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इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट्स मैन्युफैक्चरिंग स्कीम

संदर्भ 

  • स्मार्टफोन से लेकर ऑटोमोबाइल, दूरसंचार नेटवर्क, स्वास्थ्य उपकरण और औद्योगिक प्रणालियों तक इलेक्ट्रॉनिक्स आज आधुनिक अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन चुका है। संचार, स्वास्थ्य सेवा, परिवहन, वित्त, विनिर्माण और डिजिटल बुनियादी ढांचे जैसी लगभग हर महत्वपूर्ण व्यवस्था इलेक्ट्रॉनिक्स पर निर्भर है। ऐसे में मजबूत घरेलू इलेक्ट्रॉनिक्स पारिस्थितिकी तंत्र तकनीकी मजबूती, आर्थिक सुरक्षा और आत्मनिर्भरता के लिए महत्वपूर्ण है। 
  • भारत ने पिछले एक दशक में इस क्षेत्र में तेज प्रगति की है। देश में इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन 2014-15 के 1.9 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2025-26 में 13.11 लाख करोड़ रुपये हो गया। इसी अवधि में इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात भी 38,000 करोड़ रुपये से बढ़कर 4.24 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया। अब अगला फोकस केवल असेंबली बढ़ाने के बजाय इलेक्ट्रॉनिक्स के जरूरी कंपोनेंट और कच्चे माल का घरेलू उत्पादन बढ़ाने पर है। 

कंपोनेंट निर्माण पर बड़ा जोर 

  • भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण तेजी से बढ़ा है, लेकिन प्रिंटेड सर्किट बोर्ड यानी पीसीबी, कैमरा और डिस्प्ले मॉड्यूल, कनेक्टर, कैपेसिटर, लीथियम-आयन सेल और रेयर-अर्थ मैग्नेट जैसे कई महत्वपूर्ण कंपोनेंट और सामग्रियों के लिए अभी भी आयात पर निर्भरता है।
  • इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट्स मैन्युफैक्चरिंग स्कीम यानी ईसीएमएस शुरू की गई है। इसके तहत कंपोनेंट, सब-असेंबली, आपूर्ति श्रृंखला से जुड़े उत्पाद और संबंधित पूंजीगत वस्तुओं के घरेलू विनिर्माण को प्रोत्साहित किया जा रहा है।
  • इसका मुख्य उद्देश्य देश में मूल्य संवर्धन बढ़ाना, आयात पर निर्भरता कम करना और इलेक्ट्रॉनिक्स की आपूर्ति श्रृंखला को अधिक सुरक्षित एवं स्थिर बनाना है।

40,000 करोड़ रुपये हुआ ईसीएमएस का परिव्यय 

  • ईसीएमएस को 8 अप्रैल 2025 को अधिसूचित किया गया था। शुरुआत में इसके लिए 22,919 करोड़ रुपये का वित्तीय परिव्यय रखा गया था। योजना की कुल अवधि छह वर्ष है, जिसमें एक वर्ष की वैकल्पिक स्थापना अवधि का प्रावधान है। पूंजीगत व्यय प्रोत्साहन पांच वर्षों के लिए उपलब्ध है। 
  • योजना का दायरा अब और बढ़ाया गया है। केंद्रीय बजट 2026-27 में ईसीएमएस का वित्तीय परिव्यय बढ़ाकर 40,000 करोड़ रुपये कर दिया गया। इससे घरेलू इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट विनिर्माण को और विस्तार देने की क्षमता बढ़ी है। 

15 राज्यों में 106 परियोजनाएं 

  • अगस्त 2026 तक 15 राज्यों में कुल 106 परियोजनाओं को मंजूरी दी जा चुकी है। ये परियोजनाएं 30 इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद क्षेत्रों को कवर करती हैं और इनमें 69,548 करोड़ रुपये का स्वीकृत निवेश शामिल है। 
  • इनमें से 38 संयंत्रों में उत्पादन शुरू हो चुका है, जबकि 16 अन्य परियोजनाएं निर्माण या मशीनरी स्थापना के उन्नत चरण में हैं।
  • स्वीकृत परियोजनाओं से 5.34 लाख करोड़ रुपये के उत्पादन का अनुमान है। इसके साथ ही 74,628 प्रत्यक्ष रोजगार और लगभग 2.5 लाख अप्रत्यक्ष रोजगार पैदा होने का अनुमान है।
  • ईसीएमएस के तहत महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट और सामग्रियों के क्षेत्र में घरेलू क्षमता भी बढ़ रही है। कई उत्पाद श्रेणियों में उत्पादन क्षमता अब घरेलू मांग को पूरा करने या उससे अधिक होने की स्थिति में पहुंच रही है।

सेमीकॉन 2026 : भारत के सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम को बढ़ावा देना

