वन से बाजार तक: आदिवासी अर्थव्यवस्था को नई ताकत देता पीएमजेवीएम
संदर्भ
भारत के जंगलों में रहने वाले लाखों आदिवासी परिवारों के लिए लघु वन उत्पाद (एमएफपी) केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि उनकी आजीविका और स्थानीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। शहद, तेंदू पत्ते, महुआ के फूल, इमली, लाख, बांस और जंगली जड़ी-बूटियां जैसे उत्पाद आदिवासी समुदायों की आय का महत्वपूर्ण स्रोत हैं। अनुमानतः कई परिवारों की वार्षिक आय में एमएफपी की हिस्सेदारी करीब 20 से 40 प्रतिशत तक होती है। इसके बावजूद लंबे समय तक बिचौलियों की भूमिका के कारण उत्पाद संग्राहकों को उनके उत्पाद का वास्तविक बाजार मूल्य नहीं मिल पाता था।
इसी चुनौती को दूर करने के उद्देश्य से सरकार ने प्रधानमंत्री जनजातीय विकास मिशन (पीएमजेवीएम) को एक व्यवस्थित हस्तक्षेप के रूप में आगे बढ़ाया है। वर्ष 2021-22 में शुरू किए गए इस मिशन का उद्देश्य आदिवासी समुदायों को केवल वन उत्पादों के संग्रह तक सीमित रखने के बजाय उन्हें मूल्यवर्धन, प्रसंस्करण, विपणन और बाजार से सीधे जोड़ना है। इससे वन उत्पादों की कीमत बढ़ाने के साथ आदिवासी परिवारों की आय में भी वृद्धि की संभावनाएं पैदा हुई हैं।
एमएफपी को मिला कानूनी आधार
लघु वन उत्पादों पर आदिवासी समुदायों की निर्भरता को कानूनी मान्यता देने में वन अधिकार अधिनियम, 2006 महत्वपूर्ण रहा है। अधिनियम में लघु वन उपज के अंतर्गत पौधों से प्राप्त गैर-काष्ठ वन उत्पादों को शामिल किया गया है। इनमें बांस, बेंत, टसर, शहद, मोम, लाख, तेंदू पत्ते, औषधीय पौधे, जड़ी-बूटियां, जड़ें और कंद जैसी अनेक वस्तुएं शामिल हैं।
वन अधिकार अधिनियम आदिवासी और अन्य पारंपरिक वनवासी समुदायों को गैर-काष्ठ वन उत्पादों के संग्रह और खरीद-बिक्री से जुड़े अधिकार प्रदान करता है। वहीं, पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम यानी पेसा कानून, 1996 के प्रावधान अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम पंचायतों को लघु वन उत्पादों पर स्वामित्व संबंधी अधिकार प्रदान करते हैं।
इन कानूनी प्रावधानों को आर्थिक अवसरों में बदलने के लिए सरकार ने लघु वन उत्पादों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की व्यवस्था विकसित की है। वर्तमान में 87 लघु वन उत्पादों के लिए एमएसपी अधिसूचित किया गया है। इससे बाजार कीमतों में उतार-चढ़ाव के बावजूद आदिवासी संग्राहकों को एक सुनिश्चित मूल्य का आधार मिलता है।
बिचौलियों से सीधे बाजार तक
जनजातीय उत्पादों के विपणन और विकास की जिम्मेदारी निभाने वाली ट्राइफेड (TRIFED) राज्य कार्यान्वयन एजेंसियों, जनजातीय सहकारी समितियों और वन विकास निगमों के नेटवर्क के माध्यम से एमएफपी की खरीद में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। पूर्व-निर्धारित एमएसपी पर खरीद से आदिवासी संग्राहकों को अपनी उपज मजबूरी में कम कीमत पर बेचने की स्थिति से राहत मिलती है।
वर्ष 2013-14 से राज्यों द्वारा इस व्यवस्था के तहत 693.98 करोड़ रुपये मूल्य के 2,67,954 मीट्रिक टन वन उत्पादों की खरीद की जा चुकी है। यह आंकड़ा बताता है कि सरकारी खरीद व्यवस्था ने वन उत्पादों को संगठित बाजार से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
वन धन केंद्र बने बदलाव के केंद्र
पीएमजेवीएम के तहत आदिवासी संग्राहकों को स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) में संगठित कर वन धन विकास केंद्रों (वीडीवीके) से जोड़ा जाता है। सामान्यतः करीब 300 आदिवासी सदस्यों वाले 15 एसएचजी को एक वीडीवीके के रूप में संगठित किया जाता है और केंद्र में कम से कम 60 प्रतिशत सदस्य अनुसूचित जनजाति समुदाय से होने चाहिए।
