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सतत विकास की राह दिखाती भारत की ब्लू इकोनॉमी

संदर्भ 

समुद्र केवल जल का विशाल विस्तार नहीं, बल्कि खाद्य सुरक्षा, रोजगार, जैव-विविधता और जलवायु संतुलन का महत्वपूर्ण आधार है। वैश्विक स्तर पर समुद्री संसाधनों और ‘ब्लू इकोनॉमी’ की बढ़ती भूमिका के बीच भारत ने अपनी समुद्री संपदा को वैज्ञानिक रूप से समझने और उसके सतत उपयोग की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की है। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने सेंटर फॉर मरीन लिविंग रिसोर्सेज एंड इकोलॉजी (सीएमएलआरई) की रजत जयंती के अवसर पर ‘भारतीय ईईजेड के गहरे समुद्र और दूर-समुद्र के मछली संसाधनों पर राष्ट्रीय रिपोर्ट’ जारी की है।

रिपोर्ट से संबंधित प्रमुख बिंदु  

  • लगभग 2.37 मिलियन वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाले भारत के अनन्य आर्थिक क्षेत्र (ईईजेड) से संबंधित यह रिपोर्ट करीब चार दशकों के समुद्र-विज्ञान अनुसंधान और तीन दशकों के व्यवस्थित सर्वेक्षणों के निष्कर्षों को समेटती है। 
  • यह दस्तावेज समुद्री संसाधनों की पहचान और आकलन के साथ-साथ उनके संरक्षण और सतत उपयोग के लिए वैज्ञानिक आधार प्रस्तुत करता है। इस लिहाज से यह भारत की ब्लू इकोनॉमी के भविष्य की दिशा तय करने वाला महत्वपूर्ण दस्तावेज माना जा सकता है।  

दशकों की वैज्ञानिक मेहनत का परिणाम  

  • वर्ष 1990 के दशक की शुरुआत से मरीन लिविंग रिसोर्सेज प्रोग्राम (एमएलआरपी) के तहत 400 से अधिक समुद्री वैज्ञानिक अभियान संचालित किए गए। इनमें भारत के प्रमुख अनुसंधान पोत एफओआरवी सागर संपदा की भूमिका महत्वपूर्ण रही। 
  • यह पोत वैज्ञानिकों के लिए एक तैरती हुई प्रयोगशाला की तरह काम करता रहा। अरब सागर, बंगाल की खाड़ी, लक्षद्वीप, अंडमान सागर और दक्षिणी महासागर तक अभियानों के दौरान समुद्री प्रजातियों, मछली भंडार, समुद्री पर्यावरण और पारिस्थितिकी से जुड़े व्यापक आंकड़े जुटाए गए। 

गहरे समुद्र की दुनिया और कार्बन पंप 

  • रिपोर्ट की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में गहरे समुद्र के संसाधनों और पारिस्थितिकी का अध्ययन शामिल है। 200 से 1,000 मीटर की गहराई में फैले ‘ट्वाइलाइट जोन’ या मेसोपेलाजिक क्षेत्र में लैंटर्नफिश, गहरे समुद्र के झींगे और सेफेलोपोड्स जैसी प्रजातियों की बड़ी आबादी मौजूद है। 
  • इन जीवों का प्रतिदिन होने वाला ऊर्ध्वाधर प्रवास समुद्र के बायोलॉजिकल कार्बन पंप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ये जीव सतह के पास मौजूद कार्बन को गहरे समुद्र तक पहुंचाने में मदद करते हैं। इसलिए गहरे समुद्र का अध्ययन केवल मत्स्य संसाधनों के लिहाज से ही नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन और वैश्विक कार्बन चक्र को समझने के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है। 
  • महाद्वीपीय ढलान के 200 मीटर से अधिक गहरे हिस्सों में गहरे समुद्र के झींगे, पर्च, स्कॉम्ब्रॉइड्स, फ्लैटफिश और ईल जैसी प्रजातियों के महत्वपूर्ण संसाधनों की पहचान की गई है। इनमें से कई संसाधनों का अब तक सीमित दोहन हुआ है, जिससे भविष्य में सतत मत्स्य गतिविधियों की संभावनाएं बनती हैं। 

