भारत का विकास दृष्टिकोण समय के साथ ‘राज्य-केंद्रित कल्याण मॉडल से लेकर नागरिकों को सक्रिय विकास एजेंट मानने वाले सहभागी लोकतंत्र तक’ बदलता रहा है। सहभागी शासन (Participatory Governance) समावेशन, जवाबदेही एवं संधारणीयता सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण है, विशेषकर जलवायु परिवर्तन व शहरीकरण जैसी चुनौतियों के बीच।
पंचवर्षीय योजनाओं में औद्योगिकीकरण, कृषि एवं अवसंरचना को प्राथमिकता दी गई। नागरिकों को निष्क्रिय लाभार्थी माना गया और केंद्रीकृत विशेषज्ञता हावी रही। इससे स्वामित्व में कमी, कमजोर स्थायित्व और संसाधनों के अप्रभावी उपयोग जैसी समस्याएँ पैदा हुईं।
स्थानीय स्तर के अनुभवों ने शीर्ष-से-नीचे योजनाओं की सीमाएँ उजागर कीं। पारंपरिक सामुदायिक सहयोग और सामूहिक निर्णय लेने की प्रथाओं को मान्यता मिली।
73वें और 74वें संविधान संशोधनों (1992–93) ने पंचायती राज संस्थाओं (PRIs) और नगर निकायों (ULBs) को सुदृढ़ किया। ग्राम सभाएँ, वार्ड समितियाँ और जिला योजना निकायों ने नागरिकों को योजना और निगरानी में शामिल किया। परियोजना-आधारित सहभागिता से वैधानिक प्रशासन में बदलाव हुआ।
भारत का अनुभव दिखाता है कि स्थानीय निर्वाचित प्रशासन के साथ सहभागी विकास लोकतंत्र को मज़बूत करता है। सहभागिता केवल विकास का उपकरण नहीं है बल्कि लोकतांत्रिक नागरिकता की नींव भी है जो समुदायों को निर्णय, संसाधनों एवं परिणामों को आकार देने का अधिकार देती है।
Our support team will be happy to assist you!