संदर्भ
भारतीय न्यायपालिका लंबे समय से लंबित मामलों के बढ़ते बोझ, न्यायिक संसाधनों की कमी तथा मुकदमों के निस्तारण में होने वाली देरी जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है। ऐसे परिदृश्य में फास्ट ट्रैक कोर्ट (Fast Track Courts-FTCs) को त्वरित न्याय सुनिश्चित करने के एक महत्वपूर्ण संस्थागत उपाय के रूप में विकसित किया गया है। हाल ही में पेपर लीक मामलों के शीघ्र निपटारे के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा फास्ट ट्रैक कोर्ट स्थापित करने की घोषणा के बाद इन अदालतों की उपयोगिता और प्रभावशीलता पर पुनः चर्चा तेज हो गई है। हालांकि, यह प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि क्या केवल विशेष अदालतों की स्थापना न्यायिक विलंब की समस्या का स्थायी समाधान हो सकती है।
फास्ट ट्रैक कोर्ट की अवधारणा
- फास्ट ट्रैक कोर्ट ऐसी विशेष न्यायालय व्यवस्था है, जिसका उद्देश्य विशिष्ट श्रेणी के मामलों का सामान्य अदालतों की तुलना में अपेक्षाकृत कम समय में निस्तारण करना है।
- इन अदालतों के गठन के लिए कोई पृथक केंद्रीय कानून नहीं है, बल्कि इनकी स्थापना समय-समय पर केंद्र एवं राज्य सरकारों की योजनाओं, न्यायालयों के निर्देशों तथा वित्त आयोगों की सिफारिशों के आधार पर की जाती रही है।
- चौदहवें वित्त आयोग (2015–2020) ने हत्या, अपहरण, जबरन वसूली जैसे जघन्य अपराधों तथा पाँच वर्ष से अधिक समय से लंबित संपत्ति विवादों के शीघ्र निपटारे हेतु 1,800 फास्ट ट्रैक कोर्ट स्थापित करने की अनुशंसा की थी। इसके अतिरिक्त महिलाओं, बच्चों, वरिष्ठ नागरिकों, दिव्यांग व्यक्तियों तथा गंभीर रूप से बीमार नागरिकों से संबंधित मामलों को प्राथमिकता देने की भी सिफारिश की गई थी।
फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट (FTSC) : विशेष न्यायिक व्यवस्था
- वर्ष 2019 में आपराधिक कानूनों में संशोधन तथा सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुपालन में केंद्र सरकार ने फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट (FTSC) योजना प्रारंभ की।
- निर्भया फंड से आंशिक रूप से वित्तपोषित इन विशेष अदालतों का उद्देश्य बलात्कार तथा यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम के अंतर्गत दर्ज मामलों का समयबद्ध एवं संवेदनशील निस्तारण सुनिश्चित करना है। इस प्रकार, एफटीएससी सामान्य फास्ट ट्रैक कोर्ट से भिन्न होकर विशिष्ट प्रकार के अपराधों के लिए समर्पित न्यायिक तंत्र के रूप में कार्य करती हैं।
विशेष अदालतों का संवैधानिक आधार
- विशेष अदालतों की स्थापना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 के अनुरूप होनी चाहिए, जो विधि के समक्ष समानता तथा विधि के समान संरक्षण का अधिकार प्रदान करता है। इसका तात्पर्य यह है कि किसी भी मामले को केवल त्वरित सुनवाई के उद्देश्य से मनमाने ढंग से विशेष अदालत में स्थानांतरित नहीं किया जा सकता।
- इस सिद्धांत को सर्वोच्च न्यायालय ने स्टेट ऑफ वेस्ट बंगाल बनाम अनवर अली सरकार (1952) के ऐतिहासिक निर्णय में स्पष्ट किया। न्यायालय ने कहा कि केवल शीघ्र सुनवाई अपने आप में मामलों के वर्गीकरण का पर्याप्त एवं तार्किक आधार नहीं हो सकता। विशेष अदालतों के गठन के लिए यह आवश्यक है कि मामलों का चयन किसी वस्तुनिष्ठ और न्यायसंगत आधार पर किया जाए, जैसे अपराध की प्रकृति, उसकी गंभीरता अथवा पीड़ित वर्ग की संवेदनशीलता।
- हालांकि, व्यवहार में कुछ असाधारण मामलों में विशेष अदालतों का गठन किया गया है। सत्यम कंप्यूटर सर्विसेज लेखा घोटाला तथा 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाला ऐसे उदाहरण हैं, जिनमें न्यायालयों ने त्वरित सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए विशेष अदालतों की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया। वर्तमान में यह देखना शेष है कि नीट पेपर लीक प्रकरण को भी किसी विशेष फास्ट ट्रैक अदालत को सौंपा जाएगा या नहीं।
क्या फास्ट ट्रैक कोर्ट वास्तव में त्वरित न्याय प्रदान करती हैं?
