गूगल का 1 गीगावाट डेटा सेंटर: पानी बचाने के लिए एयर-कूलिंग
संदर्भ
स्थानीय स्तर पर लगातार हो रहे विरोध और नागरिक समाज संगठनों की चिंताओं के बीच गूगल ने विशाखापत्तनम जिले में प्रस्तावित अपने 1 गीगावाट क्षमता वाले डेटा सेंटर में एयर-कूलिंग तकनीक इस्तेमाल करने की बात कही है। पानी की कमी और डेटा सेंटर की संभावित खपत को लेकर उठ रहे सवालों के बीच कंपनी का यह फैसला महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि, विशेषज्ञों के सामने बड़ा सवाल यह है कि क्या केवल एयर-कूलिंग के जरिए इतनी बड़ी क्षमता वाले डेटा सेंटर को प्रभावी ढंग से ठंडा किया जा सकता है?
दरअसल, डेटा सेंटर में हजारों-लाखों सर्वर लगातार काम करते हैं। इन सर्वरों में लगे प्रोसेसर और कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई चिप भारी मात्रा में गणना करते हैं और इसी प्रक्रिया में बड़ी मात्रा में गर्मी पैदा होती है। इसलिए डेटा सेंटर के लिए कूलिंग व्यवस्था उतनी ही महत्वपूर्ण है, जितनी उसकी कंप्यूटिंग क्षमता।
डेटा सेंटर में इतनी गर्मी क्यों पैदा होती है?
एक बड़े डेटा सेंटर में लाखों प्रोसेसर हो सकते हैं और प्रत्येक प्रोसेसर में अरबों ट्रांजिस्टर होते हैं। ये ट्रांजिस्टर विद्युत धारा को नियंत्रित करके डेटा पर अलग-अलग प्रक्रियाएं करते हैं। विद्युत धारा के प्रवाह के दौरान ट्रांजिस्टर के पदार्थ का प्रतिरोध गर्मी पैदा करता है। इसके अलावा ट्रांजिस्टर के लगातार चार्ज और डिस्चार्ज होने से भी गर्मी उत्पन्न होती है।
जब अरबों-खरबों ट्रांजिस्टर एक साथ काम करते हैं तो यह गर्मी काफी बढ़ जाती है। सिद्धांत रूप में 1 गीगावाट बिजली की खपत करने वाला डेटा सेंटर लगभग 1 गीगावाट गर्मी भी पैदा कर सकता है। इस गर्मी को लगातार वातावरण में बाहर निकालना जरूरी है, अन्यथा उपकरणों का तापमान बढ़ने से उनकी कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है।
विशाखापत्तनम के पास प्रस्तावित गूगल का हाइपरस्केलर डेटा सेंटर और टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज यानी टीसीएस का हाइपरवॉल्ट, दोनों 1 गीगावाट क्षमता वाले होंगे। हालांकि, कुल बिजली में से कितनी बिजली सीधे कंप्यूटिंग के लिए इस्तेमाल होगी, यह स्पष्ट नहीं है।
गर्मी हटाने की कई तकनीकें
डेटा सेंटर में अरबों ट्रांजिस्टर मिलकर प्रोसेसर, एक या अधिक प्रोसेसर मिलकर सर्वर और कई सर्वर मिलकर रैक बनाते हैं। कई रैक मिलकर क्लस्टर और कई क्लस्टर मिलकर पूरा डेटा सेंटर तैयार करते हैं।
इन उपकरणों से निकलने वाली गर्मी हटाने के लिए एयर-कूलिंग, लिक्विड-कूलिंग, इमर्शन कूलिंग, एवापोरेटिव कूलिंग और ड्राई-कूलिंग जैसी तकनीकों का इस्तेमाल होता है।
एयर-कूलिंग में पंखों की मदद से ठंडी हवा को सर्वर रैक के भीतर या आसपास प्रवाहित किया जाता है। गर्म हवा को बाहर निकालकर फिर ठंडा किया जाता है। कंप्यूटर-रूम एसी यानी सीआरएसी, कंप्यूटर-रूम एयर हैंडलर यानी सीआरएएच और हॉट-आइल/कोल्ड-आइल कंटेनमेंट इसके प्रमुख तरीके हैं। फ्री-कूलिंग में बाहरी ठंडी हवा का इस्तेमाल किया जाता है।
एयर-कूलिंग का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इसमें पानी की खपत बहुत कम होती है। यही वजह है कि पानी की कमी वाले क्षेत्रों में यह तकनीक आकर्षक विकल्प बन सकती है।
लिक्विड-कूलिंग क्यों ज्यादा प्रभावी?
