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भारत में हीटवेव और आकाशीय बिजली को अधिसूचित प्राकृतिक आपदा का दर्जा

संदर्भ  

भारत में बढ़ती चरम मौसमी घटनाओं के बीच गृह मंत्रालय ने वर्ष 2026–2031 के लिए राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष (SDRF) और राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष (NDRF) के परिचालन दिशानिर्देशों में हीटवेव (लू) और आकाशीय बिजली को अधिसूचित प्राकृतिक आपदाओं की सूची में शामिल किया है। इससे अधिसूचित प्राकृतिक आपदाओं की संख्या 12 से बढ़कर 14 हो गई है। यह कदम भारत की बदलती जलवायु परिस्थितियों और बढ़ते आपदा जोखिमों के अनुरूप महत्वपूर्ण नीतिगत पहल है।  

अधिसूचित प्राकृतिक आपदा का अर्थ 

  • अधिसूचित प्राकृतिक आपदा से आशय ऐसे प्राकृतिक अथवा मौसम संबंधी खतरों से है जिन्हें आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के अंतर्गत औपचारिक रूप से मान्यता प्राप्त होती है और जिनके लिए निर्धारित वित्तीय एवं संस्थागत व्यवस्था के तहत राहत प्रदान की जा सकती है। 
  • ऐसी मान्यता मिलने के बाद राज्य सरकारें संबंधित आपदा के प्रभाव से निपटने के लिए उपलब्ध आपदा निधियों का व्यवस्थित उपयोग कर सकती हैं तथा गंभीर परिस्थितियों में केंद्र से अतिरिक्त सहायता प्राप्त कर सकती हैं।
  • हीटवेव और आकाशीय बिजली को अधिसूचित प्राकृतिक आपदा में शामिल किए जाने के बाद अधिसूचित प्राकृतिक आपदाओं की संख्या 12 से बढ़कर 14 हो गई है। मौजूदा सूची में चक्रवात, सूखा, भूकंप, आग, बाढ़, सुनामी, ओलावृष्टि, भूस्खलन, हिमस्खलन, बादल फटना, कीट आक्रमण और शीतलहर जैसी आपदाएँ शामिल हैं।

आकाशीय बिजली और हीटवेव का बढ़ता संकट  

  • भारत में आकाशीय बिजली चरम मौसम से होने वाली मौतों के प्रमुख कारणों में शामिल है। प्रतिवर्ष लगभग 2,000–2,500 लोगों की मृत्यु आकाशीय बिजली गिरने से होने का अनुमान है और यह देश में प्राकृतिक आपदाओं से होने वाली कुल मौतों का 35 प्रतिशत से अधिक हिस्सा बताई जाती है। 
  • इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसका प्रभाव ग्रामीण क्षेत्रों में असमान रूप से अधिक पड़ता है। लगभग 96 प्रतिशत बिजली गिरने से होने वाली मौतें ग्रामीण क्षेत्रों में होती हैं, जहाँ कृषि श्रमिक, खेतिहर मजदूर, आदिवासी समुदाय और खुले में काम करने वाली आबादी विशेष रूप से संवेदनशील है। मानसून के दौरान बुवाई और कृषि गतिविधियों के समय यह जोखिम और बढ़ जाता है। 
  • दूसरी ओर, हीटवेव भारत के लिए तेजी से उभरता हुआ सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट है। मार्च से जुलाई 2026 के दौरान आधिकारिक स्वास्थ्य निगरानी में 4,853 से अधिक गंभीर हीटस्ट्रोक के मामले दर्ज किए गए तथा विभिन्न राज्यों में हीटवेव से संबंधित मौतों की पुष्टि हुई। अत्यधिक गर्मी से निर्जलीकरण, हीटस्ट्रोक, हृदय एवं श्वसन संबंधी समस्याएँ तथा कार्यक्षमता में कमी जैसी स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं। कृषि मजदूरों, निर्माण श्रमिकों, सड़क विक्रेताओं, डिलीवरी कर्मियों और अन्य बाहरी श्रमिकों पर इसका प्रभाव विशेष रूप से गंभीर होता है।

