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भारत-ऑस्ट्रेलिया यूरेनियम निर्यात समझौता

संदर्भ  

  • भारत और ऑस्ट्रेलिया के मध्य यूरेनियम निर्यात से संबंधित प्रशासनिक व्यवस्थाओं (Administrative Arrangements) को अंतिम रूप दिया जाना दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया ऑस्ट्रेलिया यात्रा के दौरान इस व्यवस्था पर सहमति बनी, जिसके परिणामस्वरूप ऑस्ट्रेलिया से भारत को यूरेनियम निर्यात का मार्ग औपचारिक रूप से प्रशस्त हो गया है। 
  • यह व्यवस्था भारत-ऑस्ट्रेलिया असैन्य परमाणु सहयोग समझौता, 2015 के अंतर्गत लागू होगी तथा इसके तहत होने वाला समस्त यूरेनियम निर्यात केवल शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए होगा और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) की निगरानी में संचालित किया जाएगा।   

प्रशासनिक व्यवस्था का महत्व 

  • प्रशासनिक व्यवस्थाओं को अंतिम रूप दिए जाने के साथ ही ऑस्ट्रेलिया की निजी यूरेनियम खनन कंपनियों को भारत की निजी कंपनियों तथा अन्य अधिकृत संस्थाओं के साथ प्रत्यक्ष व्यावसायिक अनुबंध करने की अनुमति मिल जाएगी। यह साझेदारी केवल व्यापारिक प्रक्रिया को सरल बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत के परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में निजी भागीदारी के विस्तार की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है।   
  • दिसंबर 2025 में संसद द्वारा पारित शांति अधिनियम के माध्यम से भारत ने परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में निजी क्षेत्र की भागीदारी का मार्ग प्रशस्त किया था। ऐसे में ऑस्ट्रेलिया के साथ यह नई व्यवस्था भारत के ऊर्जा क्षेत्र में निजी निवेश और वैश्विक सहयोग के लिए नई संभावनाएँ उत्पन्न करती है।  

वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में समझौते की प्रासंगिकता  

  • यह समझौता ऐसे समय में सामने आया है जब पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, विशेष रूप से अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान पर किए गए सैन्य हमलों ने वैश्विक ऊर्जा बाज़ार को अस्थिर बना दिया है। 
  • भारत, जो अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए आयात पर काफी हद तक निर्भर है, वर्तमान परिस्थितियों में ऊर्जा स्रोतों के विविधीकरण की नीति पर बल दे रहा है।   
  • एक ओर भारत अल्पकालिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए रूस, अमेरिका तथा वेनेज़ुएला जैसे देशों से हाइड्रोकार्बन का आयात बढ़ा रहा है, वहीं दूसरी ओर दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से स्वच्छ एवं विश्वसनीय ऊर्जा स्रोतों, विशेषकर परमाणु ऊर्जा के विस्तार पर भी ध्यान केंद्रित कर रहा है। इस संदर्भ में ऑस्ट्रेलिया से यूरेनियम आयात की व्यवस्था भारत की भावी ऊर्जा रणनीति का महत्वपूर्ण आधार बन सकती है।   

ऑस्ट्रेलिया की भूमिका और समझौते का वैश्विक महत्व 

  • ऑस्ट्रेलिया विश्व के कुल यूरेनियम भंडार का एक-चौथाई से अधिक भाग अपने पास रखता है। परंपरागत रूप से उसने केवल उन्हीं देशों को यूरेनियम निर्यात किया है, जिनके साथ उसके परमाणु सुरक्षा संबंधी द्विपक्षीय समझौते रहे हैं। अब तक अमेरिका, जापान, दक्षिण कोरिया, फ्रांस, स्वीडन, बेल्जियम, फ़िनलैंड, ब्रिटेन तथा जर्मनी जैसे देशों को ही ऑस्ट्रेलियाई यूरेनियम की आपूर्ति की जाती रही है।
  • भारत, परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) का हस्ताक्षरकर्ता न होने के कारण, लंबे समय तक इस सूची से बाहर रहा। किंतु नवीन प्रशासनिक व्यवस्था ने भारत के प्रति ऑस्ट्रेलिया के दृष्टिकोण में आए परिवर्तन को स्पष्ट किया है। वस्तुतः यह व्यवस्था भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच विश्वास, पारदर्शिता तथा उत्तरदायी परमाणु सहयोग की नई संरचना का प्रतिनिधित्व करती है।  

एनपीटी से बाहर होने के बावजूद भारत को मिली स्वीकृति 

  • भारत का परमाणु कार्यक्रम सदैव उत्तरदायी और विश्वसनीय माना गया है। यद्यपि भारत ने परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं, फिर भी वर्ष 2008 में भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते के उपरांत भारत ने अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के साथ सुरक्षा समझौता संपन्न किया।
  • इसके बाद परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) ने भारत को विशेष छूट प्रदान की, जिसके परिणामस्वरूप भारत के लिए वैश्विक असैन्य परमाणु व्यापार के द्वार खुल गए। इसी आधार पर भारत ने फ्रांस, रूस, अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया सहित अनेक देशों के साथ असैन्य परमाणु सहयोग समझौते संपन्न किए। यह भारत की विश्वसनीय परमाणु नीति तथा अप्रसार संबंधी दायित्वों के प्रति उसकी प्रतिबद्धता का प्रमाण माना जाता है।  

