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ग्रीन इंडिया मिशन: कैग ऑडिट के संदर्भ में चुनौतियाँ और आगे की राह

संदर्भ

  • ग्रीन इंडिया मिशन (GIM) भारत की जलवायु एवं पर्यावरणीय रणनीति का एक महत्वपूर्ण घटक है। यह राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्ययोजना (NAPCC) के अंतर्गत संचालित आठ मिशनों में से एक है। इसका उद्देश्य केवल वन क्षेत्र बढ़ाना नहीं, बल्कि वन गुणवत्ता, जैव विविधता, कार्बन अवशोषण, जल सुरक्षा तथा वन-निर्भर समुदायों की आजीविका में सुधार करना भी है। 
  • हालिया नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) के प्रदर्शन ऑडिट ने मिशन के क्रियान्वयन में वित्तीय, संस्थागत और निगरानी संबंधी गंभीर कमियों को उजागर किया है। इससे यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है कि पर्याप्त संसाधनों और बेहतर संस्थागत समन्वय के बिना भारत अपने वन एवं जलवायु लक्ष्यों को किस सीमा तक प्राप्त कर सकता है।  

ग्रीन इंडिया मिशन: पृष्ठभूमि  

  • राष्ट्रीय हरित भारत मिशन (National Mission for a Green India) को पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा 2014 में शुरू किया गया था तथा इसकी कार्यान्वयन गतिविधियाँ 2015-16 से प्रारंभ हुईं।
  • यह मिशन लैंडस्केप-आधारित दृष्टिकोण अपनाता है। इसके अंतर्गत वन एवं वृक्ष आवरण का संरक्षण, पुनर्स्थापन और विस्तार करने के साथ-साथ पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं तथा वन-निर्भर समुदायों की आजीविका को मजबूत करने पर जोर दिया जाता है।

प्रमुख उद्देश्य: 

  • वन एवं वृक्ष आवरण में वृद्धि करना।
  • मौजूदा वन एवं वृक्ष आवरण की गुणवत्ता सुधारना।
  • जैव विविधता, जल एवं कार्बन अवशोषण जैसी पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं को बढ़ाना।
  • वन-निर्भर परिवारों की आय एवं आजीविका में सुधार करना।
  • वार्षिक कार्बन अवशोषण को बढ़ाना।

मिशन का लक्ष्य 50 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में वन एवं वृक्ष आवरण बढ़ाना तथा अन्य 50 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में मौजूदा वन एवं वृक्ष आवरण की गुणवत्ता में सुधार करना है।

भारत की जलवायु प्रतिबद्धताओं में ग्रीन इंडिया मिशन का महत्व  

  • वन भारत के जलवायु लक्ष्यों की प्राप्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। भारत ने अपनी राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) के तहत 2030 तक अतिरिक्त वन एवं वृक्ष आवरण के माध्यम से 2.5–3 अरब टन CO समतुल्य का अतिरिक्त कार्बन सिंक बनाने की प्रतिबद्धता व्यक्त की है। इस दृष्टि से ग्रीन इंडिया मिशन का महत्व वनीकरण से कहीं व्यापक है। स्वस्थ वन; 
    • कार्बन का अवशोषण करते हैं;
    • जैव विविधता का संरक्षण करते हैं;
    • जल चक्र एवं जल विनियमन में सहायता करते हैं;
    • मृदा संरक्षण करते हैं;
    • जलवायु परिवर्तन के प्रति लचीलापन बढ़ाते हैं;
    • वन-निर्भर समुदायों की आजीविका को समर्थन देते हैं। 

उपलब्धियाँ और व्यापक परिदृश्य 

  • MoEFCC की वार्षिक रिपोर्ट 2024-25 के अनुसार, 2015-16 से 17 राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश को ₹944.48 करोड़ जारी किए गए थे। इसके माध्यम से वन एवं गैर-वन क्षेत्रों में 1,55,130 हेक्टेयर क्षेत्र में पौधरोपण तथा वन-निर्भर समुदायों की आजीविका सुधार संबंधी गतिविधियों को सहायता मिली। 
  • मार्च 2026 तक मिशन के तहत जारी राशि बढ़कर लगभग ₹1,019.26 करोड़ हो गई। साथ ही, भारत की वन स्थिति रिपोर्ट (आईएसएफआर) 2023 के अनुसार भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 25.17% वन एवं वृक्ष आवरण के अंतर्गत है, जिसमें 21.76% वन आवरण और 3.41% वृक्ष आवरण शामिल है। वर्ष 2013 के बाद वन एवं वृक्ष आवरण में 4.83% की संचयी वृद्धि दर्ज की गई है। 
  • हालाँकि, इन राष्ट्रीय उपलब्धियों को केवल ग्रीन इंडिया मिशन की सफलता के रूप में नहीं देखा जा सकता, क्योंकि क्षतिपूर्ति वनरोपण निधि प्रबंधन एवं योजना प्राधिकरण (CAMPA), महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (एमजीएनआरईजीए) तथा अन्य वनीकरण एवं पर्यावरणीय कार्यक्रम भी इसमें योगदान करते हैं।  

नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) ऑडिट की प्रमुख चिंताएँ 

कैग ने 2015-16 से 2024-25 की अवधि में 16 राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों में ग्रीन इंडिया मिशन की योजना, कार्यान्वयन एवं निगरानी का प्रदर्शन ऑडिट किया। ऑडिट में मिशन के लक्ष्यों और उपलब्धियों के बीच महत्वपूर्ण अंतर सामने आया।  

