लंबे समय तक मासिक धर्म के रक्त को केवल शरीर से बाहर निकलने वाले जैविक अपशिष्ट के रूप में देखा गया। लेकिन विज्ञान की दुनिया में अब इस धारणा को चुनौती मिल रही है। शोधकर्ताओं के लिए मासिक धर्म का रक्त अब ऐसी जैविक सामग्री बनता जा रहा है, जिसमें बीमारी की पहचान, दवाओं के विकास और क्षतिग्रस्त ऊतकों की मरम्मत तक की संभावनाएँ छिपी हो सकती हैं।
मासिक धर्म का द्रव केवल रक्त नहीं होता। इसमें एंडोमेट्रियल ऊतक, प्रतिरक्षा कोशिकाएँ, प्रोटीन, आरएनए और डीएनए जैसे अनेक जैविक घटक मौजूद होते हैं। यही कारण है कि वैज्ञानिक इसे एक ऐसे स्रोत के रूप में देख रहे हैं, जिससे शरीर के भीतर चल रही कई प्रक्रियाओं की जानकारी अपेक्षाकृत आसान और गैर-आक्रामक तरीके से हासिल की जा सकती है।
घर से हो सकती है सर्वाइकल कैंसर की जाँच
इस क्षेत्र में सबसे दिलचस्प संभावनाओं में से एक सर्वाइकल कैंसर की शुरुआती पहचान है। परंपरागत रूप से इसके लिए चिकित्सकीय जाँच और सर्वाइकल स्वैब की आवश्यकता होती है। असहजता, खर्च, स्वास्थ्य सुविधाओं तक सीमित पहुँच और सामाजिक झिझक जैसे कारणों से अनेक महिलाएँ नियमित स्क्रीनिंग नहीं करातीं।
2025 में चीन के शोधकर्ताओं का एक बड़ा अध्ययन इस दिशा में महत्वपूर्ण संकेत लेकर आया। शोधकर्ताओं ने पाया कि सैनिटरी पैड से एकत्र किए गए मासिक धर्म के रक्त में ह्यूमन पैपिलोमावायरस (HPV) के DNA और कैंसर-पूर्व परिवर्तनों की पहचान की जा सकती है। शुरुआती परिणामों में यह तरीका चिकित्सक द्वारा लिए गए सर्वाइकल नमूनों के समान सटीक दिखाई दिया।
इसका अर्थ यह नहीं है कि पारंपरिक स्क्रीनिंग की जगह यह तरीका तुरंत ले लेगा। लेकिन यदि आगे के अध्ययनों में इसकी विश्वसनीयता साबित होती है, तो घर से नमूना देने वाली कम खर्चीली और गैर-आक्रामक स्क्रीनिंग उन लोगों तक भी पहुँच सकती है जो वर्तमान व्यवस्था में जाँच से दूर रह जाते हैं।
स्टेम सेल की अनोखी क्षमता
मासिक धर्म के रक्त का महत्व केवल निदान तक सीमित नहीं है। इसमें मौजूद स्टेम कोशिकाओं ने पुनर्योजी चिकित्सा के क्षेत्र में भी वैज्ञानिकों का ध्यान आकर्षित किया है।
2007 में शोधकर्ताओं ने मासिक धर्म के रक्त से ऐसी स्टेम कोशिकाओं को अलग किया था, जिनमें तेजी से विभाजित होने और विभिन्न प्रकार की कोशिकाओं में विकसित होने की क्षमता दिखाई दी। इनकी विशेषता का संबंध एंडोमेट्रियम से माना जाता है। गर्भाशय की यह परत हर महीने टूटती है और फिर दोबारा बनती है और यह प्रक्रिया सामान्यतः बिना स्थायी निशान के होती है।
इसी वजह से वैज्ञानिक यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि इन कोशिकाओं में ऊतक की मरम्मत से जुड़ी कौन-सी जैविक क्षमता मौजूद है। प्रयोगशालाओं में इन कोशिकाओं का इस्तेमाल गर्भाशय के ऑर्गेनॉइड बनाने में किया जा रहा है। ये छोटे, कार्यात्मक मॉडल एंडोमेट्रियोसिस जैसी बीमारियों को समझने और संभावित उपचारों का अध्ययन करने में उपयोगी हो सकते हैं।
इन कोशिकाओं का एक और लाभ यह है कि इन्हें अपेक्षाकृत गैर-आक्रामक तरीके से प्राप्त किया जा सकता है। इसकी तुलना में बोन मैरो से स्टेम सेल निकालना अधिक जटिल और दर्दनाक प्रक्रिया हो सकती है।
दिल, लीवर और दुर्लभ बीमारियों में संभावनाएँ
