हाथी गलियारे : मानव-हाथी संघर्ष कम करने की जीवनरेखा
संदर्भ
भारत में मानव-वन्यजीव संघर्ष, विशेषकर मानव-हाथी संघर्ष, वन्यजीव संरक्षण, ग्रामीण आजीविका और पर्यावरणीय संतुलन के लिए गंभीर चुनौती बनता जा रहा है। इसी संदर्भ में हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने केंद्र सरकार को हाथी गलियारों का नए सिरे से सर्वेक्षण करने का निर्देश दिया। न्यायालय ने कहा कि फसल नुकसान की आशंका के आधार पर हाथियों के प्राकृतिक आवागमन वाले गलियारों को अवरुद्ध नहीं किया जा सकता, क्योंकि हाथी स्वाभाविक रूप से लंबी दूरी तक विचरण करते हैं।
मानव-हाथी संघर्ष से जुड़ी एक लंबित याचिका की सुनवाई के दौरान हाथियों को भगाने के लिए आग के गोले, नुकीले अवरोध और अन्य जबरन उपायों के इस्तेमाल पर रोक की मांग भी उठी। न्यायालय ने केंद्र से ऐसे उपायों को रोकने के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी मांगी। यह हस्तक्षेप स्पष्ट करता है कि हाथियों के प्राकृतिक आवागमन मार्गों की सुरक्षा मानव-हाथी संघर्ष को कम करने की महत्वपूर्ण शर्त है।
हाथी लंबी दूरी तक क्यों चलते हैं?
एशियाई हाथी अत्यधिक गतिशील और सामाजिक जीव हैं। एक नर हाथी का होम रेंज सामान्यतः 50 से 300 वर्ग किलोमीटर तक होता है, जो भोजन, पानी और आश्रय की उपलब्धता के अनुसार और बढ़ सकता है। उनकी आवाजाही आवास, संसाधनों की उपलब्धता, जनसंख्या घनत्व और मानवीय हस्तक्षेप जैसे कारकों से प्रभावित होती है।
एनसीबीएस और डब्ल्यूआईआई के अध्ययनों के अनुसार, हाथियों की आवाजाही मुख्य रूप से मौसम के अनुसार भोजन और पानी की उपलब्धता पर निर्भर करती है। उदाहरण के लिए, शुष्क महीनों में वे केरल के अपेक्षाकृत नम पश्चिमी घाटों की ओर बढ़ते हैं। जलवायु परिवर्तन और सूखे जैसी परिस्थितियां भी उनके प्रवास को प्रभावित करती हैं। इसलिए हाथी गलियारे बदलती पर्यावरणीय परिस्थितियों के बीच उनके सुरक्षित आवागमन और अस्तित्व के लिए आवश्यक हैं।
भारत में हाथियों का व्यापक परिदृश्य
भारत में हाथियों के चार प्रमुख परिदृश्य हैं। पश्चिमी घाट में 11,934 हाथी हैं, जो देश की कुल आबादी का 53.2 प्रतिशत हैं। इनमें कर्नाटक में 6,013, तमिलनाडु में 3,136 और केरल में 2,785 हाथी शामिल हैं।
पूर्वोत्तर पहाड़ियों और ब्रह्मपुत्र के बाढ़ क्षेत्र में 6,559 हाथी यानी 29.2 प्रतिशत, शिवालिक पहाड़ियों और गंगा के मैदानों में 2,062 यानी 9.2 प्रतिशत तथा मध्य भारत और पूर्वी घाट में 1,891 यानी 8.4 प्रतिशत हाथी पाए जाते हैं। एसएआईईई (SAIEE) 2021-25 के अनुसार भारत में हाथियों की कुल आबादी 22,446 है।
इतनी बड़ी और व्यापक आबादी के लिए अलग-अलग वन क्षेत्रों के बीच सुरक्षित संपर्क बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। लेकिन बुनियादी ढांचा परियोजनाओं, खनन, कृषि विस्तार और बदलते भूमि उपयोग के कारण हाथियों के प्राकृतिक आवास लगातार खंडित हो रहे हैं।
अलग-अलग क्षेत्रों में बढ़ती चुनौतियां
पश्चिमी घाट में कभी निरंतर हाथी आवास रहा क्षेत्र अब बदलते भूमि उपयोग, कॉफी और चाय के बागानों, आक्रामक वनस्पति प्रजातियों तथा कृषि भूमि की बाड़बंदी के कारण तेजी से खंडित हो रहा है। इसी तरह शिवालिक और ब्रह्मपुत्र के मैदानों में रेलवे लाइनें, सड़कें, बिजली से संबंधित बुनियादी ढांचा और अन्य भूमि उपयोग परिवर्तन हाथियों के पारंपरिक मार्गों को बाधित कर रहे हैं।