भौगोलिक रूप से असमान प्रभाव  

  • भारत में इन दोनों आपदाओं का प्रभाव भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग दिखाई देता है। ओडिशा, झारखंड, बिहार और पश्चिम बंगाल आकाशीय बिजली के प्रमुख संवेदनशील क्षेत्र हैं। बंगाल की खाड़ी से आने वाली नम हवाओं और शुष्क महाद्वीपीय वायु के परस्पर मिलने से इन क्षेत्रों में तीव्र संवहनीय बादल विकसित होते हैं, जो बिजली और गरज-चमक की घटनाओं को बढ़ाते हैं। 
  • इसके विपरीत राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश लंबे समय तक चलने वाली हीटवेव के प्रमुख केंद्र हैं। गर्मियों में इन क्षेत्रों का अधिकतम तापमान कई बार 45°C से 48°C या उससे अधिक तक पहुँच जाता है। 
  • विदर्भ और मराठवाड़ा, तेलंगाना तथा उत्तरी कर्नाटक जैसे पश्चिमी प्रायद्वीपीय एवं दक्कन के क्षेत्रों में दोहरी चुनौती देखने को मिलती है। यहाँ शुरुआती गर्मियों में शुष्क गर्मी के साथ-साथ मानसून-पूर्व अवधि में तीव्र संवहनीय तूफान और आकाशीय बिजली की घटनाएँ होती हैं। वहीं असम, मेघालय, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश जैसे पूर्वोत्तर राज्यों में पर्वतीय उत्थापन और मानसूनी हवाओं के कारण आकाशीय बिजली की आवृत्ति अधिक रहती है। 

एसडीआरएफ और एनडीआरएफ की भूमिका 

  • राज्य स्तर पर आपदा से निपटने का प्रमुख वित्तीय साधन राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष (SDRF) है। सामान्य राज्यों में केंद्र और राज्य के बीच योगदान का अनुपात सामान्यतः 75:25, जबकि पूर्वोत्तर एवं हिमालयी राज्यों में 90:10 होता है। जब किसी आपदा की गंभीरता राज्य की उपलब्ध संसाधन क्षमता से अधिक हो जाती है, तब केंद्र सरकार राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष (NDRF) के माध्यम से अतिरिक्त सहायता उपलब्ध करा सकती है।
  • इस व्यवस्था का महत्व केवल तत्काल राहत तक सीमित नहीं है। आपदा प्रबंधन में अब प्रतिक्रिया के साथ-साथ जोखिम न्यूनीकरण और दीर्घकालिक अनुकूलन पर भी बल दिया जा रहा है। इसके तहत कूल रूफ, छायादार सार्वजनिक स्थल, सुरक्षित कार्यस्थल, बिजली गिरने से बचाव के उपाय और जलवायु-लचीले बुनियादी ढाँचे को बढ़ावा दिया जा सकता है।

हीटवेव और आकाशीय बिजली को अधिसूचित करने की आवश्यकता  

  • इन दोनों घटनाओं को अधिसूचित करने की सबसे बड़ी आवश्यकता यह है कि इनका प्रभाव व्यापकता और निरंतरता प्राप्त करता जा रहा है। पहले ऐसी घटनाओं से निपटने में राज्यों को सीमित स्थानीय आपदा प्रावधानों पर निर्भर रहना पड़ता था। व्यापक क्षेत्र में फैली हीटवेव या बार-बार होने वाली बिजली की घटनाओं के लिए यह व्यवस्था अपर्याप्त साबित हो सकती थी। 
  • इसके अतिरिक्त, जलवायु परिवर्तन ने तापमान वृद्धि और मौसम की अनिश्चितता को बढ़ाया है। लंबे समय तक चलने वाली गर्मी और तीव्र संवहनीय तूफान आपदा प्रबंधन के लिए नई चुनौतियाँ उत्पन्न कर रहे हैं। अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिक इस जोखिम के सबसे कमजोर वर्गों में हैं, क्योंकि उनके पास स्वास्थ्य सुरक्षा, आय-सुरक्षा और सुरक्षित कार्य परिस्थितियों की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होती।

