संदर्भ
- भारत में स्वर्ण न केवल एक मूल्यवान धातु है, बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक परंपराओं और घरेलू परिसंपत्ति संचय का एक प्राथमिक स्तंभ भी रहा है। मई 2026 में, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) द्वारा इलेक्ट्रॉनिक गोल्ड रिसीट्स (EGRs) के रूप में एक नए एक्सचेंज-ट्रेडेड प्लेटफॉर्म की शुरुआत भारतीय वित्तीय परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण मोड़ है।
- इस नवोन्मेषी पहल का मुख्य उद्देश्य भारतीय स्वर्ण बाजार को अधिक पारदर्शी, मानकीकृत, नियमन-आधारित और कुशल बनाना है। यह संरचना निवेशकों को भौतिक सोने के प्रत्यक्ष भंडारण एवं सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियों से मुक्त करते हुए उसके आर्थिक मूल्य का सुरक्षित स्वामित्व प्रदान करती है।
पृष्ठभूमि एवं नियामक विकासक्रम
भारत में गोल्ड एक्सचेंज की स्थापना एक सुविचारित नियामक यात्रा का परिणाम है, जिसका खाका अग्रलिखित चरणों में तैयार हुआ:
- नियामक ढांचा (सितंबर 2021): भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने गोल्ड एक्सचेंज एवं सेबी (वॉल्ट मैनेजर्स) विनियम, 2021 के व्यापक वैधानिक ढांचे को स्वीकृति प्रदान की।
- प्रतिभूति का दर्जा (दिसंबर 2021): भारत सरकार ने प्रतिभूति अनुबंध (विनियमन) अधिनियम, 1956 (SCRA) के अंतर्गत EGRs को एक प्रतिभूति (Security) के रूप में अधिसूचित किया।
- जोखिम प्रबंधन (अप्रैल 2022): बाजार की स्थिरता सुनिश्चित करने हेतु सेबी द्वारा व्यापक जोखिम प्रबंधन ढांचा लागू किया गया।
- प्रथम चरण का शुभारंभ (2022): बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) ने 24 अक्टूबर 2022 को (मुहूर्त ट्रेडिंग सत्र के दौरान) भारत में प्रथम EGR ट्रेडिंग की शुरुआत की, जो 995 और 999 शुद्धता मानकों पर आधारित थी।
इलेक्ट्रॉनिक गोल्ड रिसीट्स (EGRs) का अवधारणात्मक स्वरूप
इलेक्ट्रॉनिक गोल्ड रिसीट्स अनिवार्य रूप से इलेक्ट्रॉनिक प्रतिभूतियां हैं, जो सेबी-पंजीकृत तथा विनियमित वॉल्ट्स (सुरक्षित तिजोरियों) में भौतिक रूप से संग्रहीत सोने के स्वामित्व का प्रतिनिधित्व करती हैं।
- प्रकृति एवं संचालन: ये प्रतिभूतियां निवेशकों के डिमैट (Demat) खातों में इलेक्ट्रॉनिक रूप में जमा रहती हैं। इन्हें शेयर बाजारों के माध्यम से खरीदा एवं बेचा जा सकता है तथा निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन कर भौतिक सोने में परिवर्तित (Redeem) भी कराया जा सकता है।
- ट्रेडिंग एवं निपटान (Settlement): सोमवार से शुक्रवार तक भारतीय शेयर बाजार की संचालन अवधि के दौरान ट्रेडिंग निष्पादित होती है। इक्विटी परिसंपत्तियों की भांति इलेक्ट्रॉनिक गोल्ड रिसीट्स में भी T+1 निपटान चक्र का पालन किया जाता है, जिससे सौदे के अगले कारोबारी दिन प्रतिभूतियां खरीदार के डिमैट खाते में स्थानांतरित हो जाती हैं।
मुख्य लाभ एवं रणनीतिक महत्व
1. मूल्य खोज में पारदर्शिता (Price Discovery)
इलेक्ट्रॉनिक गोल्ड रिसीट्स के माध्यम से संपूर्ण देश में एक समान और पारदर्शी मूल्य खोज प्रणाली स्थापित होती है, जिससे विभिन्न क्षेत्रीय बाजारों में सोने की कीमतों में विद्यमान विषमताएं दूर होती हैं।
2. मानकीकृत गुणवत्ता एवं सुरक्षा
प्रत्येक ईजीआर सेबी-विनियमित वॉल्ट्स में रखे एक निर्दिष्ट परिमाण और 999 (99.9%) या 995 (99.5%) शुद्धता वाले भौतिक सोने द्वारा समर्थित होता है। इससे निवेशकों को सोने की शुद्धता जांचने और चोरी या क्षति के भय से मुक्ति मिलती है।
3. वित्तीय समावेशन एवं सूक्ष्म-निवेश
इलेक्ट्रॉनिक गोल्ड रिसीट्स 10 मिलीग्राम, 100 मिलीग्राम, 1 ग्राम, 10 ग्राम, 100 ग्राम तथा 1 किलोग्राम जैसे विविध मूल्यवर्गों (Denominations) में उपलब्ध हैं। यह संरचना छोटे निवेशकों को अपनी बचत के अनुसार नियमित अंतराल पर स्वर्ण परिसंपत्ति संचित करने का अवसर देती है।
4. परिसंपत्ति विविधीकरण एवं तरलता
यह तंत्र निवेशकों को उच्च तरलता (Liquidity), निपटान की गारंटी (Settlement Guarantee) और विनिमयता (Fungibility) प्रदान करता है, जो एक संतुलित निवेश पोर्टफोलियो के निर्माण में सहायक है।
लागत ढांचा एवं कर संरचना
इलेक्ट्रॉनिक गोल्ड रिसीट्स में निवेश की लागत को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है:
- ट्रेडिंग एवं भंडारण शुल्क: खरीद लागत के अतिरिक्त निवेशकों को ब्रोकरेज शुल्क, डिपॉजिटरी/डिमैट शुल्क, वॉल्ट भंडारण शुल्क तथा अन्य वैधानिक लेनदेन शुल्क देने होते हैं।
- वस्तु एवं सेवा कर (GST) का प्रभाव:
- इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग: इलेक्ट्रॉनिक गोल्ड रिसीट्स की केवल खरीद और बिक्री (ट्रेडिंग) पर कोई जीएसटी देय नहीं है।
- भौतिक सुपुर्दगी (Physical Delivery): जब कोई निवेशक ईजीआर को भौतिक सोने में बदलता है, तब उसे सोने के कुल मूल्य पर 3% जीएसटी, शुद्धता परीक्षण शुल्क तथा परिवहन व्यय वहन करना होता है।
निष्कर्ष
इलेक्ट्रॉनिक गोल्ड रिसीट्स का आगमन भारत के अनौपचारिक एवं असंगठित स्वर्ण बाजार को मुख्यधारा के औपचारिक वित्तीय तंत्र से जोड़ने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम है। जहाँ एक ओर यह निवेशकों के लिए सुरक्षित और सुलभ विकल्प प्रस्तुत करता है, वहीं दूसरी ओर यह देश की अर्थव्यवस्था में निष्क्रिय पड़े सोने को वित्तीय परिसंपत्ति के रूप में गतिशील बनाने की क्षमता रखता है। तथापि, इस प्रणाली की पूर्ण सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वॉल्ट संरचना का बुनियादी ढांचा कितना पारदर्शी रहता है, भौतिक सुपुर्दगी की प्रक्रिया कितनी सुगम होती है और आम निवेशकों के बीच इसको लेकर जागरूकता का स्तर किस सीमा तक बढ़ता है।