लिक्विड-कूलिंग में गर्मी हटाने के लिए विशेष तरल पदार्थ का इस्तेमाल किया जाता है। कोल्ड-प्लेट कूलिंग में तरल प्रवाह वाले चैनलों वाली धातु की प्लेट सीधे प्रोसेसर पर लगाई जाती है। प्लेट प्रोसेसर की गर्मी तरल तक पहुंचाती है और गर्म तरल हीट एक्सचेंजर तक जाता है, जहां उसकी गर्मी बाहर निकाल दी जाती है।
पानी आधारित तरल पदार्थों की हीट कैपेसिटी हवा से अधिक होती है। इसलिए समान मात्रा में तरल हवा की तुलना में ज्यादा गर्मी अवशोषित कर सकता है। हालांकि, लिक्विड-कूलिंग के लिए जटिल पाइपिंग, रिसाव पहचान प्रणाली और विशेष कूलेंट डिस्ट्रीब्यूशन यूनिट की जरूरत होती है। यही वजह है कि इसकी शुरुआती लागत अधिक होती है।
इमर्शन और एवापोरेटिव कूलिंग भी विकल्प
इमर्शन कूलिंग में इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को गैर-विद्युत-चालक तरल में डुबो दिया जाता है। यह बहुत अधिक पावर डेंसिटी वाले उपकरणों को ठंडा करने में सक्षम है, लेकिन इसके लिए विशेष हार्डवेयर और जटिल रखरखाव की जरूरत होती है।
एवापोरेटिव कूलिंग में पानी को वाष्पित करके गर्मी बाहर निकाली जाती है। यह ऊर्जा-कुशल हो सकती है, लेकिन इसमें पानी की भारी खपत होती है। ड्राई-कूलिंग इसके उलट पानी की जरूरत को कम करती है, लेकिन गर्म मौसम में इसके लिए बड़े हीट एक्सचेंजिंग क्षेत्र की जरूरत पड़ती है।
1 गीगावाट डेटा सेंटर के लिए एयर-कूलिंग की सीमा
गूगल के फैसले की सबसे बड़ी चुनौती यहीं सामने आती है। एयर-कूलिंग की शुरुआती लागत कम है और यह एक स्थापित तकनीक है। लेकिन आधुनिक एआई चिप पहले की तुलना में कहीं अधिक गर्मी पैदा करती हैं।
एनवीडिया ब्लैकवेल जैसी एआई चिप का प्रत्येक जीपीयू करीब 700 से 1,000 वाट तक गर्मी पैदा कर सकता है। ऐसे में एक रैक से करीब 120 से 150 किलोवाट तक गर्मी निकल सकती है। इसके मुकाबले एयर-कूलिंग की क्षमता लगभग 40 किलोवाट प्रति रैक तक मानी जाती है।
इसी सीमा को ‘थर्मल वॉल’ कहा जाता है। अत्यधिक गर्मी पैदा करने वाले रैक को केवल हवा से ठंडा करने के लिए उन्हें लगभग विंड टनल जैसी व्यवस्था में रखना पड़ सकता है। इससे पंखों और चिलरों की बिजली खपत तेजी से बढ़ सकती है। यानी एयर-कूलिंग पानी बचाती है, लेकिन इसके बदले अधिक बिजली, ज्यादा जगह और बड़े कूलिंग ढांचे की जरूरत पड़ सकती है।
शोर भी बड़ी चुनौती
एयर-कूलिंग में बड़ी संख्या में पंखे, चिलर और एयर-हैंडलिंग यूनिट लगाए जाते हैं। ये काफी शोर पैदा कर सकते हैं। कुछ प्रणालियों का शोर 100 डेसीबल तक पहुंच सकता है।
