झारखंड में 25 साल बाद पेसा (PESA) कानून लागू -आदिवासी स्वशासन की ऐतिहासिक वापसी

  • झारखंड सरकार ने झारखंड PESA रूल्स, 2025 को आधिकारिक रूप से नोटिफाई कर दिया है। 
  • इसके साथ ही राज्य बनने के बाद से चली आ रही 25 वर्षों की प्रतीक्षा समाप्त हो गई। 
  • यह कदम झारखंड हाई कोर्ट के निरंतर न्यायिक दबाव और आदिवासी संगठनों की लंबे समय से चली आ रही मांगों के बाद उठाया गया है।
  • इस फैसले से राज्य के पांचवें अनुसूचित (Fifth Schedule) क्षेत्रों में औपचारिक रूप से आदिवासी स्व-शासन को कानूनी मान्यता मिली है और ग्राम सभाओं को वास्तविक ताकत प्राप्त हुई है।

पेसा (Panchayats (Extension to Scheduled Areas) Act, 1996) कानून क्या है?

पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 – PESA एक केंद्रीय कानून है, जो संविधान के भाग IX (पंचायती राज) के प्रावधानों को अनुसूचित जनजातीय क्षेत्रों तक लागू करता है।

इस कानून का मूल उद्देश्य यह है कि:

  • ग्राम सभा को स्थानीय शासन की सर्वोच्च संस्था बनाया जाए।
  • आदिवासी संस्कृति, परंपरा, जमीन और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा की जाए।
  • विकास निर्णयों में समुदाय की सहमति अनिवार्य हो।

पेसा कानून का ऐतिहासिक संदर्भ

1. औपनिवेशिक विरासत

  • ब्रिटिश शासन के दौरान भूमि और वन कानूनों ने आदिवासियों को उनकी पारंपरिक जमीन और संसाधनों से दूर कर दिया। 
  • उनके सदियों पुराने जीवन-तरीकों को अवैध घोषित कर दिया गया।

2. भूरिया समिति (1994-95)

  • इस समिति ने सिफारिश की कि जनजातीय क्षेत्रों के लिए अलग तरह का शासन मॉडल जरूरी है, जिसमें ग्राम सभा संसाधनों की मालिक हो, न कि नौकरशाही।

3. 73वां संविधान संशोधन

  • 1992 में पंचायती राज व्यवस्था लागू हुई, लेकिन आदिवासी क्षेत्रों की विशिष्ट सामाजिक संरचना को देखते हुए उन्हें इससे बाहर रखा गया। इसी कमी को पूरा करने के लिए 1996 में PESA कानून बनाया गया।

झारखंड PESA नियम, 2025 की मुख्य विशेषताएं

ग्राम सभा को सर्वोच्च प्राथमिकता

  • प्रत्येक राजस्व गांव की अलग ग्राम सभा होगी।
  • अध्यक्ष वही होगा जिसे गांव की परंपरागत व्यवस्था (जैसे मानकी–मुंडा या माझी–परगना) मान्यता देती है।

प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार

  • ग्राम सभा को अब:
    • माइनर फॉरेस्ट प्रोड्यूस (तेंदू पत्ता, महुआ, लाख आदि),
    • गांव के जल स्रोत,
    • छोटे खनिज (रेत, पत्थर) पर अधिकार मिलेगा।

भूमि संरक्षण

  • किसी भी भूमि अधिग्रहण से पहले ग्राम सभा से परामर्श अनिवार्य होगा।
  • अवैध भूमि हस्तांतरण को रोकने और पलटने का अधिकार ग्राम सभा को मिलेगा।

विवाद निपटारा

  • ग्राम स्तर पर छोटे विवाद सुलझाए जा सकेंगे।
  • सामाजिक या मामूली अपराधों में ₹2000 तक जुर्माना लगाया जा सकेगा।

पुलिस की जवाबदेही

  • किसी भी गिरफ्तारी की सूचना 48 घंटे के भीतर ग्राम सभा को देना अनिवार्य होगा।

वित्तीय स्वायत्तता

  • ग्राम सभा अपने फंड (खाद्य, श्रम और नकद) का प्रबंधन स्वयं करेगी।
  • DMFT फंड के उपयोग में ग्राम सभा की भागीदारी सुनिश्चित होगी।

संभावित लाभ और प्रभाव

  • पहचान और परंपरा की बहाली:-पारंपरिक आदिवासी शासन प्रणालियों को कानूनी मान्यता मिलेगी।
  • आर्थिक सशक्तिकरण;-वन उत्पादों पर समुदाय का अधिकार बढ़ेगा, जिससे स्थानीय रोजगार और आय में वृद्धि होगी।
  • लोकतांत्रिक समावेशन:-कोरम के लिए हर परिवार से एक पुरुष और एक महिला की भागीदारी अनिवार्य होगी, जिससे महिला सहभागिता मजबूत होगी।
  • संसाधन संप्रभुता:-गढ़चिरौली जैसे मॉडल दिखाते हैं कि समुदाय आधारित संसाधन प्रबंधन से स्कूल, स्वास्थ्य और विकास कार्यों के लिए बड़ा राजस्व उत्पन्न हो सकता है।

कार्यान्वयन की चुनौतियाँ

  • प्रशासनिक नियंत्रण:-जिला प्रशासन को गांव की सीमा तय करने में अत्यधिक अधिकार दिए गए हैं।
  • कानूनी अस्पष्टता:-कई मामलों में अंतिम निर्णय अभी भी जिला प्रशासन के हाथ में रहेगा।
  • बड़े प्रोजेक्ट्स में सीमित भूमिका:-बड़े खनन और औद्योगिक परियोजनाओं में ग्राम सभा की भूमिका कमजोर रह सकती है।
  • कानूनों में तालमेल की कमी:-PESA और वन अधिकार अधिनियम (FRA) के बीच स्पष्ट तालमेल नहीं है।

आगे का राह 

  • कानूनी समन्वय:-PESA को FRA (वन अधिकार अधिनियम) और समता निर्णय से जोड़ा जाए।
  • क्षमता निर्माण:ग्राम सभाओं को वित्तीय और तकनीकी प्रशिक्षण दिया जाए।
  • TAC को सशक्त बनाना:-ट्राइबल एडवाइजरी काउंसिल की निगरानी भूमिका बढ़ाई जाए।
  • त्वरित न्याय तंत्र:-अनुसूचित क्षेत्रों में विशेष शिकायत निवारण संस्थान बनाए जाएं।
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