दूर-समुद्र के संसाधनों की पहचान 

  • भारत के खुले समुद्री क्षेत्रों में टूना, बिलफिश, शार्क, ओशनिक स्क्विड और अंटार्कटिक क्रिल जैसी उच्च मूल्य वाली प्रजातियों का भी अध्ययन किया गया है। इन संसाधनों की वैज्ञानिक जानकारी देश के समुद्री मत्स्य क्षेत्र को मजबूत करने और भविष्य की नीतियां बनाने में उपयोगी हो सकती है। 
  • हालांकि, समुद्री संपदा के आर्थिक उपयोग के साथ संरक्षण की चुनौती भी जुड़ी है। अत्यधिक दोहन से समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित हो सकता है। इसलिए रिपोर्ट का मूल संदेश संसाधनों के अंधाधुंध दोहन के बजाय वैज्ञानिक आकलन, नियंत्रित उपयोग और दीर्घकालिक संरक्षण पर आधारित है। 

जैव-विविधता के हॉटस्पॉट्स पर विशेष ध्यान 

  • रिपोर्ट में समुद्री जैव-विविधता के कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों की पहचान की गई है। कोल्लम बैंक, अंग्रिया बैंक, मैंगलोर के पास गहरे समुद्र की ढलान, तिरुवनंतपुरम के निकट समुद्री टेरेस तथा लक्षद्वीप और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह ऐसे क्षेत्र हैं, जो अनेक समुद्री प्रजातियों के लिए आवास और नर्सरी का काम करते हैं। 
  • इन क्षेत्रों की पहचान भविष्य में समुद्री स्थानिक नियोजन और संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्रों के संरक्षण में मददगार साबित हो सकती है। इससे मत्स्य गतिविधियों और संरक्षण के बीच बेहतर संतुलन स्थापित करने का रास्ता भी खुलता है।

तकनीक से बदलेगा समुद्री अनुसंधान 

  • भारत अब समुद्री अनुसंधान में आधुनिक तकनीकों का व्यापक इस्तेमाल कर रहा है। फिशरीज एकॉस्टिक्स, पर्यावरणीय डीएनए, स्वायत्त अवलोकन प्लेटफॉर्म, सैटेलाइट ऑब्जर्वेशन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और उन्नत इकोसिस्टम मॉडलिंग समुद्री संसाधनों की निगरानी और आकलन को अधिक प्रभावी बना रहे हैं।
  • यह तकनीकी बदलाव भारत को समुद्री संसाधनों की वास्तविक स्थिति समझने और भविष्य की नीतियों को डेटा आधारित बनाने में मदद करेगा। यही दृष्टिकोण विजन 2047 में ब्लू इकोनॉमी को विकास के प्रमुख आधारों में शामिल करने की दिशा को मजबूती देता है। 

विकास के साथ संरक्षण जरूरी  

  • भारत के लिए समुद्र आर्थिक अवसरों का विशाल क्षेत्र है, लेकिन इन अवसरों का लाभ तभी स्थायी हो सकता है जब समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र सुरक्षित रहे। राष्ट्रीय रिपोर्ट इसी संतुलन का वैज्ञानिक आधार तैयार करती है। समुद्री संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग खाद्य सुरक्षा, रोजगार और मत्स्य अर्थव्यवस्था को बढ़ावा दे सकता है, वहीं जैव-विविधता का संरक्षण आने वाली पीढ़ियों के लिए समुद्री संपदा को सुरक्षित रखेगा। 
  • भारत की यह पहल संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य-14 ‘जल के नीचे जीवन’ और संयुक्त राष्ट्र के ओशन साइंस दशक के उद्देश्यों के अनुरूप है। आने वाले वर्षों में विज्ञान, तकनीक और संरक्षण को साथ लेकर चलना ही भारत की ब्लू इकोनॉमी को टिकाऊ, समावेशी और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने की कुंजी साबित हो सकता है। 
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