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पर्यावरणीय आवश्यकता और संघीय संतुलन की चुनौती

संदर्भ 

  • भारत वर्तमान में एक अभूतपूर्व राष्ट्रीय पर्यावरणीय आपातकाल के मुहाने पर खड़ा है। हमारे महानगर कचरे के पहाड़ों (लैंडफिल) के नीचे दबे हैं, नदियाँ शहरी उपेक्षा का बोझ ढो रही हैं और अब ग्रामीण भारत भी प्लास्टिक व ई-कचरे की चपेट में है। इस संकट के समाधान हेतु ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2026 (जो 1 अप्रैल, 2026 से प्रभावी) को एक अत्यावश्यक कदम के रूप में पेश किया गया है।
  • यद्यपि इन नियमों का मकसद स्रोत पर पृथक्करण, डिजिटल निगरानी और चक्रीय अर्थव्यवस्था (Circular Economy) सराहनीय है, किंतु इसकी प्रशासनिक संरचना सहायकता के सिद्धांत (Principle of Subsidiarity) और भारतीय संघवाद की मूल भावना को गंभीर चुनौती देती है।  

संधि शक्ति बनाम संघीय संतुलन 

  • पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत अनुच्छेद 253 का उपयोग करते हुए केंद्र सरकार ने ये नियम बनाए हैं। यह अनुच्छेद अंतर्राष्ट्रीय दायित्वों (जैसे स्टॉकहोम घोषणा) को लागू करने के लिए संसद को राज्यों के विषयों पर भी कानून बनाने की शक्ति देता है।
  • हालाँकि, न्यूनतम राष्ट्रीय मानकों को सुनिश्चित करने का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि केंद्र सरकार स्थानीय प्रशासन के क्षेत्र पर पूर्ण कब्ज़ा कर ले। 
  • एक परिपक्व लोकतंत्र में निर्णय उस स्तर पर लिए जाने चाहिए जो ज्ञान और जवाबदेही के सबसे करीब हो। जैसा कि एफ.ए. हायेक ने अपनी पुस्तक द यूज़ ऑफ़ नॉलेज इन सोसाइटी में स्पष्ट किया है, प्रभावी निर्णय समय और स्थान की विशेष परिस्थितियों पर निर्भर करते हैं। नई दिल्ली में बैठा कोई प्राधिकरण हिमालयी ढलानों या तटीय पंचायतों की विशिष्ट भौगोलिक और पारिस्थितिकी चुनौतियों को एक समान चश्मे से नहीं देख सकता। 

पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के बारे में  

  • पर्यावरण की सुरक्षा और सुधार के लिए प्रदान करने के उद्देश्य से 1986 में पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम बनाया गया था।
  • यह केंद्र सरकार को अपने सभी रूपों में पर्यावरण प्रदूषण को रोकने के जनादेश के साथ लगाए गए धारा 3 (3) के तहत) अधिकारियों को स्थापित करने का अधिकार देता है और देश के विभिन्न हिस्सों में विशिष्ट पर्यावरणीय समस्याओं से निपटने के लिए। 
  • अधिनियम को 1991 में अंतिम बार संशोधित किया गया था। 

केंद्रीकरण: क्षमता का भ्रम 

भारतीय शासन का मानना है कि अत्यधिक नियमन और केंद्रीकरण से प्रशासनिक कमजोरी दूर की जा सकती है। 

  • अक्षमता का तर्क : राज्यों को जन्मजात अक्षम मानना न केवल संघीय ढांचे के विरुद्ध है, बल्कि प्रशासनिक दृष्टि से भी त्रुटिपूर्ण है।
  • लर्निंग बाई डूइंग : नोबेल विजेता केनेथ एरो के अनुसार, प्रशासनिक क्षमता ऊपर से थोपने से नहीं, बल्कि निर्णय लेने और गलतियों से सीखने (Experimentation) से आती है। जब राज्यों को केवल कार्यान्वयन का साधन बना दिया जाता है, तो उनकी अपनी विशेषज्ञता क्षीण हो जाती है। 