- भारतीय विधि व्यवस्था किसी भी मुकदमे के निस्तारण के लिए अनिवार्य समय-सीमा निर्धारित नहीं करती। तथापि, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) में यह अपेक्षा व्यक्त की गई है कि सामान्य आपराधिक मामलों का निस्तारण आदर्श रूप से दो वर्षों के भीतर तथा यौन अपराधों से संबंधित मामलों का निस्तारण दो महीनों के भीतर किया जाना चाहिए।
- केंद्र प्रायोजित फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट योजना के अंतर्गत प्रत्येक अदालत के लिए प्रति तिमाही लगभग 41–42 मामलों तथा वार्षिक रूप से कम से कम 165 मामलों के निस्तारण का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
प्रदर्शन और उपलब्धियाँ
- जनवरी 2026 तक देश के 21 राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों में 862 नियमित फास्ट ट्रैक कोर्ट कार्यरत थीं। इसके अतिरिक्त 29 राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों में 774 फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट, जिनमें 398 विशेष पॉक्सो अदालतें सम्मिलित हैं, कार्य कर रही थीं।
- उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार इन विशेष अदालतों की निस्तारण दर लगभग 96 प्रतिशत रही। वर्ष 2024 में इनमें 88,902 नए मामले दर्ज हुए, जबकि 85,595 मामलों का निस्तारण किया गया। औसतन एक फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट प्रति माह लगभग 9.5 मामलों का निपटारा करती है, जबकि समान अधिकार-क्षेत्र वाली सामान्य अदालतों का औसत लगभग 3.3 मामले प्रति माह है।
- इन उपलब्धियों के बावजूद लंबित मामलों की संख्या अब भी अत्यधिक है। वर्ष 2023 के अंत तक इन अदालतों में 2.4 लाख से अधिक मामले लंबित थे, जो यह दर्शाता है कि केवल निस्तारण की गति बढ़ा देना पर्याप्त नहीं है; न्यायिक प्रणाली की समग्र क्षमता में भी वृद्धि आवश्यक है।
मुख्य चुनौतियाँ
मार्च 2026 में संसद में प्रस्तुत जानकारी के अनुसार मामलों के शीघ्र निस्तारण में अनेक संरचनात्मक एवं प्रक्रियागत बाधाएँ मौजूद हैं। इनमें प्रमुख हैं -
- न्यायालयों के लिए पर्याप्त भौतिक एवं डिजिटल अवसंरचना का अभाव।
- न्यायाधीशों के रिक्त पद एवं मानव संसाधन की कमी।
- जटिल एवं तकनीकी प्रकृति के मामले।
- जांच एजेंसियों की गुणवत्ता तथा फॉरेंसिक सहयोग की सीमाएँ।
- गवाहों, अधिवक्ताओं तथा अन्य हितधारकों के सहयोग में कमी।
- न्यायिक प्रक्रियाओं एवं नियमों के प्रभावी अनुपालन में व्यावहारिक कठिनाइयाँ।
इन चुनौतियों के कारण फास्ट ट्रैक अदालतें अपेक्षित दक्षता प्राप्त नहीं कर पातीं।
विशेषज्ञों का दृष्टिकोण
- आपराधिक विधि विशेषज्ञ कार्तिक वेणु का मत है कि फास्ट ट्रैक कोर्ट न्यायिक सुधार का एक आवश्यक, किंतु सीमित उपाय हैं। यदि इनके साथ पर्याप्त न्यायाधीश, न्यायालय भवन, डिजिटल अवसंरचना, अभियोजन तंत्र तथा फॉरेंसिक सुविधाएँ उपलब्ध नहीं कराई जातीं, तो इनसे व्यापक न्यायिक सुधार की अपेक्षा करना यथार्थवादी नहीं होगा।
- उनके अनुसार, पॉक्सो तथा अन्य सामान्य आपराधिक मामलों में लंबित मुकदमों की विशाल संख्या के कारण फास्ट ट्रैक व्यवस्था अपेक्षित परिणाम नहीं दे सकी है, जबकि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम से संबंधित मामलों में अपेक्षाकृत बेहतर सफलता देखने को मिली है।
समय-सीमा निर्धारण पर न्यायपालिका का दृष्टिकोण
- पी. रामचंद्र राव बनाम कर्नाटक राज्य (2002) मामले में सर्वोच्च न्यायालय की सात-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने स्पष्ट किया कि सभी आपराधिक मामलों के निस्तारण के लिए कोई सार्वभौमिक अधिकतम समय-सीमा निर्धारित करना न तो व्यावहारिक है और न ही न्यायिक दृष्टि से स्वीकार्य।
- न्यायालय ने यह भी कहा कि केवल समय बीत जाने के आधार पर मुकदमे समाप्त करना न्यायपालिका द्वारा विधि-निर्माण (Judicial Legislation) के समान होगा, जो संविधान की मूल व्यवस्था के अनुरूप नहीं है।
निष्कर्ष
फास्ट ट्रैक कोर्ट भारतीय न्याय व्यवस्था में त्वरित न्याय सुनिश्चित करने का एक महत्वपूर्ण संस्थागत माध्यम हैं, विशेषकर महिलाओं, बच्चों तथा अन्य संवेदनशील वर्गों से जुड़े मामलों में। फिर भी, न्यायिक विलंब की समस्या का समाधान केवल विशेष अदालतों की संख्या बढ़ाने से संभव नहीं है। इसके लिए न्यायाधीशों की नियुक्ति में तेजी, आधुनिक न्यायिक अवसंरचना का विकास, जांच एवं अभियोजन प्रणाली का सुदृढ़ीकरण, फॉरेंसिक क्षमता का विस्तार तथा न्यायालयों का व्यापक डिजिटलीकरण समान रूप से आवश्यक है। अतः फास्ट ट्रैक कोर्ट को न्यायिक सुधार के व्यापक एजेंडे के एक अंग के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि न्यायिक विलंब की समस्या का एकमात्र समाधान।