संदर्भ
भारत को विकसित अर्थव्यवस्था बनाने की दिशा में विनिर्माण क्षेत्र की भूमिका निर्णायक मानी जाती है। रोजगार सृजन, निर्यात विस्तार, आयात निर्भरता कम करने और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए मजबूत विनिर्माण आधार जरूरी है। इसी दृष्टि से नीति आयोग की रिपोर्ट ‘भारत को वैश्विक विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करने के लिए प्रमुख क्षेत्र’ महत्वपूर्ण है। रिपोर्ट ने उन क्षेत्रों की पहचान की है, जहाँ भारत 2047 तक वैश्विक नेतृत्व की स्थिति हासिल कर सकता है। इसके साथ ही रिपोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि केवल उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि लागत प्रतिस्पर्धा, घरेलू मूल्यवर्धन, तकनीकी क्षमता और निजी निवेश को मजबूत करना होगा।
अर्थव्यवस्था में विनिर्माण की स्थिति
- भारत के औद्योगिक आधार में विनिर्माण की महत्वपूर्ण भूमिका है। ऑटोमोबाइल, दवा, कपड़ा, रसायन, इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, खाद्य प्रसंस्करण और धातु जैसे उद्योग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से आर्थिक गतिविधियों को गति देते हैं।
- आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, वास्तविक आधार पर भारत के सकल मूल्यवर्धन यानी जीवीए में विनिर्माण की हिस्सेदारी लगभग 17-18 प्रतिशत के आसपास बनी हुई है। वहीं, विनिर्माण का सकल उत्पादन मूल्य करीब 38 प्रतिशत है, जो अर्थव्यवस्था में इसकी व्यापक भूमिका को दर्शाता है। व्यापक द्वितीयक क्षेत्र की 2024-25 में जीवीए में हिस्सेदारी 25.8 प्रतिशत रही और इसमें वास्तविक रूप से 8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।
- रोजगार के लिहाज से भी विनिर्माण महत्वपूर्ण है। 2023-24 में कुल रोजगार में इसकी हिस्सेदारी 11.44 प्रतिशत रही। हालांकि, 2017-18 के 12.13 प्रतिशत की तुलना में यह कुछ कम है। ऐसे में विनिर्माण के विस्तार के साथ रोजगार की गुणवत्ता और उत्पादकता बढ़ाना भी बड़ी चुनौती है।
12 रणनीतिक क्षेत्रों पर फोकस
- नीति आयोग ने 2047 तक वैश्विक नेतृत्व की संभावना वाले 12 क्षेत्रों की पहचान की है। इनमें इलेक्ट्रॉनिक्स, दूरसंचार उपकरण, सौर फोटोवोल्टिक, फार्मास्यूटिकल्स, रसायन, ऑटोमोबाइल, रक्षा एवं ड्रोन, इस्पात, पूंजीगत वस्तुएं, कपड़ा, खाद्य प्रसंस्करण तथा चमड़ा एवं फुटवियर शामिल हैं।
- इन क्षेत्रों का चयन केवल वर्तमान उत्पादन क्षमता के आधार पर नहीं किया गया है। बाजार का आकार, घरेलू और वैश्विक मांग की संभावनाएं, प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता, कच्चे माल की उपलब्धता, बुनियादी ढांचा, तकनीकी तैयारी, रोजगार क्षमता और वैश्विक मूल्य श्रृंखला में भारत की स्थिति जैसे मानकों को ध्यान में रखा गया है।
- रिपोर्ट के पहले खंड में रसायन, कपड़ा, दूरसंचार एवं नेटवर्क उपकरण तथा सौर फोटोवोल्टिक क्षेत्रों का विस्तृत अध्ययन किया गया है।
रसायन क्षेत्र में आयात निर्भरता घटाने की जरूरत
- रसायन उद्योग में भारत के लिए घरेलू मूल्यवर्धन बढ़ाने की व्यापक संभावनाएं हैं। पेट्रोकेमिकल एवं कार्बनिक रसायन इस उद्योग का सबसे बड़ा हिस्सा हैं। रिपोर्ट ने फिनोल, मेथनॉल और एसिटिक एसिड जैसे उत्पादों को आयात प्रतिस्थापन के लिहाज से महत्वपूर्ण माना है।
- इन क्षेत्रों में घरेलू उत्पादन बढ़ाने से न केवल विदेशी मुद्रा की बचत होगी, बल्कि वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव से भारतीय उद्योगों की संवेदनशीलता भी कम होगी। इसके लिए केवल अंतिम उत्पाद बनाने के बजाय पूरी मूल्य श्रृंखला में आगे बढ़ना जरूरी होगा।
कपड़ा उद्योग को नई दिशा की जरूरत