कम आवृत्ति वाली लगातार गूंज अनुकूल मौसम परिस्थितियों में कई किलोमीटर तक फैल सकती है। इसलिए बड़े डेटा सेंटर के लिए कूलिंग व्यवस्था तय करते समय स्थानीय आबादी और ध्वनि प्रदूषण को भी ध्यान में रखना होगा।
हाइब्रिड कूलिंग बन सकती है समाधान
इन्हीं कारणों से कई आधुनिक बड़े डेटा सेंटर हाइब्रिड कूलिंग का इस्तेमाल कर रहे हैं। कम घनत्व वाले सर्वरों के लिए एयर-कूलिंग, मध्यम घनत्व वाले रैक के लिए रियर-डोर हीट एक्सचेंजर और अत्यधिक घनत्व वाले एआई क्लस्टरों के लिए डायरेक्ट-टू-चिप यानी डीटीसी लिक्विड-कूलिंग का इस्तेमाल किया जा सकता है।
यह तरीका पानी, बिजली, लागत और कंप्यूटिंग क्षमता के बीच बेहतर संतुलन बनाने में मदद करता है।
गूगल और टीसीएस की अलग रणनीति
विशाखापत्तनम में गूगल के डेटा सेंटर को लेकर पानी की खपत पर उठी चिंताओं के बीच सांसद एम. श्रीभरत ने कहा है कि गूगल ने एयर-कूलिंग तकनीक अपनाने की पुष्टि की है। कंपनी ने वर्ष 2030 तक गैर-कूलिंग जरूरतों में इस्तेमाल किए गए पानी का 120 प्रतिशत पानी वापस उपलब्ध कराने का लक्ष्य भी बताया है।
इसके तहत वर्षा जल संग्रहण, भूजल पुनर्भरण, पानी के पंप और वॉटर एटीएम जैसी व्यवस्थाएं विकसित करने की योजना है।
दूसरी ओर, टीसीएस का हाइपरवॉल्ट अधिक घनत्व वाले कंप्यूटिंग ढांचे पर जोर दे रहा है। इसमें लिक्विड-कूलिंग, बड़े पावर ब्लॉक और डायरेक्ट-टू-चिप कूलिंग के साथ नवीकरणीय ऊर्जा के इस्तेमाल की योजना है।
असली चुनौती संतुलन की
विशाखापत्तनम का मामला दिखाता है कि भविष्य के डेटा सेंटर के लिए केवल ज्यादा बिजली और कंप्यूटिंग क्षमता पर्याप्त नहीं होगी। उन्हें पानी, ऊर्जा, पर्यावरण और स्थानीय समुदाय की जरूरतों के बीच संतुलन भी बनाना होगा।
एयर-कूलिंग पानी बचाने का प्रभावी तरीका हो सकता है, लेकिन अत्यधिक शक्तिशाली एआई चिप के बढ़ते इस्तेमाल के साथ केवल इसी तकनीक पर निर्भर रहना मुश्किल हो सकता है। ऐसे में हाइब्रिड कूलिंग, ऊर्जा-कुशल डिजाइन, नवीकरणीय ऊर्जा, वर्षा जल संग्रहण और भूजल पुनर्भरण का संयोजन अधिक व्यावहारिक रास्ता दिखाई देता है।
गूगल के प्रस्तावित 1 गीगावाट डेटा सेंटर की सफलता इसलिए केवल उसकी कंप्यूटिंग क्षमता से नहीं मापी जाएगी। असली कसौटी यह होगी कि कंपनी पानी बचाते हुए गर्मी, बिजली, शोर और पर्यावरणीय प्रभाव को कितनी कुशलता से नियंत्रित कर पाती है।