अरुणाचल में भारत-चीन के बीच पहली कोर कमांडर स्तर की वार्ता
संदर्भ
भारत और चीन के बीच सीमा पर सैन्य तनाव को नियंत्रित करने की कोशिशों के बीच अरुणाचल प्रदेश में पहली बार कोर कमांडर स्तर की वार्ता हुई है। यह बैठक अरुणाचल प्रदेश के किबिथू सेक्टर स्थित वाचा-दमाई सीमा कार्मिक बैठक बिंदु पर आयोजित की गई। पूर्वी क्षेत्र में इस स्तर की सैन्य बातचीत की शुरुआत को भारत-चीन सीमा प्रबंधन के लिहाज से महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
यह वार्ता ऐसे समय हुई है जब ऊपरी सुबनसिरी जिले के ताकसिंग इलाके में चीनी गतिविधियों और कथित घुसपैठ को लेकर चिंता की खबरें सामने आई हैं। सूत्रों के अनुसार, किसी भी संभावित तनाव को बढ़ने से रोकने के लिए भारतीय सैनिक क्षेत्र में पर्याप्त संख्या में तैनात हैं।
पहली बार पूर्वी सेक्टर में ऐसा संवाद
अब तक भारत और चीन के बीच कोर कमांडर स्तर की बातचीत मुख्य रूप से पूर्वी लद्दाख के चुशुल-मोल्डो बैठक बिंदु पर होती रही है। जून 2020 की गलवान घाटी हिंसक झड़प के बाद इस सैन्य संवाद तंत्र का महत्व काफी बढ़ गया था। लद्दाख में दोनों देशों के बीच अब तक ऐसी 23 दौर की वार्ताएं हो चुकी हैं और आखिरी दौर अक्टूबर 2025 में हुआ था।
अरुणाचल प्रदेश में इस तंत्र का विस्तार इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे सीमा विवाद के प्रबंधन के लिए लद्दाख से आगे एक नया सैन्य संवाद चैनल तैयार हुआ है। माना जा रहा है कि दोनों देश अलग-अलग क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर उत्पन्न तनाव को नियंत्रित करने के लिए संवाद के अतिरिक्त रास्ते विकसित कर रहे हैं।
वाचा-दमाई में हुई बैठक का नेतृत्व भारतीय सेना की 3 कोर के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल गिरीश कालिया ने किया। 3 कोर का मुख्यालय नागालैंड के रंगापहार में है। अरुणाचल प्रदेश में भारतीय सेना की तैनाती और संचालन के लिए 3 कोर के अलावा तेजपुर स्थित 4 कोर भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
ताकसिंग की स्थिति के बीच हुई बैठक
अरुणाचल के ऊपरी सुबनसिरी जिले का ताकसिंग क्षेत्र हाल के दिनों में चर्चा में रहा है। यहां चीनी गतिविधियों और कथित सीमा उल्लंघन को लेकर चिंता जताई गई है। खास बात यह है कि जुलाई के बाद भारत और चीन के बीच उच्चस्तरीय कूटनीतिक बातचीत के बावजूद स्थानीय स्तर पर तनाव की स्थिति बनी रही।
ऐसे माहौल में कोर कमांडर स्तर की बैठक का उद्देश्य किसी संभावित टकराव को रोकने, जमीनी स्थिति पर संवाद बनाए रखने और दोनों सेनाओं के बीच संचार को मजबूत करना माना जा रहा है।
कूटनीतिक वार्ताओं से भी जुड़ी कड़ी
अरुणाचल में सैन्य बातचीत हाल के महीनों में भारत-चीन के बीच बढ़े कूटनीतिक संपर्कों की कड़ी भी है। 6 अगस्त को सीमा मामलों पर परामर्श और समन्वय के लिए कार्य तंत्र की 36वीं बैठक हुई थी। इसके बाद 25-26 अगस्त को बीजिंग में सीमा प्रश्न पर विशेष प्रतिनिधियों की 25वीं वार्ता आयोजित हुई।
इस वार्ता में भारत की ओर से राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और चीन की ओर से वांग यी ने भाग लिया। दोनों पक्षों ने आठ बिंदुओं वाले परिणाम दस्तावेज पर सहमति जताई। इसमें दो नए सीमा कार्मिक बैठक बिंदु बनाने और नए हॉटलाइन तंत्र विकसित करने जैसे कदम शामिल हैं।
ब्रिक्स से पहले बढ़ी अहमियत
अरुणाचल में यह सैन्य वार्ता ऐसे समय हुई है जब भारत 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने जा रहा है। चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग के इसमें शामिल होने की उम्मीद है। शी की पिछली भारत यात्रा अक्टूबर 2019 में मामल्लपुरम में हुई अनौपचारिक बैठक के दौरान हुई थी।
2020 के लद्दाख गतिरोध के बाद भारत-चीन संबंधों में आई गिरावट को कम करने के प्रयास पिछले कुछ समय से तेज हुए हैं। अक्टूबर 2024 में रूस के कजान में ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शी चिनफिंग की मुलाकात को इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण मोड़ माना गया। इसके बाद देपसांग मैदान और डेमचोक जैसे क्षेत्रों में सैनिकों के पीछे हटने और गश्त से जुड़े समझौते की दिशा में प्रगति हुई।
संवाद के साथ सतर्कता भी जरूरी
विशेषज्ञों के अनुसार, अरुणाचल में कोर कमांडर स्तर की वार्ता और नए हॉटलाइन तंत्र सकारात्मक कदम हैं, लेकिन इन्हें सीमा विवाद के समाधान के रूप में नहीं देखा जा सकता। वास्तविक नियंत्रण रेखा को लेकर दोनों देशों की अलग-अलग धारणाएं, सीमा पर बुनियादी ढांचे का निर्माण और सैन्य क्षमताओं में वृद्धि भविष्य में तनाव की संभावना बनाए रखती है।
इसलिए संवाद के साथ मजबूत सैन्य तैयारी, स्पष्ट समझौते और उन पर लगातार अमल जरूरी होगा। इसी क्रम में सेना प्रमुख जनरल धीरज सेठ ने हाल में 3 कोर मुख्यालय का दौरा कर सीमा क्षेत्र में अभियानगत तैयारी और युद्धक क्षमता की समीक्षा की।
अरुणाचल में पहली कोर कमांडर स्तर की वार्ता भारत-चीन सीमा प्रबंधन को अधिक व्यापक और बहु-क्षेत्रीय बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण संकेत है। हालांकि, स्थायी शांति के लिए केवल बातचीत पर्याप्त नहीं होगी। सीमा पर निरंतर सतर्कता, भरोसेमंद सैन्य क्षमता और राजनीतिक-कूटनीतिक संवाद इन तीनों के बीच संतुलन ही आगे की राह तय करेगा।