- कपड़ा और परिधान उद्योग भारत की विनिर्माण अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार है। यह जीडीपी में लगभग 2 प्रतिशत और विनिर्माण जीवीए में करीब 11 प्रतिशत योगदान देता है। साथ ही, 4.5 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार देने वाला यह क्षेत्र कृषि के बाद प्रमुख रोजगार प्रदाताओं में शामिल है।
- भारत का वैश्विक कपड़ा एवं परिधान निर्यात में हिस्सा करीब 4.1 प्रतिशत है। रिपोर्ट के अनुसार, 2029-30 तक निर्यात को 100 अरब डॉलर तक पहुंचाने के लिए मानव निर्मित फाइबर आधारित उत्पादन पर अधिक ध्यान देना होगा।
- लेकिन इस क्षेत्र में श्रम उत्पादकता एक बड़ी चुनौती है। अप्रेंटिसशिप, उद्योग-शिक्षण संस्थानों की साझेदारी, श्रमिकों के लिए किफायती आवास और बेहतर श्रम मानकों को बढ़ावा देने जैसे कदम आवश्यक होंगे।
दूरसंचार में स्थानीयकरण महत्वपूर्ण
- भारत दुनिया के सबसे बड़े दूरसंचार बाजारों में से एक है। 1.2 अरब से अधिक ग्राहकों और व्यापक इंटरनेट पहुंच के कारण घरेलू मांग मजबूत है। अब चुनौती इस मांग को घरेलू विनिर्माण और निर्यात क्षमता में बदलने की है।
- इसके लिए दूरसंचार उपकरणों के घरेलू घटक निर्माण, तकनीकी हस्तांतरण, संयुक्त उपक्रम, परीक्षण एवं प्रमाणन और औद्योगिक क्लस्टरों को मजबूत करना होगा। इससे भारत केवल बड़ा उपभोक्ता बाजार नहीं, बल्कि वैश्विक दूरसंचार उपकरण आपूर्ति श्रृंखला का महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है।
सौर ऊर्जा में अवसर और जोखिम
- मार्च 2025 तक भारत में 106 गीगावाट सौर क्षमता स्थापित हो चुकी थी। 2030 के 280 गीगावाट लक्ष्य को हासिल करने के लिए बड़ी अतिरिक्त क्षमता की जरूरत है। घरेलू फोटोवोल्टिक बाजार के तेजी से बढ़ने की संभावना इस क्षेत्र को विनिर्माण के लिए आकर्षक बनाती है।
- हालांकि, निर्यात बाजार में अत्यधिक एकाग्रता जोखिम पैदा करती है। 2019-20 से 2025-26 के बीच भारत के सौर मॉड्यूल निर्यात का लगभग 97 प्रतिशत अमेरिका को गया। इसलिए भारत को पॉलीसिलिकॉन और वेफर्स जैसे ऊपरी स्तर के उत्पादन में प्रवेश करने के साथ-साथ नए निर्यात बाजार विकसित करने होंगे।
क्लस्टर और निजी निवेश पर जोर
- रिपोर्ट की सबसे महत्वपूर्ण सिफारिशों में क्लस्टर आधारित विनिर्माण शामिल है। साझा बुनियादी ढांचे, उपयोगिताओं और त्वरित मंजूरी वाले एकीकृत औद्योगिक पार्कों से उत्पादन की लागत घटाई जा सकती है और कंपनियों को बड़े पैमाने पर उत्पादन का लाभ मिल सकता है।
- इसके साथ ही आयात निर्भरता कम करने, घरेलू मूल्यवर्धन बढ़ाने, तकनीकी हस्तांतरण, कौशल विकास और निर्यात बाजारों में विविधता लाने पर जोर दिया गया है।
- नीति आयोग के उपाध्यक्ष अशोक लाहिड़ी का जोर इस बात पर है कि विनिर्माण का विस्तार केवल सरकारी सहायता से संभव नहीं होगा। निजी निवेश तभी आएगा, जब निवेश में लाभ की संभावना होगी। इसलिए सरकार की भूमिका ऐसी बाधाओं को दूर करने की होनी चाहिए, जो उद्योग की प्रतिस्पर्धात्मकता और लाभप्रदता को प्रभावित करती हैं।
निष्कर्ष
- नीति आयोग की रणनीति का मूल संदेश स्पष्ट है- भारत को वैश्विक विनिर्माण शक्ति बनने के लिए केवल उत्पादन का आकार बढ़ाने के बजाय प्रतिस्पर्धी लागत, उत्पादकता, तकनीक, घरेलू मूल्यवर्धन और लाभप्रदता पर ध्यान देना होगा।
- क्लस्टर आधारित उत्पादन, आयात निर्भरता में कमी, निर्यात बाजारों का विविधीकरण और निजी निवेश को प्रोत्साहन भारत की विनिर्माण रणनीति के प्रमुख स्तंभ बन सकते हैं। यदि इन उपायों को प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है, तो विनिर्माण न केवल भारत की आर्थिक वृद्धि को गति दे सकता है, बल्कि करोड़ों लोगों के लिए रोजगार और वैश्विक बाजार में भारत की मजबूत स्थिति का आधार भी बन सकता है।