वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूत शुरुआत
संदर्भ
भू-राजनीतिक तनाव, वैश्विक व्यापार में अनिश्चितता और बदलते आर्थिक समीकरणों के बीच भारत ने वित्त वर्ष 2026-27 की शुरुआत मजबूत आर्थिक प्रदर्शन के साथ की है। घरेलू मांग की मजबूती, निवेश में तेजी, विनिर्माण और सेवा क्षेत्र के विस्तार तथा निर्यात में वृद्धि ने अर्थव्यवस्था को व्यापक आधार प्रदान किया है। वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 7.8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जो 2023-24 से 2026-27 के बीच पहली तिमाही में दर्ज सबसे अधिक वृद्धि है। यह प्रदर्शन भारतीय अर्थव्यवस्था की अंतर्निहित मजबूती और बाहरी चुनौतियों से निपटने की क्षमता को दर्शाता है।
अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भी जुलाई 2026 में भारत को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल करते हुए वैश्विक विकास का प्रमुख इंजन माना। वहीं, एसएंडपी ग्लोबल रेटिंग्स ने अगस्त 2026 में स्थिर दृष्टिकोण के साथ भारत की ‘BBB/A-2’ सॉवरेन रेटिंग की पुष्टि की। इससे वैश्विक निवेशकों के बीच भारत की आर्थिक विश्वसनीयता का संकेत मिलता है।
विकास की मजबूत रफ्तार
पहली तिमाही में वास्तविक जीडीपी 81.36 लाख करोड़ रुपये रही, जो पिछले वर्ष की समान तिमाही के 6.9 प्रतिशत की तुलना में 7.8 प्रतिशत की वृद्धि है। वहीं, नॉमिनल जीडीपी 10.3 प्रतिशत बढ़कर 88.27 लाख करोड़ रुपये पहुंच गई। वास्तविक सकल मूल्य वर्धन (जीवीए) में भी 8.2 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई।
महत्वपूर्ण बात यह है कि पिछले तीन वित्त वर्षों की जीडीपी वृद्धि के आंकड़ों को भी संशोधित कर ऊपर किया गया है। वित्त वर्ष 2023-24 की वृद्धि को 7.2 से बढ़ाकर 7.3 प्रतिशत, 2024-25 को 7.1 से बढ़ाकर 7.2 प्रतिशत और 2025-26 को 7.7 से बढ़ाकर 7.8 प्रतिशत किया गया। इससे भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास तस्वीर और मजबूत दिखाई देती है।
निवेश, खपत और निर्यात बने प्रमुख आधार
पहली तिमाही की वृद्धि में सबसे उल्लेखनीय योगदान निवेश का रहा। सकल स्थिर पूंजी निर्माण में वृद्धि 5.8 प्रतिशत से बढ़कर 11.9 प्रतिशत हो गई। इससे संकेत मिलता है कि निजी और सार्वजनिक निवेश गतिविधियों में तेजी बनी हुई है।
निजी अंतिम उपभोग व्यय भी 6.8 प्रतिशत से बढ़कर 7.1 प्रतिशत हुआ। घरेलू खपत भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और इसमें निरंतर मजबूती मांग तथा उत्पादन दोनों को सहारा देती है।
निर्यात का प्रदर्शन भी उत्साहजनक रहा। जुलाई 2026 में वस्तुओं और सेवाओं का कुल निर्यात करीब 80.14 अरब डॉलर रहा, जो एक वर्ष पहले की तुलना में 13.31 प्रतिशत अधिक है। अप्रैल-जुलाई 2026-27 के दौरान संचयी निर्यात 316.42 अरब डॉलर तक पहुंच गया।
विनिर्माण और सेवाओं का विस्तार
उत्पादन पक्ष पर भी विकास का व्यापक आधार दिखाई देता है। पहली तिमाही में तृतीयक क्षेत्र की वास्तविक जीवीए वृद्धि 10 प्रतिशत रही, जबकि वित्तीय, रियल एस्टेट, आईटी और पेशेवर सेवाओं में 12.1 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई।
