विज्ञापन की दुनिया में किसी ब्रांड की पहचान केवल उसके उत्पाद तक सीमित नहीं रहती। कई बार ब्रांड का नाम, लोगो, रंग, प्रस्तुति और प्रचार का तरीका उपभोक्ताओं के मन में एक खास उत्पाद की छवि बना देता है। यही वजह है कि तंबाकू और पान मसाला जैसे प्रतिबंधित या नियंत्रित उत्पादों के विज्ञापन पर कानून की नजर लगातार बनी रहती है। महाराष्ट्र में ‘विमल इलायची’ के विज्ञापन को लेकर उठे विवाद ने एक बार फिर सरोगेट विज्ञापन के मुद्दे को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
महाराष्ट्र खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफडीए) ने अभिनेता शाहरुख खान, अजय देवगन और टाइगर श्रॉफ को ‘विमल इलायची’ के विज्ञापन में भूमिका निभाने को लेकर नोटिस जारी किया है। एफडीए का मानना है कि विज्ञापन देखने के बाद यह सवाल उठता है कि कहीं इसके माध्यम से ‘विमल’ ब्रांड से जुड़े पान मसाला या तंबाकू उत्पाद का अप्रत्यक्ष प्रचार तो नहीं किया जा रहा। विभाग ने अभिनेताओं से 15 दिनों के भीतर जवाब मांगा है और विज्ञापन से जुड़ी सामग्री हटाने का निर्देश भी दिया है।
क्या है सरोगेट विज्ञापन?
सरोगेट विज्ञापन वह तरीका है, जिसमें किसी ऐसे उत्पाद या सेवा का प्रचार किया जाता है जिसका नाम किसी प्रतिबंधित या विज्ञापन पर रोक वाले उत्पाद से जुड़ा होता है। उदाहरण के तौर पर, यदि किसी तंबाकू या पान मसाला ब्रांड के नाम से इलायची, माउथ फ्रेशनर या कोई अन्य उत्पाद बाजार में पेश किया जाए और उसके विज्ञापन में उसी ब्रांड की पहचान का इस्तेमाल हो, तो नियामक यह जांच कर सकते हैं कि इसका वास्तविक उद्देश्य क्या है।
महाराष्ट्र एफडीए ने ‘विमल इलायची’ के मामले में इसी पहलू पर सवाल उठाया है। विभाग के अनुसार, विज्ञापन की प्रकृति, ब्रांड की पहचान, दृश्य प्रस्तुति, संवाद, उत्पाद का नाम और बाजार में ब्रांड की छवि को एक साथ देखा जाना चाहिए। यदि इलायची जैसे उत्पाद के बहाने किसी पान मसाला या तंबाकू उत्पाद की ब्रांड पहचान को मजबूत किया जा रहा है, तो यह केवल एक स्वतंत्र उत्पाद का विज्ञापन नहीं रह जाता।
यहां सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि उपभोक्ता विज्ञापन को किस रूप में समझता है। यदि किसी ब्रांड का नाम पहले से ही पान मसाला या तंबाकू उत्पाद से जुड़ा हुआ है, तो उसी नाम और पहचान के साथ दूसरे उत्पाद का प्रचार उस ब्रांड की व्यापक पहचान को बनाए रखने में मदद कर सकता है। यही संभावना सरोगेट विज्ञापन को लेकर चिंता का आधार बनती है।
कानून के दायरे में विज्ञापन
महाराष्ट्र एफडीए ने इस मामले में कई कानूनी प्रावधानों का उल्लेख किया है। इनमें खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006 की धारा 24 प्रमुख है। यह प्रावधान खाद्य पदार्थों से संबंधित भ्रामक विज्ञापनों और अनुचित व्यापार गतिविधियों पर रोक लगाने से जुड़ा है।
इसके अलावा, खाद्य सुरक्षा एवं मानक (विज्ञापन और दावे) विनियम, 2018 के तहत विज्ञापन को सत्य, स्पष्ट और गैर-भ्रामक होना आवश्यक है। किसी खाद्य उत्पाद के बारे में ऐसा दावा नहीं किया जा सकता जो उपभोक्ताओं को भ्रमित करे या उसके अत्यधिक सेवन को प्रोत्साहित करे।
एफडीए ने खाद्य सुरक्षा एवं मानक (बिक्री पर प्रतिबंध और निषेध) विनियम, 2011 का भी उल्लेख किया है। विभाग का कहना है कि पान मसाला एफएसएसएआई के नियामक ढांचे के अंतर्गत आता है और इसके निर्माण, बिक्री, विपणन और विज्ञापन से संबंधित नियमों का पालन आवश्यक है।