मासिक धर्म से प्राप्त स्टेम कोशिकाओं पर शोध अब कई बीमारियों तक पहुँच चुका है। 2025 में चीन में हुए एक प्रयोगात्मक अध्ययन में इन कोशिकाओं ने Niemann-Pick disease type C1 जैसे गंभीर आनुवंशिक रोग के मॉडल में न्यूरोइन्फ्लेमेशन और कोशिका मृत्यु को कम किया।
इसी तरह 2023 के एक अध्ययन में पाया गया कि इन कोशिकाओं और उनसे प्राप्त conditioned medium के इस्तेमाल से हार्ट अटैक के बाद चूहों के हृदय की रिकवरी में मदद मिली।
यकृत से जुड़े शोध में भी इन कोशिकाओं ने संभावनाएँ दिखाई हैं। वैज्ञानिकों ने पाया है कि ये उन कोशिकाओं की गतिविधि को दबा सकती हैं जो लीवर में फाइब्रोसिस और दाग बनने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
एक और दिलचस्प संभावना कैंसर उपचार की है। चूँकि ये कोशिकाएँ सूजन और ट्यूमर वाले क्षेत्रों की ओर आकर्षित हो सकती हैं, इसलिए भविष्य में इन्हें इस तरह इंजीनियर करने की कल्पना की जा रही है कि वे उपचारात्मक जीन को सीधे ट्यूमर तक पहुँचा सकें। हालांकि यह अभी प्रयोगात्मक स्तर पर है।
स्टेम सेल से आगे: एक्स्ट्रासेल्युलर वेसिकल्स
शोध का अगला महत्वपूर्ण क्षेत्र एक्स्ट्रासेल्युलर वेसिकल्स यानी ईवी हैं। ये पूरी कोशिकाएँ नहीं बल्कि छोटे जैविक पैकेज होते हैं, जिनमें प्रोटीन, लिपिड और आरएनए जैसे सिग्नलिंग अणु मौजूद होते हैं।
ईवी की खासियत यह है कि वे स्वयं विभाजित होकर दूसरे ऊतक में बदल नहीं सकते। इसलिए वैज्ञानिक इन्हें पूरे स्टेम सेल की तुलना में अधिक नियंत्रित और संभावित रूप से सुरक्षित उपचार माध्यम मान रहे हैं।
2026 में प्रकाशित एक उल्लेखनीय अध्ययन में लिथुआनिया के शोधकर्ताओं ने स्वस्थ दाताओं से प्राप्त ईवी को मानव कार्टिलेज कोशिकाओं पर प्रयोग किया। इन कोशिकाओं ने ईवी को तेजी से ग्रहण किया और नया एक्स्ट्रासेल्युलर मैट्रिक्स बनाना शुरू किया। सूजन की स्थिति में ईवी ने कार्टिलेज के क्षरण से जुड़े संकेतकों को भी कम किया।
शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि ईवी ने कार्टिलेज कोशिकाओं में प्रोजेस्टेरोन रिसेप्टर की अभिव्यक्ति बढ़ाई। इससे भविष्य में ऑस्टियोआर्थराइटिस जैसे रोगों के उपचार की नई दिशा खुल सकती है।
उम्मीद के साथ सावधानी भी जरूरी
इन उपलब्धियों के बावजूद मासिक धर्म के रक्त से प्राप्त स्टेम सेल या ईवी अभी नियमित चिकित्सा उपचार नहीं बन गए हैं। इनके सामने कई सवाल हैं –
शरीर में पहुँचने के बाद कोशिकाएँ कितने समय तक जीवित रहती हैं,
उनकी दीर्घकालिक सुरक्षा कितनी है और
अलग-अलग दाताओं से प्राप्त कोशिकाओं के गुण कितने बदलते हैं।
उम्र, हार्मोनल स्थिति, गर्भनिरोधक इतिहास और प्रयोगशाला में कोशिकाओं को विकसित करने की परिस्थितियाँ इनके व्यवहार को प्रभावित कर सकती हैं। इसके अलावा, अभी इनके उत्पादन और गुणवत्ता जाँच के लिए पूरी तरह मानकीकृत प्रक्रियाएँ भी विकसित नहीं हुई हैं।
फिर भी, इन चुनौतियों को शुरुआती जैव-चिकित्सकीय शोध की स्वाभाविक प्रक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए। मासिक धर्म के रक्त को कभी जिस सामग्री को बेकार समझकर फेंक दिया जाता था, वही अब वैज्ञानिकों को बीमारी की शुरुआती पहचान और क्षतिग्रस्त ऊतकों की मरम्मत के लिए नए रास्ते दिखा रहा है।
आने वाले वर्षों में यह स्पष्ट होगा कि इन प्रयोगशाला-आधारित संभावनाओं में से कितनी वास्तविक उपचारों में बदल पाती हैं। लेकिन इतना तय है कि मासिक धर्म के रक्त को लेकर विज्ञान की नजर बदल चुकी है।