मध्य भारत और पूर्वी घाट संरक्षण की दृष्टि से विशेष चुनौती प्रस्तुत करते हैं। 1980 के दशक के मध्य से यहां हाथियों की संख्या में लगातार वृद्धि हुई है। तत्कालीन दक्षिणी बिहार में एल नीनो से जुड़ी सूखे की परिस्थितियों ने हाथियों की आवाजाही को प्रभावित किया, जबकि बाद में झारखंड और ओडिशा में लौह अयस्क खनन के विस्तार ने उनके आवास और मार्गों पर दबाव बढ़ाया। पिछले दो दशकों में झारखंड और ओडिशा से हाथी छत्तीसगढ़ की ओर बढ़े तथा बाद में मध्य प्रदेश के उमरिया और शहडोल और महाराष्ट्र के गढ़चिरौली तक उनकी आवाजाही देखी गई।
हाथी गलियारों का महत्व
हाथी गलियारे अलग-अलग और खंडित वन क्षेत्रों को जोड़ने वाले महत्वपूर्ण पारिस्थितिक संपर्क मार्ग हैं। इनके माध्यम से हाथियों की विभिन्न आबादियों के बीच आनुवंशिक आदान-प्रदान होता है, जिससे आनुवंशिक विविधता बनी रहती है। ये गलियारे हाथियों को मौसम के अनुसार भोजन और पानी वाले क्षेत्रों तक पहुंचने तथा प्राकृतिक रूप से नए क्षेत्रों में फैलने में भी मदद करते हैं।
इन मार्गों को सुरक्षित रखने का एक महत्वपूर्ण लाभ मानव-हाथी संघर्ष को कम करना है। यदि हाथियों के पारंपरिक मार्ग बाधित हो जाते हैं, तो वे भोजन और पानी की तलाश में खेतों तथा मानव बस्तियों की ओर जाने के लिए मजबूर हो सकते हैं। इससे फसल नुकसान, संपत्ति की क्षति और मानव तथा हाथियों दोनों के लिए जान का खतरा बढ़ता है। इसलिए गलियारों की रक्षा संघर्ष की स्थिति उत्पन्न होने के बाद प्रतिक्रिया देने के बजाय समस्या के मूल कारण को दूर करने का उपाय है।
गलियारों का मानचित्रण और संरक्षण
सरकार के वर्ष 2023 के प्रमुख गलियारा-मानचित्रण अभ्यास में 15 राज्यों के चार प्रमुख हाथी परिदृश्यों में कुल 150 हाथी गलियारों की पहचान की गई थी। दक्षिण भारत में मानव-हाथी संघर्ष पर तैयार रिपोर्ट में 32 गलियारों में बॉटलनेक यानी अवरोध वाले स्थानों की पहचान की गई। इनमें राजमार्ग, रेलवे परियोजनाएं, जलविद्युत परियोजनाएं, उच्च वोल्टेज बिजली लाइनें, विद्युत बाड़, खदानें, गलियारों का संकुचन, चाय-कॉफी बागान, रिसॉर्ट और आश्रम प्रमुख बाधाओं के रूप में सामने आए।
पश्चिम बंगाल में सबसे अधिक 26 हाथी गलियारे दर्ज किए गए हैं। वहीं छत्तीसगढ़ का चारमार-जिंगोल गलियारा लगभग 20 किलोमीटर लंबा और 2.5 किलोमीटर चौड़ा है, जिसके माध्यम से अनुमानित 80 से 100 हाथियों की ओडिशा से छत्तीसगढ़ के आंतरिक क्षेत्रों की ओर आवाजाही होती है।
निष्कर्ष
हाथी गलियारे केवल वन्यजीवों के आवागमन के रास्ते नहीं, बल्कि खंडित प्राकृतिक आवासों को जोड़ने वाली जीवनरेखाएं हैं। वे हाथियों की मौसमी आवाजाही, भोजन और पानी तक पहुंच, आनुवंशिक आदान-प्रदान तथा दीर्घकालिक अस्तित्व को सुनिश्चित करते हैं और मानव-हाथी संघर्ष को कम करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
ऐसे समय में जब सड़क, रेलवे, खनन और अन्य विकास परियोजनाएं इन मार्गों पर दबाव बढ़ा रही हैं, सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप संरक्षण नीति को एक महत्वपूर्ण दिशा देता है। हाथियों के प्राकृतिक मार्गों को सुरक्षित रखना केवल भारत के सबसे बड़े स्थलीय स्तनधारी के संरक्षण का प्रश्न नहीं है, बल्कि मानव और वन्यजीवों के बीच संतुलित, सुरक्षित और दीर्घकालिक सह-अस्तित्व सुनिश्चित करने की अनिवार्य शर्त भी है।