संदर्भ
भारत की अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में छोटे व्यापार, घरेलू उत्पादन, विनिर्माण और सेवाओं की बड़ी भूमिका है। लंबे समय तक इसे मुख्यतः राज्य या राष्ट्रीय स्तर के आंकड़ों से समझा जाता रहा। अब सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) ने पहली बार अनिगमित क्षेत्र के उद्यमों के वार्षिक सर्वेक्षण (ASUSE), 2025 के आधार पर पहली बार जिला-स्तरीय अनुमान जारी किए हैं। गैर-कृषि अनिगमित क्षेत्र से जुड़े ये आंकड़े महिलाओं की कार्यबल में भागीदारी, आय, उद्यम स्वामित्व और आर्थिक गतिविधियों के भौगोलिक वितरण की स्पष्ट तस्वीर देते हैं। इससे स्थानीय जरूरतों के अनुरूप अधिक प्रभावी और साक्ष्य-आधारित नीतियां बनाने में मदद मिल सकती है।
महिलाओं की भागीदारी में बड़ा भौगोलिक अंतर
- आंकड़ों की सबसे दिलचस्प तस्वीर महिलाओं की भागीदारी को लेकर सामने आती है। तेलंगाना का निर्मल जिला सबसे आगे है, जहां अनौपचारिक श्रमिकों में महिलाओं की हिस्सेदारी 78 प्रतिशत है। इसके बाद मणिपुर का इंफाल ईस्ट और तेलंगाना का निजामाबाद, दोनों 70 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ आते हैं। जगतियाल में यह आंकड़ा 69 प्रतिशत और मणिपुर के बिष्णुपुर में 66 प्रतिशत है।
- इसके ठीक उलट कुछ जिलों में महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बेहद कम है। रुद्रप्रयाग, उत्तराखंड में महिलाओं की हिस्सेदारी महज 7 प्रतिशत है। मरिगांव, असम में यह 9 प्रतिशत तथा श्रीनगर, हाथरस और बनासकांठा में करीब 11 प्रतिशत है।
- पूरे भारत में अनौपचारिक कार्यबल में महिलाओं की औसत हिस्सेदारी करीब 29 प्रतिशत है। वहीं 237 जिलों में यह हिस्सेदारी कम-से-कम एक-तिहाई है।
- इन आंकड़ों से साफ है कि महिला आर्थिक भागीदारी को सिर्फ राष्ट्रीय औसत से नहीं समझा जा सकता। स्थानीय सामाजिक संरचना, रोजगार के अवसर, आर्थिक गतिविधियों की प्रकृति, शिक्षा, बाजार और परिवार की भूमिका जैसे कई कारक जिलों के बीच बड़ा अंतर पैदा कर सकते हैं।
पूर्व और पूर्वोत्तर की मजबूत मौजूदगी
- महिलाओं की अधिक भागीदारी वाले जिलों में पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत की मजबूत मौजूदगी खास ध्यान खींचती है। महिलाओं की हिस्सेदारी के मामले में शीर्ष 10 में आने वाले सभी जिले इसी व्यापक क्षेत्र में स्थित हैं। शीर्ष 25 जिलों में से 22 जिले पूर्वी या पूर्वोत्तर क्षेत्र से हैं।
- यह स्थिति कई महत्वपूर्ण सवाल भी उठाती है।
- क्या इन क्षेत्रों की सामाजिक व्यवस्था महिलाओं को आर्थिक गतिविधियों में अधिक सक्रिय भूमिका देती है?
- क्या स्थानीय और पारंपरिक आर्थिक गतिविधियों में महिलाओं की भूमिका अधिक मजबूत है?
- क्या परिवार और समुदाय की संरचना उन्हें रोजगार और उद्यमिता के बेहतर अवसर देती है?