निर्णय का व्यापक महत्व 

  • इस कदम से सबसे पहले राज्यों को आपदा राहत के लिए अधिक व्यवस्थित वित्तीय संसाधन उपलब्ध होंगे। 
  • दूसरा, आपदा प्रबंधन का दृष्टिकोण घटना के बाद राहत देने से आगे बढ़कर पूर्व तैयारी, जोखिम न्यूनीकरण और जलवायु अनुकूलन पर केंद्रित हो सकेगा।
  • तीसरा, अत्यधिक गर्मी के दौरान कार्यस्थलों पर पेयजल, छाया, विश्राम और सुरक्षित कार्य-समय जैसी व्यवस्थाओं को अधिक प्रभावी ढंग से लागू किया जा सकेगा। 
  • चौथा, सार्वजनिक स्वास्थ्य और आपदा प्रबंधन प्रणालियों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित होगा। हीटवेव की पूर्व चेतावनी, अस्पतालों की तैयारी, हीटस्ट्रोक की निगरानी और गर्मी से होने वाली मृत्यु के वैज्ञानिक आकलन को मजबूत किया जा सकता है।
  • पाँचवाँ, स्थानीय Heat Action Plans (HAPs) को संस्थागत एवं वित्तीय समर्थन मिल सकेगा। प्रारंभिक चेतावनी संदेश, SACHET जैसे चेतावनी तंत्र, कूलिंग सेंटर तथा संवेदनशील आबादी तक समय पर सूचना पहुँचाने की व्यवस्था को व्यापक बनाया जा सकता है।

आगे की राह 

  • हालाँकि केवल किसी आपदा को अधिसूचित कर देना पर्याप्त नहीं है। वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि उपलब्ध संसाधनों का उपयोग कितनी प्रभावशीलता से स्थानीय स्तर पर किया जाता है। इसके लिए जोखिम मानचित्रण, सटीक मौसम पूर्वानुमान, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली और समुदाय आधारित आपदा तैयारी को मजबूत करना आवश्यक है। 
  • आकाशीय बिजली के मामले में ग्रामीण क्षेत्रों में सुरक्षित आश्रयस्थलों का विकास, किसानों एवं श्रमिकों में जागरूकता तथा मोबाइल नेटवर्क के माध्यम से समय पर चेतावनी पहुँचाना महत्वपूर्ण होगा। 
  • हीटवेव के लिए शहरों और गाँवों में कूलिंग सेंटर, कूल रूफ, हरित क्षेत्र, जल उपलब्धता, छायादार सार्वजनिक स्थान और सुरक्षित कार्य-समय को बढ़ावा देना चाहिए। गरीब, बुजुर्ग, बच्चे, दिव्यांग व्यक्ति और खुले में काम करने वाले श्रमिकों को Heat Action Plans के केंद्र में रखा जाना चाहिए।

निष्कर्ष 

  • हीटवेव और आकाशीय बिजली को अधिसूचित आपदा का दर्जा भारत की जलवायु जोखिम प्रबंधन व्यवस्था को मजबूत करेगा तथा राज्यों को राहत, पूर्व तैयारी और जोखिम न्यूनीकरण के लिए बेहतर संसाधन उपलब्ध कराएगा।
  • चरम मौसम अब स्वास्थ्य, कृषि, आजीविका और अर्थव्यवस्था से जुड़ी चुनौती है। इसलिए एसडीआरएफ और एनडीआरएफ के साथ प्रशासन, स्वास्थ्य संस्थानों, मौसम एजेंसियों और समुदायों के बीच समन्वय आवश्यक है। 
  • यह कदम भारत को प्रतिक्रियात्मक राहत से पूर्व-तैयारी आधारित आपदा प्रबंधन की ओर ले जाएगा। इसकी सफलता प्रभावी चेतावनी, सुरक्षित कार्यस्थल, स्वास्थ्य सुरक्षा और जलवायु-लचीले बुनियादी ढाँचे के विकास पर निर्भर करेगी।  
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