1. अपर्याप्त वित्तपोषण

  • जीआईएम के लिए लगभग ₹10,600 करोड़ की वित्तीय सहायता प्रस्तावित की गई थी, लेकिन ऑडिट अवधि के दौरान बजटीय सहायता के रूप में केवल ₹1,149.14 करोड़ प्राप्त हुए।
  • कैग के अनुसार, यह शुरुआती चार वर्षों के लिए सीसीईए द्वारा स्वीकृत ₹2,000 करोड़ का केवल 47.88% था। इसके अतिरिक्त, राज्यों के हिस्से के लिए 13वें वित्त आयोग से ₹400 करोड़ का प्रावधान भी था।
  • निहितार्थ: वित्तीय संसाधनों की कमी ने मिशन को अपेक्षित स्तर और व्यापकता से लागू करने की क्षमता को सीमित किया।

2. अन्य योजनाओं के साथ कमजोर अभिसरण 

  • जीआईएम की सफलता के लिए सीएएमपीए और मनरेगा जैसी योजनाओं के साथ अभिसरण महत्वपूर्ण था। लेकिन कैग ने पाया कि अपेक्षित स्तर पर अभिसरण नहीं हो सका।  
  • नगर वन योजना और स्कूल नर्सरी योजना जैसी पहलें भी काफी हद तक अलग-अलग संचालित होती पाई गईं।
  • निहितार्थ: इससे वित्तीय संसाधनों, तकनीकी विशेषज्ञता और उपलब्ध कार्यान्वयन तंत्र के साझा उपयोग के अवसर सीमित हुए।

3. कमजोर वित्तीय नियंत्रण 

  • ऑडिट में वित्तीय प्रबंधन की कमियाँ भी सामने आईं। आठ राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों में वार्षिक लेखे उपलब्ध नहीं थे, जबकि अन्य मामलों में खाते या तो ऑडिट नहीं किए गए थे अथवा उनमें विसंगतियाँ थीं। 
  • निहितार्थ: ऐसी कमियाँ सार्वजनिक धन के उपयोग की पारदर्शिता, जवाबदेही और कार्यक्रम की वित्तीय दक्षता के मूल्यांकन को प्रभावित करती हैं। 

4. कमजोर योजना और निगरानी 

  • कैग ने मिशन की कमियों के लिए केवल धन की कमी को जिम्मेदार नहीं माना, बल्कि योजना निर्माण और निगरानी तंत्र की कमजोरियों को भी महत्वपूर्ण कारण बताया। 
  • वन संबंधी कार्यक्रमों की सफलता केवल पौधरोपण की संख्या से नहीं मापी जा सकती। पौधों की जीवित रहने की दर, वन गुणवत्ता, जैव विविधता, कार्बन अवशोषण और पारिस्थितिकी तंत्र के पुनर्स्थापन जैसे परिणाम अधिक महत्वपूर्ण हैं। 

प्रमुख चुनौतियाँ  

ग्रीन इंडिया मिशन के प्रभावी क्रियान्वयन के सामने प्रमुख चुनौतियों को निम्न प्रकार समझा जा सकता है: 

  • अन्य योजनाओं के साथ अपर्याप्त अभिसरण
  • अपर्याप्त वित्तपोषण
  • योजना निर्माण में कमियाँ
  • कमजोर निगरानी तंत्र  

वस्तुतः कैग की टिप्पणियों से स्पष्ट है कि केवल बजटीय आवंटन बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। मिशन को इनपुट-आधारित दृष्टिकोण से परिणाम-आधारित दृष्टिकोण की ओर ले जाने की आवश्यकता है। 

प्रमुख सुधार 

1. पर्याप्त एवं समयबद्ध वित्तपोषण 

  • मिशन के लक्ष्यों के अनुरूप पर्याप्त बजटीय संसाधन सुनिश्चित किए जाएँ तथा राज्यों को समय पर धन उपलब्ध कराया जाए।

2. प्रभावी अभिसरण

  • GIM, CAMPA, MGNREGS तथा अन्य संबंधित योजनाओं के बीच स्पष्ट कार्य-विभाजन एवं साझा परियोजनाएँ विकसित की जाएँ।

3. परिणाम-आधारित निगरानी

  • केवल लगाए गए पौधों की संख्या के बजाय पौधों की जीवित रहने की दर, वन गुणवत्ता, जैव विविधता, कार्बन अवशोषण और जल संबंधी परिणामों को निगरानी का आधार बनाया जाए। 

4. डिजिटल एवं जीआईएस आधारित निगरानी

  • रिमोट सेंसिंग, जीआईएस, ड्रोन और जियो-टैगिंग जैसी तकनीकों का उपयोग करके परियोजनाओं की वास्तविक समय में निगरानी की जा सकती है।

5. वित्तीय जवाबदेही मजबूत करना

  • सभी राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों में नियमित लेखांकन, ऑडिट और सार्वजनिक वित्तीय रिपोर्टिंग सुनिश्चित की जानी चाहिए।

6. स्थानीय समुदायों की भागीदारी

  • वन-निर्भर समुदायों, ग्राम संस्थाओं और स्थानीय निकायों को योजना निर्माण एवं कार्यान्वयन में अधिक भागीदारी दी जानी चाहिए। इससे संरक्षण के साथ-साथ आजीविका के अवसर भी मजबूत होंगे।  

निष्कर्ष 

ग्रीन इंडिया मिशन भारत के वन संरक्षण, जलवायु कार्रवाई और ग्रामीण आजीविका के बीच समन्वय स्थापित करने वाली महत्वपूर्ण पहल है। भारत के वन एवं वृक्ष आवरण में समग्र वृद्धि सकारात्मक संकेत देती है, लेकिन कैग का ऑडिट यह बताता है कि जीआईएम के निर्धारित लक्ष्यों और वास्तविक उपलब्धियों के बीच अभी भी महत्वपूर्ण अंतर मौजूद है। 

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