  • सेमीकंडक्टर आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों का आधार हैं। इसनिए तकनीकी मजबूती, आर्थिक सुरक्षा और राष्ट्रीय आत्मनिर्भरता के लिए एक मजबूत सेमीकंडक्टर पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण आवश्यक है। इस रणनीतिक महत्व को देखते हुए, भारत सरकार नीतिगत सहयोग, बुनियादी ढांचे और वैश्विक साझेदारियों के माध्यम से सेमीकंडक्टर पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत कर रही है।
  • इसी दिशा में, "सिलिकॉन से सिस्टम तकः पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण" विषय पर आयोजित SEMICON India 2026 का उ‌द्घाटन 17 सितंबर 2026 को नई दिल्ली के यशोभूमि में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने किया। 
  • 17 से 19 सितंबर 2026 तक आयोजित यह कार्यक्रम वैश्विक उ‌द्योग जगत के प्रमुखों, नीति-निर्माताओं, निवेशकों, शिक्षाविदों और स्टार्टअप्स को एक मंच पर ला रहा है। यह भारत की सेमीकंडक्टर महत्वाकांक्षाओं को आगे बढ़ाने और पूरी मूल्य श्रृंखला में पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने के लिए एक महत्वपूर्ण मंच प्रदान करता है। 

इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र के लिए कई योजनाओं का साथ 

भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण क्षेत्र को मजबूत करने के लिए ईसीएमएस के साथ कई अन्य योजनाएं भी लागू की गई हैं।

  • राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स नीति 2019 यानी एनपीई 2019 का प्रमुख उद्देश्य भारत को इलेक्ट्रॉनिक्स सिस्टम डिजाइन और विनिर्माण यानी ईएसडीएम का वैश्विक केंद्र बनाना है।
  • बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण के लिए उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन यानी पीएलआई योजना के तहत पात्र क्षेत्रों में वृद्धिशील बिक्री पर 4 से 6 प्रतिशत तक प्रदर्शन आधारित प्रोत्साहन दिया जाता है। 
  • स्पेक्स के तहत इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट, सेमीकंडक्टर और डिस्प्ले निर्माण, एटीएमपी इकाइयों, विशेष सब-असेंबली और पूंजीगत वस्तुओं के लिए 25 प्रतिशत पूंजीगत व्यय प्रोत्साहन दिया गया। वहीं ईएमसी 2.0 के जरिए विश्वस्तरीय विनिर्माण बुनियादी ढांचे, साझा सुविधाओं और प्लग-एंड-प्ले क्षमता को बढ़ावा दिया गया।
  • आईटी हार्डवेयर पीएलआई 2.0 का उद्देश्य घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देना, निवेश आकर्षित करना और आयात पर निर्भरता कम करना है।
  • सेमीकंडक्टर क्षेत्र में 76,000 करोड़ रुपये के सेमीकंडक्टर 1.0 कार्यक्रम के बाद जुलाई 2026 में 1,27,500 करोड़ रुपये के वित्तीय परिव्यय के साथ सेमीकंडक्टर 2.0 को मंजूरी दी गई। इसका लक्ष्य भारत को वैश्विक सेमीकंडक्टर केंद्र के रूप में विकसित करना है।
  • इसके अलावा इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण क्लस्टर योजना के तहत ग्रीनफील्ड परियोजनाओं को परियोजना लागत के 50 प्रतिशत तक, अधिकतम 50 करोड़ रुपये प्रति 100 एकड़ की सीमा के साथ वित्तीय सहायता दी जाती है। चरणबद्ध विनिर्माण कार्यक्रम मोबाइल फोन और प्रमुख सब-असेंबली में घरेलू मूल्य संवर्धन बढ़ाने पर केंद्रित है। वहीं इलेक्ट्रॉनिक्स विकास कोष ईएसडीएम और आईटी क्षेत्र में जोखिम पूंजी, नवाचार, उत्पाद डिजाइन और स्टार्टअप विकास को समर्थन देता है।

2030 तक 500 अरब डॉलर का लक्ष्य 

  • भारत अब इलेक्ट्रॉनिक्स का बड़ा बाजार होने के साथ-साथ वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। देश ने 2030 तक 500 अरब डॉलर यानी 47.75 लाख करोड़ रुपये के घरेलू इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र का लक्ष्य रखा है। इसके साथ ही 150 अरब डॉलर यानी 14.33 लाख करोड़ रुपये के इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात का लक्ष्य भी निर्धारित किया गया है।
  • ईसीएमएस इस लक्ष्य की दिशा में असेंबली से आगे बढ़कर कंपोनेंट, कच्चे माल, सब-असेंबली और पूंजीगत वस्तुओं की घरेलू क्षमता विकसित करने पर जोर देती है।
  • 106 परियोजनाओं को मंजूरी, 69,548 करोड़ रुपये के निवेश और 5.34 लाख करोड़ रुपये के अनुमानित उत्पादन के साथ ईसीएमएस भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में मूल्य श्रृंखला को गहरा करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
  • आने वाले वर्षों में इन परियोजनाओं के उत्पादन में आने से घरेलू आपूर्ति श्रृंखला मजबूत होने, मूल्य संवर्धन बढ़ने और आयात पर निर्भरता कम होने की संभावना है। भारत का लक्ष्य अब केवल इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादों का निर्माण करना नहीं, बल्कि कंपोनेंट से लेकर तैयार उत्पाद और निर्यात तक पूरी इलेक्ट्रॉनिक्स मूल्य श्रृंखला में अपनी क्षमता मजबूत करना है। यही बदलाव भारत को 2030 के महत्वाकांक्षी इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण और निर्यात लक्ष्यों की दिशा में आगे ले जा सकता है। 
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