द्वितीयक क्षेत्र में वृद्धि 6.1 प्रतिशत से बढ़कर 8.6 प्रतिशत हुई। विनिर्माण क्षेत्र ने 9.2 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज कर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। विद्युत उपकरण, अन्य परिवहन उपकरण, कंप्यूटर-इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद तथा मशीनरी जैसे क्षेत्रों में उत्पादन वृद्धि विशेष रूप से मजबूत रही।
औद्योगिक उत्पादन सूचकांक भी जुलाई 2026 में 6.7 प्रतिशत बढ़ा। पूंजीगत वस्तुओं के उत्पादन में 16.1 प्रतिशत की वृद्धि इस बात का संकेत है कि निवेश और औद्योगिक क्षमता विस्तार की प्रक्रिया गति पकड़ रही है।
ऋण विस्तार और नीतिगत समर्थन
अर्थव्यवस्था में बैंक ऋण का विस्तार भी सकारात्मक संकेत दे रहा है। जुलाई 2026 में कृषि और संबद्ध गतिविधियों के लिए ऋण में 17 प्रतिशत, उद्योग में 20 प्रतिशत और सेवा क्षेत्र में 22.9 प्रतिशत की वृद्धि हुई। इससे उत्पादन, कारोबार और निवेश गतिविधियों को वित्तीय समर्थन मिलने की संभावना बढ़ती है।
सरकार ने भी विनिर्माण, ऊर्जा, व्यापार, निवेश और कृषि को मजबूत करने के लिए कई नीतिगत कदम उठाए हैं। मोबाइल फोन निर्माण योजना, सेमीकॉन 2.0, रासायनिक पार्कों की योजना और एमएसएमई से जुड़े सुधार विनिर्माण क्षमता तथा वैश्विक प्रतिस्पर्धा बढ़ाने पर केंद्रित हैं। इसी तरह ऊर्जा क्षेत्र में अपतटीय अन्वेषण, कोयला गैसीकरण, गोबरधन और फ्लोटिंग सौर परियोजनाओं जैसी पहलों से ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने का प्रयास किया जा रहा है।
व्यापार और निवेश के क्षेत्र में भारत-यूके सीईटीए, भारत-इजराइल निवेश समझौता तथा विदेशी पोर्टफोलियो निवेश से जुड़े सुधार भारत को वैश्विक पूंजी और बाजारों से अधिक मजबूती से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण हैं।
कृषि को मिला निरंतर समर्थन
ग्रामीण मांग और किसानों की आय को सहारा देने के लिए पीएम-किसान योजना को 2030-31 तक जारी रखने का निर्णय महत्वपूर्ण है। खरीफ फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि, कपास उत्पादकता मिशन और यूरिया क्षेत्र में नए निवेश को प्रोत्साहन कृषि उत्पादन तथा आय को मजबूत करने की दिशा में उठाए गए कदम हैं।
निष्कर्ष
वित्त वर्ष 2026-27 की शुरुआत भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए व्यापक आधार वाली मजबूती का संकेत देती है। 7.8 प्रतिशत जीडीपी वृद्धि, निवेश में तेजी, मजबूत घरेलू खपत, विनिर्माण और सेवाओं का विस्तार तथा निर्यात में वृद्धि अर्थव्यवस्था की सकारात्मक दिशा को रेखांकित करते हैं। साथ ही, औद्योगिक उत्पादन और बैंक ऋण के ताजा आंकड़े बताते हैं कि यह गति केवल पहली तिमाही तक सीमित नहीं है।
फिर भी वैश्विक व्यापार तनाव, भू-राजनीतिक जोखिम और बाहरी मांग में अनिश्चितता जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं। ऐसे माहौल में भारत के लिए आवश्यक होगा कि वह निवेश, रोजगार, उत्पादकता और निर्यात की गति को बनाए रखे। यदि नीतिगत निरंतरता और संरचनात्मक सुधारों के साथ इन क्षेत्रों को मजबूती दी जाती है, तो भारत न केवल उच्च विकास दर बनाए रख सकता है, बल्कि विकसित भारत 2047 के दीर्घकालिक लक्ष्य की दिशा में भी अधिक मजबूती से आगे बढ़ सकता है।