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वैश्विक खनन और जल संकट: ऊर्जा संक्रमण के समक्ष एक मूक चुनौती

संदर्भ 

अंतर्राष्ट्रीय परिषद ऑन माइनिंग एंड मेटल्स (ICMM) द्वारा जारी ग्लोबल माइनिंग एंड मेटल्स वाटर डेटासेट रिपोर्ट ने वैश्विक संधारणीयता और संसाधन प्रबंधन के क्षेत्र में एक गंभीर चिंता को रेखांकित किया है। यह रिपोर्ट इस बात का प्रामाणिक दस्तावेज है कि विश्वभर की लगभग दो-तिहाई खनन और धातु प्रसंस्करण इकाइयां गंभीर भौतिक जल जोखिमों के साए में संचालित हो रही हैं। जैसे-जैसे वैश्विक अर्थव्यवस्था जीवाश्म ईंधनों से हरित ऊर्जा की ओर अग्रसर हो रही है, यह जल संकट स्वच्छ ऊर्जा के वैश्वीकरण के मार्ग में एक अवरोधक के रूप में उभर रहा है।   

रिपोर्ट में अंतर्निहित प्रमुख निष्कर्ष 

यह रिपोर्ट 148 देशों की 12,000 खनन एवं धातु प्रसंस्करण सुविधाओं का एक व्यापक और बहुआयामी क्रॉस-कमोडिटी विश्लेषण प्रस्तुत करती है, जिसमें निम्नलिखित मुख्य प्रवृत्तियां सामने आई हैं: 

  • आधारभूत जल तनाव (Baseline Water Stress): वैश्विक स्तर पर 38% खनन सुविधाएं अत्यधिक जल-तनाव या शुष्क क्षेत्रों में अवस्थित हैं। इनमें से 70% से अधिक इकाइयां तीव्र जल क्षय (Water Depletion) का सामना कर रही हैं, जो कुल वैश्विक सुविधाओं का 27% है। 
  • सूखे की विकरालता: विश्लेषित वैश्विक इकाइयों में से 27% को उच्च सूखा जोखिम का सामना करना पड़ रहा है। अफ्रीका और मध्य एशिया जैसे क्षेत्रों में यह जोखिम 81% तक पहुंच जाता है, जबकि जाम्बिया, घाना और उज्बेकिस्तान में यह शत-प्रतिशत (100%) है। 
  • रिफाइनिंग सेक्टर में बाढ़ का जोखिम: हालांकि वैश्विक बाढ़ जोखिम 14% है, किंतु इस्पात उत्पादन (27%), एलुमिना रिफाइनिंग (27%) और एल्यूमीनियम स्मेल्टिंग (24%) जैसे विशिष्ट परिष्करण चरण अत्यधिक संवेदनशील हैं। 
  • भौगोलिक संकेंद्रण और कंपाउंड रिस्क: चिली, पेरू, पश्चिमी अमेरिका, दक्षिणी अफ्रीका और मध्य भारत जैसे क्षेत्र एक साथ तीन या अधिक भौतिक जल जोखिमों (कंपाउंड रिस्क हॉटस्पॉट) का सामना कर रहे हैं। उदाहरणस्वरूप, तांबा और लिथियम के प्रमुख उत्पादक चिली में 86% सुविधाएं एक साथ जल तनाव और उच्च अंतर-वार्षिक परिवर्तनशीलता से ग्रस्त हैं।  

खनन एवं जलीय पारिस्थितिकी के मध्य अंतर्क्रिया 

  • खनन क्षेत्र प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से जल संसाधनों पर भारी दबाव डालता है। खनिज शोधन, डस्ट सप्रेशन के लिए भारी मात्रा में जल का निष्कर्षण स्थानीय समुदायों के साथ प्रत्यक्ष प्रतिस्पर्धा उत्पन्न करता है। 
  • इसके अतिरिक्त, खदानों के विवटन (Dewatering) के लिए अनवरत भूजल दोहन से क्षेत्रीय जलस्तर नीचे गिरता है, जिससे जलीय संतुलन बिगड़ता है। टेलिंग्स (अपशिष्ट) के अव्यवस्थित संचयन और अम्लीय खदान जल निकासी से नदी घाटियों के संदूषण का गंभीर खतरा पैदा होता है, जो अंततः मृदा अपरदन और आकस्मिक बाढ़ की विभीषिका को और बढ़ाता है।

ऊर्जा संक्रमण और भू-राजनीतिक निहितार्थ 

  • यह जल संकट केवल एक पर्यावरणीय समस्या नहीं है, बल्कि यह रणनीतिक आर्थिक सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। कॉपर, लिथियम, निकेल और दुर्लभ भू-तत्व जैसे ऊर्जा संक्रमण खनिज (Energy Transition Minerals) अत्यधिक जल-संवेदनशील क्षेत्रों में स्थित हैं। 
  • जल की कमी के कारण होने वाले उत्पादन अवरोध इन खनिजों की आपूर्ति श्रृंखला को बाधित कर सकते हैं, जिससे वैश्विक स्तर पर मूल्य अस्थिरता उत्पन्न होगी। इसके साथ ही, जल संसाधनों पर स्थानीय कृषि समुदायों और खनन उद्योगों के बीच बढ़ता संघर्ष सामाजिक अशांति और लाइसेंस टू ऑपरेट के संकट को जन्म दे सकता है।  

नीतिगत निहितार्थ और संधारणीय समाधान 

इस संकट से निपटने के लिए पारंपरिक और प्रतिक्रियात्मक जल प्रबंधन की परिपाटी को त्यागना होगा। इसके लिए निम्नलिखित नीतिगत उपायों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए:  

  • जलग्रहण-आधारित दृष्टिकोण (Catchment-Based Stewardship): जल प्रबंधन को केवल संयंत्र-स्तरीय (Site-level) परिधि से निकालकर समग्र जलग्रहण क्षेत्र के विकास और सहयोगात्मक ढांचे के अंतर्गत लाना होगा।
  • वैकल्पिक जल तकनीकों का संवर्धन: जल पुनर्चक्रण, क्लोज्ड-लूप सिस्टम और समुद्री जल के विलवणीकरण व प्रत्यक्ष पाइपलाइन उपयोग (जैसे चिली के मॉडल) को व्यापक स्तर पर अपनाना होगा। 
  • दूरदर्शी भू-जल नियोजन: विनियामक तंत्र को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उच्च जल-तनाव वाले बेसिनों में नई खनन रियायतें देने से पूर्व सख्त पर्यावरणीय प्रवाह सीमाएं (Environmental Flow Thresholds) निर्धारित की जाएं। 
  • डेटा पारदर्शिता: सुविधा-स्तरीय जल निकासी और खपत के आंकड़ों में पारदर्शिता लाकर जवाबदेही सुनिश्चित की जानी चाहिए। 

निष्कर्ष  

वैश्विक जलवायु लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए खनिज निष्कर्षण अपरिहार्य है, किंतु यह प्रकृति की कीमत पर नहीं होना चाहिए। यदि खनन क्षेत्र अपनी जल प्रबंधन रणनीतियों में मूलभूत सुधार नहीं करता है, तो जल सुरक्षा की यह अनिश्चितता न केवल पारिस्थितिकीय संतुलन को खंडित करेगी, बल्कि संपूर्ण हरित ऊर्जा संक्रमण की प्रक्रिया को भी गंभीर रूप से बाधित कर सकती है।

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