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रक्षा फ्रेमवर्क: वैश्विक कूटनीति और रक्षा विनिर्माण में भारत का नया रणनीतिक कदम

संदर्भ 

  • बढ़ती भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा, क्षेत्रीय संघर्षों और तेजी से बदलती सैन्य प्रौद्योगिकियों के इस दौर में भारत ने अपनी रक्षा कूटनीति को एक नई और सुसंगत दिशा दी है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह द्वारा नई दिल्ली में जारी ‘रक्षा’ (RAKSHA) नामक दस्तावेज अगले एक दशक के लिए भारत की रक्षा कूटनीति का मार्गदर्शन करने वाला एक महत्वाकांक्षी और व्यापक रोडमैप है। यह रणनीतिक खाका न केवल भारत की सैन्य भागीदारी और रक्षा औद्योगिक सहयोग को मजबूत करता है, बल्कि इसे देश की व्यापक विदेश नीति, आर्थिक हितों और राष्ट्रीय सुरक्षा उद्देश्यों के साथ भी गहराई से जोड़ता है।   

औपचारिक आदान-प्रदान से परे परिणाम-उन्मुख रणनीतिक साझेदारी 

  • इस नए फ्रेमवर्क का सबसे मुख्य उद्देश्य रक्षा कूटनीति को केवल पारंपरिक रूप से होने वाले औपचारिक सैन्य आदान-प्रदान, उच्च स्तरीय दौरों और संयुक्त अभ्यासों तक सीमित रखने की धारणा को बदलना है। इसके बजाय, भारत अब दीर्घकालिक और परिणाम-उन्मुख साझेदारियों के निर्माण पर जोर दे रहा है जो क्षेत्रीय स्थिरता को बढ़ावा दें, सैन्य क्षमताओं को सुदृढ़ करें और वैश्विक बाजारों में भारतीय रक्षा उत्पादों के लिए नए मार्ग प्रशस्त करें।
  • भारत ने हाल के वर्षों में इंडो-पैसिफिक, यूरोप, पश्चिम एशिया और अफ्रीका सहित कई क्षेत्रों के देशों के साथ अपनी रक्षा भागीदारी का उल्लेखनीय विस्तार किया है। उदाहरण के लिए, इंडोनेशिया के साथ ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल प्रणाली और अस्त्र एमके-1 बियॉन्ड विजुअल-रेंज एयर-टू-एयर मिसाइलों की आपूर्ति का समझौता इसी व्यापक दिशा का एक जीवंत उदाहरण है। 
  • इसके अतिरिक्त, विदेशी सैन्य कर्मियों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रमों, संयुक्त सैन्य शिक्षा और संस्थागत साझेदारियों के माध्यम से मित्र देशों के साथ अंतर-संचालनीयता (interoperability) को भी लगातार बढ़ाया जा रहा है। 

रक्षा विनिर्माण और निर्यात में अभूतपूर्व छलांग 

  • ‘रक्षा’ फ्रेमवर्क का एक बेहद महत्वपूर्ण आयाम रक्षा औद्योगिक सहयोग है, जो 'आत्मनिर्भर भारत' अभियान के तहत देश के रक्षा विनिर्माण क्षेत्र में आए बड़े बदलाव को दर्शाता है। आज भारत मुख्य रूप से आयात पर निर्भर रहने वाले देश की छवि से बाहर निकलकर सह-विकास (co-development), सह-उत्पादन (co-production), प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और आपूर्ति-श्रृंखला एकीकरण पर आधारित साझेदारियों को प्राथमिकता दे रहा है।  
  • यह औद्योगिक बदलाव देश के बढ़ते रक्षा निर्यात में साफ झलकता है। वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का रक्षा निर्यात रिकॉर्ड ₹38,424 करोड़ के आंकड़े को छू गया, जो वैश्विक मंच पर भारतीय सैन्य प्लेटफार्मों और प्रौद्योगिकियों की बढ़ती स्वीकार्यता का प्रमाण है।
  • आज भारतीय रक्षा कंपनियां मित्र देशों को तोपखाने प्रणालियों, मिसाइलों, गोला-बारूद, गश्ती जहाजों, रडार और इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों की आपूर्ति कर रही हैं। यह फ्रेमवर्क रक्षा निर्यात को भारत की विदेश और रणनीतिक नीति का एक प्रमुख उपकरण बनाने पर विशेष बल देता है।   

समुद्री सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता 

  • हिंद महासागर क्षेत्र में एक प्रमुख शक्ति के रूप में भारत ने हमेशा नौसैनिक सहयोग, समुद्री डोमेन जागरूकता, क्षमता निर्माण और मानवीय सहायता को प्राथमिकता दी है। 'रक्षा' फ्रेमवर्क इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भारत की एक विश्वसनीय सुरक्षा प्रदाता की भूमिका को और अधिक पुख्ता करता है। संकट के समय क्षेत्र में सबसे पहले प्रतिक्रिया देने वाले (first responder) के रूप में भारतीय सशस्त्र बलों की भूमिका ने मित्र देशों के बीच भारत की साख को और मजबूत किया है। 

निष्कर्ष 

  • रक्षा - दस्तावेज केवल एक 10-वर्षीय खाका नहीं है, बल्कि यह दुनिया के साथ भारत की सहभागिता में एक दीर्घकालिक दूरदर्शिता का प्रतीक है। रणनीतिक साझेदारियों, सैन्य सहयोग, क्षमता निर्माण, रक्षा विनिर्माण और निर्यात को एक सूत्र में पिरोकर, यह फ्रेमवर्क भारत को एक प्रमुख क्षेत्रीय सुरक्षा प्रदाता के साथ-साथ वैश्विक स्तर पर एक शक्तिशाली रक्षा विनिर्माण और निर्यातक राष्ट्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम साबित होगा। 
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