संदर्भ
भारतीय ऑटोमोबाइल उद्योग वर्तमान में अभूतपूर्व विस्तार और तकनीकी बदलाव के दौर से गुजर रहा है। एक तरफ जहां उत्पादन क्षमता में भारी वृद्धि की उम्मीद है, वहीं दूसरी तरफ कारखानों के भीतर काम करने का तरीका और तकनीकी जरूरतें भी तेजी से बदल रही हैं। बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप (BCG) और ऑटोमोटिव कंपोनेंट मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ACMA) के अनुमानों के अनुसार, देश का वार्षिक वाहन उत्पादन वित्त वर्ष 2025 के लगभग 30-35 मिलियन (3-3.5 करोड़) यूनिट से बढ़कर 2030 तक 50-55 मिलियन (5-5.5 करोड़) यूनिट तक पहुंच सकता है। इसके साथ ही, ऑटो-कंपोनेंट उद्योग का टर्नओवर भी वर्तमान के लगभग 86 अरब डॉलर से बढ़कर 2030 तक 200 अरब डॉलर के स्तर को छूने का लक्ष्य लेकर चल रहा है।
कारखानों के भीतर बदलता काम और नई मांगें
- पारंपरिक ऑटोमोबाइल कारखाने मुख्य रूप से मशीनिंग, वेल्डिंग, असेंबली, मेंटेनेंस और क्वालिटी-कंट्रोल जैसे कार्यों पर निर्भर रहे हैं। हालांकि, उद्योग में इलेक्ट्रिक पावरट्रेन, इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमेशन, कनेक्टेड टेक्नोलॉजीज और उन्नत विनिर्माण प्रणालियों के प्रवेश से विनिर्माण का स्वरूप बदल गया है।
- अब स्वचालित उत्पादन लाइनों के संचालन और रखरखाव के लिए ऐसे श्रमिकों की आवश्यकता है जो कंप्यूटर-नियंत्रित मशीनों और रोबोटों के साथ काम कर सकें। इसके अलावा, इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) के तेजी से विकास ने बैटरी सिस्टम, इलेक्ट्रिक मोटर्स, पावर इलेक्ट्रॉनिक्स और थर्मल मैनेजमेंट से जुड़ी नई तकनीकी मांगें पैदा कर दी हैं। वाहन इलेक्ट्रॉनिक्स का महत्व भी तेजी से बढ़ा है; उदाहरण के लिए, उन्नत ड्राइवर सहायता प्रणाली (ADAS) वाले नए यात्री वाहनों की हिस्सेदारी 2021 के 1% से भी कम, बढ़कर 2025 में लगभग 8% हो गई है। परिणामस्वरूप, पारंपरिक कौशलों के साथ-साथ इलेक्ट्रिकल, इलेक्ट्रॉनिक्स, मेक्ट्रोनिक्स, रोबोटिक्स और बैटरी प्रणालियों में प्रशिक्षित कुशल कर्मियों की मांग तेजी से बढ़ी है।
पुणे क्लस्टर: कौशल अंतराल (स्किल गैप) का एक उदाहरण
- 2 सितंबर, 2026 को जारी बीसीजी-एसीएमए की एक रिपोर्ट इस बात का सटीक उदाहरण प्रस्तुत करती है कि उद्योग की मांग और स्थानीय प्रशिक्षण प्रणाली के बीच कितना बड़ा अंतर है। केवल पुणे ऑटोमोटिव क्लस्टर में ऑटोमोबाइल और ऑटो-कंपोनेंट संयंत्रों को प्रतिवर्ष लगभग 27,000 नए कुशल श्रमिकों की आवश्यकता होती है। इसके विपरीत, आईटीआई (ITIs), पॉलिटेक्निक और ऑटोमोटिव स्किल्स डेवलपमेंट काउंसिल केंद्रों से मिलकर बना स्थानीय प्रशिक्षण तंत्र हर साल केवल लगभग 5,000 ऐसे युवाओं को तैयार कर पाता है जो वास्तव में प्रासंगिक प्रशिक्षण पूरा करते हैं।
- यह क्लस्टर लगभग 1.6 लाख लोगों को रोजगार देता है, जिसमें 50-60% कर्मचारी कुशल श्रेणी के माने जाते हैं। पुणे के ऑटोमोबाइल पाठ्यक्रमों में कुल सीटें लगभग 13,500 हैं, लेकिन नामांकन और पाठ्यक्रम पूरा करने (completion) की कम दर के कारण कार्यबल में प्रवेश करने वाले प्रशिक्षित युवाओं की संख्या गिरकर लगभग 5,000 प्रति वर्ष रह जाती है। यह मांग और आपूर्ति का भारी अंतर पूरे देश के लिए एक गंभीर विचारणीय विषय है।
श्रमिकों की तकनीकी शिक्षा और ज्ञान का अंतराल
कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय को सौंपी गई नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (NCAER) की 2025 की अध्ययन रिपोर्ट इस क्षेत्र में तकनीकी शिक्षा की स्थिति पर प्रकाश डालती है। पीएलएफएस 2022-23 के आंकड़ों के अनुसार:
- मोटर वाहनों के पुर्जों और सहायक उपकरणों के निर्माण में लगे 57.3% श्रमिकों के पास कोई तकनीकी शिक्षा नहीं थी, जबकि 35.2% के पास स्नातक स्तर से नीचे का डिप्लोमा या प्रमाण पत्र था।