दो दशकों की कूटनीतिक प्रक्रिया का परिणाम 

  • भारत और ऑस्ट्रेलिया के मध्य यूरेनियम सहयोग किसी एक घटना का परिणाम नहीं है, बल्कि लगभग दो दशकों तक चले सतत कूटनीतिक संवाद का निष्कर्ष है। 
  • वर्ष 2009 में तत्कालीन ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री केविन रड की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों ने ऊर्जा सुरक्षा, परमाणु सहयोग तथा स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में साझेदारी को आगे बढ़ाने पर सहमति व्यक्त की थी। संयुक्त वक्तव्य में दोनों पक्षों ने स्वीकार किया था कि भविष्य की ऊर्जा चुनौतियों का समाधान खुले, प्रतिस्पर्धी और सहयोगात्मक वैश्विक ऊर्जा बाज़ार के माध्यम से ही संभव है। 
  • इन सतत वार्ताओं के परिणामस्वरूप वर्ष 2014 में भारत-ऑस्ट्रेलिया असैन्य परमाणु सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर हुए, जो 2015 में प्रभावी हुआ। वर्तमान प्रशासनिक व्यवस्था उसी प्रक्रिया का स्वाभाविक विस्तार है।  

परीक्षण चरण से व्यापक व्यावसायिक सहयोग तक 

  • विश्व परमाणु संघ के अनुसार, वर्ष 2018 से भारत को लगभग 300 टन ऑस्ट्रेलियाई यूरेनियम की आपूर्ति की जा चुकी है। हालांकि, प्रारंभिक आपूर्ति को परीक्षण चरण के रूप में देखा गया था क्योंकि ऑस्ट्रेलिया भारतीय संस्थाओं द्वारा यूरेनियम के उपयोग एवं निगरानी व्यवस्था को लेकर पूर्णतः आश्वस्त होना चाहता था। 
  • अब जब दोनों देशों ने प्रशासनिक व्यवस्थाओं को अंतिम रूप दे दिया है तथा यह स्पष्ट कर दिया गया है कि यूरेनियम का उपयोग केवल शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए होगा और आईएईए की निगरानी में रहेगा, तो यह माना जा रहा है कि भविष्य में बड़े पैमाने पर व्यावसायिक आपूर्ति का मार्ग पूरी तरह प्रशस्त हो चुका है। 

भारत की परमाणु ऊर्जा महत्वाकांक्षा और ऑस्ट्रेलिया की भूमिका  

  • भारत ने वर्ष 2047 तक 1,000 गीगावाट परमाणु ऊर्जा क्षमता विकसित करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है। साथ ही, वर्ष 2030 तक 500 गीगावाट स्वच्छ ऊर्जा क्षमता प्राप्त करने की राष्ट्रीय प्रतिबद्धता भी घोषित की जा चुकी है। 
  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी ऑस्ट्रेलिया यात्रा के दौरान स्पष्ट किया कि इन लक्ष्यों की प्राप्ति में ऑस्ट्रेलिया यूरेनियम आपूर्ति, परमाणु अवसंरचना तथा तकनीकी सहयोग के माध्यम से महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इससे दोनों देशों के बीच ऊर्जा सहयोग को नई गति मिलने की संभावना है। 

वैश्विक निवेशकों का बढ़ता विश्वास 

  • भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम में वैश्विक विश्वास लगातार बढ़ रहा है। इसी क्रम में कनाडा की कैमेको कंपनी ने भारत के परमाणु ऊर्जा विभाग को देश के 24 संचालित परमाणु रिएक्टरों के लिए यूरेनियम अयस्क सांद्र की आपूर्ति हेतु लगभग 1.9 अरब डॉलर का दीर्घकालिक अनुबंध किया है। 
  • इस प्रकार के समझौते यह संकेत देते हैं कि भारत का परमाणु ऊर्जा क्षेत्र अब केवल ऊर्जा उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक निवेश, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण तथा दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदारियों का भी प्रमुख केंद्र बनता जा रहा है। 

निष्कर्ष 

  • भारत-ऑस्ट्रेलिया यूरेनियम निर्यात व्यवस्था केवल एक व्यापारिक समझौता नहीं है, बल्कि यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा, स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण, वैश्विक परमाणु सहयोग तथा रणनीतिक कूटनीति का महत्वपूर्ण आधार बनकर उभरी है। भारत की बढ़ती ऊर्जा आवश्यकताओं, परमाणु ऊर्जा विस्तार की महत्वाकांक्षी योजनाओं तथा विश्वसनीय परमाणु रिकॉर्ड को देखते हुए यह समझौता दोनों देशों के संबंधों को नई ऊँचाइयों तक ले जाने के साथ-साथ भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा आत्मनिर्भरता को भी सुदृढ़ करेगा।

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