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निष्क्रिय लाभार्थी से सक्रिय नागरिक तक

परिचय

भारत का विकास दृष्टिकोण समय के साथ ‘राज्य-केंद्रित कल्याण मॉडल से लेकर नागरिकों को सक्रिय विकास एजेंट मानने वाले सहभागी लोकतंत्र तक’ बदलता रहा है। सहभागी शासन (Participatory Governance) समावेशन, जवाबदेही एवं संधारणीयता सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण है, विशेषकर जलवायु परिवर्तन व शहरीकरण जैसी चुनौतियों के बीच।

राज्य-केंद्रित से सहभागी विकास की ओर बदलाव

प्रारंभिक चरण (1950–1970 के दशक)

पंचवर्षीय योजनाओं में औद्योगिकीकरण, कृषि एवं अवसंरचना को प्राथमिकता दी गई। नागरिकों को निष्क्रिय लाभार्थी माना गया और केंद्रीकृत विशेषज्ञता हावी रही। इससे स्वामित्व में कमी, कमजोर स्थायित्व और संसाधनों के अप्रभावी उपयोग जैसी समस्याएँ पैदा हुईं।

मॉडल पर पुनर्विचार (1970–1980 के दशक)

स्थानीय स्तर के अनुभवों ने शीर्ष-से-नीचे योजनाओं की सीमाएँ उजागर कीं। पारंपरिक सामुदायिक सहयोग और सामूहिक निर्णय लेने की प्रथाओं को मान्यता मिली।

प्रारंभिक सहभागी प्रयोग (1980–1990 के दशक)

  • सामाजिक वन (Social Forestry, 1976) और संयुक्त वन प्रबंधन (Joint Forest Management, 1988–90) ने ग्राम वन समितियों के माध्यम से समुदायों को शामिल किया।
  • जलाधार कार्यक्रम (IWDP 1989; NWDPRA 1990–91) ने उपयोगकर्ता समूहों और सूक्ष्म-योजना (Micro-Planning) को संस्थागत बनाया।
  • DPEP (1994) ने ग्राम शिक्षा समितियों और सामुदायिक सहभागिता को बढ़ावा दिया।

सहभागिता का संवैधानिकीकरण

73वें और 74वें संविधान संशोधनों (1992–93) ने पंचायती राज संस्थाओं (PRIs) और नगर निकायों (ULBs) को सुदृढ़ किया। ग्राम सभाएँ, वार्ड समितियाँ और जिला योजना निकायों ने नागरिकों को योजना और निगरानी में शामिल किया। परियोजना-आधारित सहभागिता से वैधानिक प्रशासन में बदलाव हुआ।

सामूहिक संस्थाओं का विस्तार (1990 के दशक के बाद)

  • SGSY (1999) के तहत स्वयं-सहायता समूहों (SHGs) ने महिलाओं को आर्थिक और राजनीतिक रूप से सशक्त बनाया।
  • राष्ट्रीय FPO नीति (2013) और 10,000 FPO योजना (2020) के बाद किसान उत्पादक संगठन (FPOs) ने सामूहिक सौदेबाजी को बढ़ावा दिया।
  • GPDP (2015) ने ग्राम पंचायत स्तर पर वार्षिक सहभागी योजना को संस्थागत किया।

निष्कर्ष

भारत का अनुभव दिखाता है कि स्थानीय निर्वाचित प्रशासन के साथ सहभागी विकास लोकतंत्र को मज़बूत करता है। सहभागिता केवल विकास का उपकरण नहीं है बल्कि लोकतांत्रिक नागरिकता की नींव भी है जो समुदायों को निर्णय, संसाधनों एवं परिणामों को आकार देने का अधिकार देती है।

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