एक ही आकार की प्रणाली (One Size Fits All) की विफलता 

  • ठोस अपशिष्ट प्रबंधन अनिवार्य रूप से एक स्थानीय विषय है। मुंबई जैसे संसाधन-संपन्न शहर के नियम किसी बिखरी हुई आबादी वाली आदिवासी पंचायत या उत्तर-पूर्व के पहाड़ी शहरों पर लागू नहीं किए जा सकते।
  • ग्रामीण वास्तविकता : नियमों ने पंचायतों को लघु नगरपालिका मान लिया है, जबकि उनके पास न तो डिजिटल क्षमता है और न ही तकनीकी कर्मचारी। 
  • प्रस्तावित समाधान : ग्रामीण क्षेत्रों के लिए ग्राम-सभा आधारित जागरूकता, सरल घरेलू खाद निर्माण और क्लस्टर स्तर पर कचरा प्रसंस्करण जैसे व्यावहारिक मॉडल की आवश्यकता थी। 

राज्य: नीतिगत प्रयोगशालाओं के रूप में 

  • अमेरिकी न्यायाधीश लुई ब्रांडेइस ने राज्यों को सामाजिक-आर्थिक प्रयोगों की प्रयोगशाला कहा था। भारत को भी राज्यों को कम से कम पांच वर्षों के लिए अपने विशिष्ट नियम बनाने की छूट देनी चाहिए थी। 
  • कोई राज्य महिला स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से विकेंद्रीकृत मॉडल अपना सकता था, तो कोई अनौपचारिक श्रमिकों के एकीकरण पर जोर दे सकता था।
  • पाँच वर्षों बाद, साक्ष्यों के आधार पर केंद्र सरकार को सर्वोत्तम प्रथाओं (Best Practices) को राष्ट्रीय मानक बनाना चाहिए था। 

डिजिटल डैशबोर्ड बनाम लोकतांत्रिक जवाबदेही 

  • सीपीसीबी (CPCB) द्वारा अनिवार्य केंद्रीकृत ऑनलाइन पोर्टल राज्यों को सह-भागीदार के बजाय केवल डेटा आपूर्तिकर्ता बना देता है।
  • अक्सर अधिकारी सेवा वितरण (Service Delivery) के बजाय डैशबोर्ड भरने में उलझ जाते हैं।
  • अनुपालन का अर्थ नई दिल्ली को रिपोर्ट करना नहीं, बल्कि अपने वार्ड और मोहल्ले के नागरिकों के प्रति जवाबदेह होना होना चाहिए। 

निष्कर्ष  

2026 के नियम यदि केवल कागज़ी अनुपालन (Paper Compliance) तक सीमित रह गए, तो कचरे के पहाड़ कम होने के बजाय केवल कानूनी विवाद और हलफनामों के अंबार बढ़ेंगे। वास्तविक सफलता के लिए नियमों को निम्नलिखित पाँच सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए: 

  • न्यूनतम राष्ट्रीय मानक : केंद्र केवल दिशा-निर्देश दे।
  • राज्य का लचीलापन : स्थानीय पारिस्थितिकी के अनुरूप नीति निर्माण की छूट।
  • सशक्त स्थानीय निकाय : पंचायतों और नगरपालिकाओं को पर्याप्त संसाधन। 
  • पूर्वानुमानित वित्त : वित्तीय सहायता के बिना नियम केवल अनफंडेड मैंडेट हैं। 
  • नागरिक जवाबदेही : वार्ड समितियों और ग्राम सभाओं के माध्यम से लोकतांत्रिक निगरानी।  

वस्तुतः यदि हम विकेंद्रीकृत समाधानों की अनदेखी करते रहे, तो केंद्रीकृत महत्वाकांक्षा और स्थानीय उपेक्षा का यह मेल भारत के अपशिष्ट संकट को और अधिक गहरा ही करेगा। 

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