- इन सवालों के जवाब के लिए आगे और अध्ययन जरूरी होगा, लेकिन जिला-स्तरीय आंकड़े निश्चित रूप से इस दिशा में शोध का आधार तैयार करते हैं।
ज्यादा भागीदारी का मतलब ज्यादा आय नहीं
- महिलाओं की बड़ी संख्या में कार्यबल में मौजूदगी सकारात्मक संकेत है, लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि उन्हें बेहतर आय भी मिल रही है।
- यही वजह है कि रोजगार की गुणवत्ता पर ध्यान देना जरूरी है। जिन जिलों में अनौपचारिक कार्यबल में महिलाओं की हिस्सेदारी कम-से-कम 50 प्रतिशत है, उनमें साउथ वेस्ट खासी हिल्स, मेघालय में प्रति नियोजित श्रमिक वार्षिक पारिश्रमिक करीब ₹1.71 लाख है। यह अखिल भारतीय औसत करीब ₹1.3 लाख से अधिक है।
- इससे स्पष्ट होता है कि महिला सशक्तीकरण का आकलन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि कितनी महिलाएं काम कर रही हैं। यह भी देखना होगा कि वे कितना कमा रही हैं, किस तरह का काम कर रही हैं और उनकी उत्पादकता तथा आर्थिक अवसर कितने बेहतर हैं।
श्रमिक के अलावा उद्यमी भी
- जिला-स्तरीय आंकड़ों की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि महिलाओं के उद्यम स्वामित्व से जुड़ी है। जिन जिलों में महिलाओं की कार्यबल में भागीदारी अधिक है, वहां महिला स्वामित्व वाले प्रोप्राइटरी प्रतिष्ठानों का अनुपात भी अधिक दिखाई देता है।
- निर्मल इसका सबसे उल्लेखनीय उदाहरण है। यहां अनौपचारिक कार्यबल में महिलाओं की हिस्सेदारी 78 प्रतिशत है और करीब 80 प्रतिशत प्रोप्राइटरी प्रतिष्ठानों का स्वामित्व महिलाओं के पास है।
- यह आंकड़ा महिला आर्थिक भागीदारी की एक नई तस्वीर सामने रखता है। महिलाएं केवल श्रमिक नहीं, बल्कि कई जगह उद्यम की मालिक और आर्थिक निर्णय लेने वाली भी हैं।
- ऐसे उद्यमों को सस्ता और आसान ऋण, कौशल विकास, डिजिटल तकनीक, बाजार तक पहुंच और बेहतर बुनियादी ढांचे से जोड़ा जाए तो महिला उद्यमिता आर्थिक विकास का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकती है।
आर्थिक गतिविधियों का केंद्र अलग
- हालांकि महिलाओं की भागीदारी का नक्शा और अनौपचारिक अर्थव्यवस्था के आकार का नक्शा एक जैसा नहीं है।
- उत्तर 24 परगना, पश्चिम बंगाल में अनौपचारिक श्रमिकों की संख्या करीब 21.3 लाख और प्रतिष्ठानों की संख्या लगभग 16.6 लाख है। प्रतिष्ठानों की संख्या के आधार पर शीर्ष 10 जिले इस क्षेत्र के कुल जीवीए का करीब 11 प्रतिशत हिस्सा पैदा करते हैं, जबकि शीर्ष 50 जिले लगभग एक-तिहाई जीवीए उत्पन्न करते हैं।
- इसका अर्थ है कि अनौपचारिक आर्थिक गतिविधियों का बड़ा आर्थिक पैमाना कुछ चुनिंदा जिलों में केंद्रित है, जबकि महिलाओं की भागीदारी के मामले में कई छोटे या अलग भौगोलिक क्षेत्र आगे हैं।
अब नीतियां भी हों स्थानीय
- जिला-स्तरीय आंकड़ों का सबसे बड़ा महत्व यहीं सामने आता है। 757 जिलों को कवर करने वाला यह डेटा नीति निर्माताओं को अधिक लक्षित हस्तक्षेप का अवसर देता है।
- जहां महिलाओं की भागीदारी कम है, वहां रोजगार और कौशल विकास पर जोर दिया जा सकता है। जहां महिला उद्यमिता मजबूत है, वहां ऋण, डिजिटलाइजेशन और बाजार उपलब्ध कराने की जरूरत हो सकती है। वहीं बड़े अनौपचारिक आर्थिक केंद्रों में उत्पादकता, वित्तीय पहुंच और सामाजिक सुरक्षा को मजबूत किया जा सकता है।
- भारत जैसे विशाल और विविध देश में एक ही नीति हर जिले में समान परिणाम नहीं दे सकती। इसलिए स्थानीय आंकड़ों के आधार पर स्थानीय समाधान तैयार करना ज्यादा प्रभावी होगा।
निष्कर्ष
- अनौपचारिक अर्थव्यवस्था के जिला-स्तरीय आंकड़े महिलाओं की आर्थिक भागीदारी में क्षेत्रीय असमानता को उजागर करते हैं। अब चुनौती केवल रोजगार देने की नहीं, बल्कि महिलाओं को बेहतर आय, उद्यमिता, वित्तीय संसाधन और सामाजिक सुरक्षा से जोड़ने की है। स्थानीय आंकड़ों के आधार पर नीतियां बनाकर विकास को अधिक समावेशी, लक्षित और परिणाम-आधारित बनाया जा सकता है। भारत की आर्थिक प्रगति की असली कहानी बड़े शहरों के साथ-साथ उन जिलों में भी लिखी जा रही है, जहां छोटे उद्यम और अनौपचारिक श्रमिक अर्थव्यवस्था को गति दे रहे हैं।