इसके साथ ही, विज्ञापन को केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (सीसीपीए) की 2022 की भ्रामक विज्ञापनों और एंडोर्समेंट से संबंधित गाइडलाइंस तथा सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पाद अधिनियम, 2003 (सीओटीपीए) के प्रावधानों के संदर्भ में भी देखा जा रहा है।
सेलिब्रिटी एंडोर्समेंट की जिम्मेदारी
इस पूरे विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू सेलिब्रिटी एंडोर्समेंट भी है। आज कंपनियां अपने ब्रांड को लोकप्रिय बनाने के लिए फिल्मी सितारों और चर्चित हस्तियों का सहारा लेती हैं। किसी लोकप्रिय अभिनेता का किसी उत्पाद के साथ जुड़ना उसकी विश्वसनीयता और बाजार में पहचान को बढ़ा सकता है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि किसी विज्ञापन में काम करने से पहले सेलिब्रिटी को उत्पाद और उससे जुड़े कानूनी पहलुओं की कितनी जांच करनी चाहिए।
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 21 के तहत केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण भ्रामक विज्ञापन को रोकने या उसमें बदलाव करने का निर्देश दे सकता है। एंडोर्सर पर पहली बार उल्लंघन की स्थिति में 10 लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है, जबकि दोबारा उल्लंघन पर यह राशि 50 लाख रुपये तक पहुंच सकती है। गंभीर स्थिति में एंडोर्सर को एक वर्ष तक किसी उत्पाद का प्रचार करने से रोका जा सकता है और दोबारा उल्लंघन पर यह अवधि तीन वर्ष तक हो सकती है।
अब आगे क्या होगा?
नोटिस जारी होने के बाद अभिनेताओं को 15 दिनों के भीतर अपना पक्ष रखना होगा। उन्हें व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना जरूरी नहीं है। वे स्वयं या अपने अधिकृत प्रतिनिधि के माध्यम से लिखित जवाब और संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत कर सकते हैं।
यदि वे व्यक्तिगत सुनवाई चाहते हैं, तो इसकी मांग अपने लिखित जवाब में कर सकते हैं। इसके बाद उन्हें प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के तहत सुनवाई का अवसर दिया जाएगा।
यदि निर्धारित अवधि में जवाब नहीं दिया जाता या प्रस्तुत स्पष्टीकरण संतोषजनक नहीं पाया जाता, तो एफडीए खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम के तहत आगे की कार्रवाई कर सकता है।
सिर्फ एक विज्ञापन का मामला नहीं
‘विमल इलायची’ विवाद को केवल तीन अभिनेताओं को मिले नोटिस तक सीमित करके देखना उचित नहीं होगा। यह मामला भारत में विज्ञापन, ब्रांड पहचान और उपभोक्ता संरक्षण के बीच मौजूद जटिल संबंध को सामने लाता है। खासकर तब, जब किसी ब्रांड का नाम ऐसे उत्पादों से जुड़ा हो जिनके प्रत्यक्ष विज्ञापन पर कानूनी प्रतिबंध हैं।
सरोगेट विज्ञापन पर कार्रवाई का उद्देश्य केवल किसी कंपनी या सेलिब्रिटी को दंडित करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि प्रतिबंधित उत्पादों का प्रचार किसी दूसरे उत्पाद के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप से न हो। वहीं दूसरी ओर, किसी विज्ञापन को सरोगेट प्रचार मानने के लिए उसके वास्तविक उद्देश्य, प्रस्तुति और उपभोक्ता पर पड़ने वाले प्रभाव का स्पष्ट आकलन भी जरूरी है।
महाराष्ट्र एफडीए का यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे विज्ञापन उद्योग में यह संदेश जाता है कि केवल उत्पाद का नाम बदल देने से किसी ब्रांड की वास्तविक प्रचार रणनीति कानून की नजर से बाहर नहीं हो सकती। आने वाले समय में इस मामले में दिए जाने वाले स्पष्टीकरण और नियामक की आगे की कार्रवाई यह तय करने में महत्वपूर्ण होगी कि ‘विमल इलायची’ का विज्ञापन वास्तव में एक स्वतंत्र उत्पाद का प्रचार था या इसके जरिए किसी प्रतिबंधित उत्पाद की ब्रांड पहचान को मजबूत करने की कोशिश की गई।