- वाहन विनिर्माण क्षेत्र में 53% श्रमिकों के पास कोई तकनीकी शिक्षा नहीं थी, जबकि 21.9% के पास इंजीनियरिंग या प्रौद्योगिकी में डिग्री और 16.6% के पास डिप्लोमा या प्रमाण पत्र था।
- वाहन मरम्मत और रखरखाव के क्षेत्र में स्थिति सबसे अधिक चिंताजनक पाई गई, जहां 93.3% श्रमिकों के पास कोई औपचारिक तकनीकी शिक्षा नहीं थी।
- एनसीएईआर के अन्य अध्ययनों में यह भी रेखांकित किया गया कि कई उम्मीदवारों के पास उन्नत मशीनरी और डिजिटल प्रणालियों का व्यावहारिक अनुभव नहीं है। इसके अतिरिक्त, बैटरी तकनीक, मेक्ट्रोनिक्स, ऑटोमेशन और रोबोटिक्स जैसे उभरते क्षेत्रों में पाठ्यक्रमों और योग्य प्रशिक्षकों की भारी कमी है।
सरकार द्वारा उठाए गए कदम और योजनाएं
इस विशाल कौशल अंतराल को पाटने के लिए सरकार ने व्यावसायिक प्रशिक्षण और प्रशिक्षुता (Apprenticeships) के विस्तार हेतु कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं:
- नेशनल अप्रेंटिसशिप प्रमोशन स्कीम (NAPS) 2.0: इस योजना के तहत वास्तविक कार्य वातावरण में प्रशिक्षण दिया जाता है, जिससे युवाओं को व्यावहारिक सीख और प्रत्यक्ष उद्योग का अनुभव मिलता है। मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 30 जून, 2026 तक NAPS 2.0 के तहत "ऑटोमोटिव" क्षेत्र में 8.93 लाख और "ऑटोमोबाइल" क्षेत्र में 99,244 प्रशिक्षुओं को प्रशिक्षित किया जा चुका है।
- प्रधानमंत्री स्किलिंग एंड एम्प्लॉयबिलिटी ट्रांसफॉर्मेशन थ्रू अपग्रेडेड आईटीआई (PM-SETU): इस योजना के अंतर्गत हब और स्पोक मॉडल के तहत 1,000 सरकारी आईटीआई का उन्नयन किया जा रहा है, ताकि नए और उभरते क्षेत्रों में उद्योग-संरेखित पाठ्यक्रम शुरू किए जा सकें और अगले पांच वर्षों में 20 लाख युवाओं को प्रशिक्षित किया जा सके।
- बुनियादी ढांचे और पाठ्यक्रमों का विस्तार: देश में आईटीआई की संख्या 2014 के 9,642 से बढ़कर 2026 में 13,856 हो गई है, और सीटों की क्षमता लगभग 20 लाख तक पहुंच गई है। पिछले 3 वर्षों में उद्योग की जरूरतों के अनुरूप 14 नए सीटीएस (Craftsmen Training Scheme) पाठ्यक्रम शुरू किए गए हैं (जैसे- एडवांस्ड सीएनसी मशीनिंग तकनीशियन, इंडस्ट्रियल रोबोटिक्स एंड डिजिटल मैन्युफैक्चरिंग, मैकेनिक इलेक्ट्रिक व्हीकल और तकनीशियन मेक्ट्रोनिक्स) तथा 22 मौजूदा पाठ्यक्रमों को संशोधित किया गया है।
उद्योग-अगुवाई वाले प्रशिक्षण की भूमिका
- पारंपरिक शिक्षण प्रणालियों के अलावा, उद्योग स्तर पर सीधे सहभागिता बढ़ाना समय की मुख्य मांग है। मार्च 2026 में महानिदेशालय प्रशिक्षण (DGT) और बजाज ऑटो लिमिटेड के बीच हुआ 'फ्लेक्सी-एमओयू' (Flexi-MoU) इसका एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
- इसके तहत बजाज ऑटो अपनी विनिर्माण सुविधाओं (जैसे पुणे के आकुर्डी और चाकण, महाराष्ट्र के वालूज, और उत्तराखंड के पंतनगर) में कक्षा के शिक्षण को शॉप-फ्लोर के व्यावहारिक अनुभव के साथ जोड़ते हुए 24 महीने तक का प्रशिक्षण कार्यक्रम चला रही है। पहले वर्ष में 1,000 प्रशिक्षुओं के प्रवेश के प्रस्ताव के साथ यह पहल कार्यस्थल-आधारित प्रशिक्षण के बढ़ते महत्व को दर्शाती है।
निष्कर्ष
- भारतीय ऑटोमोबाइल उद्योग एक ओर जहां रिकॉर्ड उत्पादन और वैश्विक प्रतिस्पर्धा की ओर बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर 'कौशल अंतराल' इसकी सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है। पारंपरिक विनिर्माण कौशलों के साथ-साथ डिजिटल, इलेक्ट्रॉनिक और हरित प्रौद्योगिकियों (EVs & Automation) में दक्ष कार्यबल तैयार करना अनिवार्य हो गया है।
- सरकार की पीएम-सेतु और एनएपीएस जैसी योजनाओं के साथ-साथ बजाज ऑटो जैसे उद्योग के दिग्गजों द्वारा शुरू की गई फ्लेक्सी-प्रशिक्षण पहलें यदि समन्वित रूप से आगे बढ़ें, तो भारत न केवल अपनी घरेलू जरूरतों को पूरा कर सकता है, बल्कि वैश्विक ऑटोमोटिव बाजार में एक कुशल मानव संसाधन महाशक्ति के रूप में भी स्थापित हो सकता है।