वन धन योजना, जिसे 14 अप्रैल 2018 को शुरू किया गया था, इसी मॉडल की आधारशिला है। इसका उद्देश्य वन उत्पादों के केवल संग्रह और बिक्री के बजाय स्थानीय स्तर पर उनका प्रसंस्करण और मूल्यवर्धन करना है। इससे कच्चे उत्पादों को तैयार उत्पादों में बदलकर अधिक आय अर्जित करने का अवसर मिलता है।
कौशल और तकनीक से बढ़ता मूल्य
वीडीवीके के माध्यम से आदिवासी समुदायों को वैज्ञानिक तरीके से वन उत्पादों की कटाई, प्रसंस्करण और मूल्यवर्धन का प्रशिक्षण दिया जाता है। इसके साथ ही एसएचजी को स्थानीय जरूरतों के अनुसार प्राथमिक प्रसंस्करण उपकरण उपलब्ध कराए जाते हैं। इनमें काटने और छंटाई के उपकरण, छिलका उतारने वाली मशीनें, ड्रायर और पैकेजिंग उपकरण शामिल हैं।
इन्फ्रास्ट्रक्चर सहायता, प्रशिक्षण, कच्चा माल और प्रशिक्षु किट के साथ-साथ कार्यशील पूंजी की व्यवस्था के लिए वित्तीय संस्थानों, बैंकों और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति वित्त एवं विकास निगम (NSTFDC) से भी सहयोग लिया जाता है। भंडारण और परिवहन जैसी सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जाती हैं।
इसका सीधा लाभ यह है कि आदिवासी समुदाय केवल उत्पाद बेचने वाला संग्राहक नहीं रह जाता, बल्कि वह उत्पादक, प्रसंस्करणकर्ता और उद्यमी बनने की दिशा में आगे बढ़ता है।
हाट से ई-कॉमर्स तक
आदिवासी उत्पादों के लिए बाजार उपलब्ध कराना पीएमजेवीएम का एक महत्वपूर्ण पक्ष है। स्थानीय हाटों को प्राथमिक खरीद केंद्र के रूप में विकसित किया जा रहा है। आदिवासी क्षेत्रों में ऐसे 5,000 से अधिक हाट हैं। इनके आधुनिकीकरण के तहत स्थायी ढांचे, भंडारण, पेयजल, छाया और वजन मापने की सुविधाओं को विकसित किया जा रहा है।
इसके साथ ही वीडीवीके स्थानीय बाजारों से आगे बढ़कर दूरस्थ और डिजिटल बाजारों तक पहुंच बना सकते हैं। ट्राइफेड द्वारा दैनिक बाजार दरों और ई-कॉमर्स के अवसरों से संबंधित जानकारी उपलब्ध कराई जाती है। त्योहारों, प्रदर्शनियों और कारीगर मेलों के जरिए आदिवासी उत्पादों की ब्रांडिंग और प्रचार भी किया जाता है।
भौगोलिक संकेतक (जीआई), डिजिटल प्लेटफॉर्म, उत्पादों की जियो-टैगिंग और अनुसंधान एवं विकास जैसी पहलें भी आदिवासी उत्पादों को व्यापक पहचान दिलाने में सहायक हैं।
जमीनी स्तर पर दिख रहा असर
31 जुलाई 2026 तक पीएमजेवीएम के तहत 4,172 वन धन विकास केंद्र स्वीकृत किए जा चुके हैं, जिनमें से 2,911 केंद्र कार्यरत हैं। इन केंद्रों से जुड़े सदस्यों की संख्या 12.48 लाख बताई गई है, जबकि रिपोर्ट की गई बिक्री लगभग 168 करोड़ रुपये तक पहुंच चुकी है।
ये आंकड़े संकेत देते हैं कि वन आधारित आजीविका को संगठित उद्यम में बदलने की प्रक्रिया गति पकड़ रही है। हालांकि, इस व्यवस्था की सफलता आगे भी बाजार तक स्थायी पहुंच, बेहतर प्रसंस्करण क्षमता, पारदर्शी मूल्य निर्धारण और उत्पादों की गुणवत्ता बनाए रखने पर निर्भर करेगी।
सामुदायिक स्वामित्व से सतत अर्थव्यवस्था तक
पीएमजेवीएम का महत्व केवल आदिवासी आय बढ़ाने तक सीमित नहीं है। यह स्थानीय संसाधनों, पारंपरिक ज्ञान और सामुदायिक स्वामित्व को आधुनिक बाजार से जोड़कर वन-आधारित अर्थव्यवस्था का मॉडल प्रस्तुत करता है।
शहद, महुआ, इमली, लाख और औषधीय वन उत्पाद जैसे प्राकृतिक उत्पाद बेहतर गुणवत्ता, पैकेजिंग और ब्रांडिंग के जरिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहचान बना सकते हैं।
इस दृष्टि से पीएमजेवीएम ‘सबका साथ, सबका विकास’ की भावना को मजबूत करती है। बेहतर मूल्य, कौशल, बाजार और उद्यम के अवसर देकर यह आदिवासी अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर बनाने में मदद करती है। सामुदायिक अधिकारों, वन संरक्षण और बाजार अवसरों के बीच संतुलन बना रहे तो लघु वन उत्पाद लाखों परिवारों की आय बढ़ाने के साथ 2047 के विकसित भारत के लक्ष्य में सतत आदिवासी अर्थव्यवस्था की मजबूत नींव बन सकते हैं।