रति इकाई (मिमी/दिन) की वृद्धि होने से प्रति भैंस प्रतिदिन लगभग 1.4 लीटर दूध कम हो जाता है।
क्रॉस-ब्रीड गायों का संकट:
- संकर नस्ल की गायें भी भीषण लू (Heatwaves) को बर्दाश्त नहीं कर पातीं और उनकी उत्पादकता तेजी से गिरती है।
पशु शरीर पर हीट स्ट्रेस का जैविक असर
- जब तापमान-आर्द्रता सूचकांक (THI) बढ़ता है, तो पशुओं का खान-पान कम हो जाता है। गर्मी से निपटने के लिए उनका शरीर हांफने और सुस्ती जैसी प्रतिक्रियाएं देता है। ऐसी स्थिति में शरीर में कोर्टिसोल जैसे तनाव बढ़ाने वाले हार्मोन का स्तर बढ़ जाता है, जो दूध निकलने की प्रक्रिया को रोक देता है। गंभीर मामलों में यह स्थिति पशुओं की मौत का कारण भी बन जाती है।
पशुओं के लिए चारे की किल्लत और आर्थिक नुकसान का अनुमान
बढ़ते तापमान ने केवल पशुओं को ही नहीं, बल्कि उनकी खाद्य श्रृंखला को भी प्रभावित किया है। मौसम चक्र में बदलाव से चारे की गुणवत्ता, मात्रा और मौसमी उपलब्धता पर बुरा असर पड़ा है।
वित्तीय और उत्पादन हानि की रिपोर्ट:
- वर्तमान में इन पर्यावरणीय तनावों के कारण भारत को सालाना 32 लाख टन दूध का नुकसान हो रहा है, जिसकी आर्थिक चपत 2,661 करोड़ रुपये है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यदि यही स्थिति रही, तो 2050 के दशक तक यह नुकसान बढ़कर 1.5 करोड़ (15 मिलियन) टन तक पहुंच सकता है।
- दिल्ली स्थित संस्था एनवायरनमेंटल डिफेंस फंड इंडिया के मुख्य सलाहकार अभिनव गौरव ने बताया कि भीषण गर्मी में दूध देने वाले पशु अपने शरीर के तापमान को नियंत्रित करने के लिए अपनी ऊर्जा को डाइवर्ट (परिवर्तित) कर देते हैं, जिससे तत्काल रूप से दूध के उत्पादन में 20 से 30% तक की कमी आ जाती है।
- इसके अलावा, चिकित्सा पत्रिका द लैंसेट की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए उन्होंने चेतावनी दी कि वर्ष 2085 तक भारतीय दुग्ध उत्पादन में 25% की बड़ी गिरावट आ सकती है।
देसी नस्लें: संकट के बीच उम्मीद की किरण
इस पूरे अध्ययन में एक सकारात्मक पहलू भी सामने आया है। साहीवाल और हरियाणा जैसी भारत की अपनी देसी नस्ल की गायों पर इस बदलते मौसम का कोई खास नकारात्मक प्रभाव नहीं देखा गया।
- देसी गोवंश (जैसे साहीवाल) की विशेषताएं जो उन्हें गर्मी से बचाती हैं:
- ढीली त्वचा (Loose skin) जो गर्मी को बाहर निकालती है
- पसीना बहाने की अत्यधिक कुशल जैविक प्रणाली
- कम चयापचय ताप (Metabolic heat) का उत्पादन
- स्थानीय परजीवियों और बीमारियों के खिलाफ मजबूत इम्युनिटी
- राष्ट्रीय पशु आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो (NBAGR) के शोध से भी यह साबित हुआ है कि साहीवाल नस्ल में हीट शॉक प्रोटीन और विशेष कोट रंग जैसे गुण होते हैं, जो उन्हें विदेशी नस्लों की तुलना में कहीं अधिक जलवायु-अनुकूल बनाते हैं।
हरियाणा के किसानों का पारंपरिक व आधुनिक प्रबंधन
आईसीएआर-राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान (ICAR-NDRI) के इस शोध में पाया गया कि हरियाणा के डेयरी किसान इन खतरों को लेकर काफी जागरूक हैं। उन्होंने अपने स्तर पर इसके प्रभाव को कम करने के लिए कई व्यावहारिक कदम उठाए हैं:
- भैंसों के शरीर को ठंडा रखने के लिए तालाबों (Wallowing ponds) की व्यवस्था।
- खेतों के आसपास कृषि-वानिकी (Agroforestry) के जरिए छायादार क्षेत्र बनाना।
- शेड के भीतर का तापमान नियंत्रित करने के लिए स्प्रिंकलर, फॉगर्स और मिस्ट (फव्वारे) का उपयोग।
आगे की राह
यह संकट केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि भारत के 8 करोड़ छोटे और सीमांत डेयरी किसानों की आजीविका और देश के पोषण स्तर का है, जो कुल दुग्ध उत्पादन में 85% की हिस्सेदारी रखते हैं। इस स्थिति से निपटने के लिए निम्नलिखित रणनीतियों को प्राथमिकता देनी होगी:
- प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली: क्षेत्रीय स्तर पर तापमान-आर्द्रता सूचकांक (THI) और वाष्पोत्सर्जन को मौसम की पूर्व चेतावनी प्रणालियों से जोड़ा जाए।
- थर्मो-टोलरेंट ब्रीडिंग: दीर्घकालिक समाधान के लिए देसी गोवंश (Bos indicus) के गर्मी सहन करने वाले गुणों का उपयोग कर ब्रीडिंग प्रोग्राम चलाए जाएं।
- नस्ल संरक्षण: देसी नस्लों को जलवायु-अनुकूल गुणों के प्राकृतिक भंडार के रूप में देखा जाए और किसानों के नेतृत्व वाले नस्ल सुधार कार्यक्रमों को सरकारी नीतियों में प्राथमिकता मिले।