संदर्भ
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हाल ही में कर्नाटक उच्च न्यायालय द्वारा दिया गया एक निर्णय कानून, चिकित्सा नैतिकता और मानवाधिकारों से जुड़े जटिल प्रश्नों को फिर से चर्चा के केंद्र में ले आया है। न्यायालय ने गंभीर बौद्धिक और विकासात्मक विकलांगताओं से पीड़ित 23 वर्षीय महिला के लिए गर्भाशय निष्कासन (टोटल एब्डॉमिनल हिस्टेरेक्टॉमी) की अनुमति प्रदान की। वस्तुतः यह मामला केवल एक चिकित्सीय प्रक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इस व्यापक प्रश्न को भी सामने लाता है कि जब कोई व्यक्ति स्वयं अपने स्वास्थ्य संबंधी निर्णय लेने में सक्षम न हो, तब उसके अधिकारों और हितों की रक्षा कैसे की जाए।
मामला क्या था ?
- याचिका महिला के माता-पिता द्वारा दायर की गई थी। उनका कहना था कि उनकी बेटी की मानसिक और बौद्धिक स्थिति ऐसी नहीं है कि वह मासिक धर्म संबंधी स्वच्छता और देखभाल को समझ सके या उसका प्रबंधन कर सके। इसके कारण उसे लगातार संक्रमण, स्वास्थ्य समस्याओं और चिकित्सीय जटिलताओं का सामना करना पड़ रहा था।
- न्यायालय के निर्देश पर गठित एक बहु-विषयक चिकित्सा बोर्ड ने महिला की स्थिति का परीक्षण किया। बोर्ड ने निष्कर्ष निकाला कि वह सूचित सहमति देने में सक्षम नहीं है तथा उसकी स्वास्थ्य संबंधी परिस्थितियों को देखते हुए हिस्टेरेक्टॉमी उपयुक्त चिकित्सीय विकल्प हो सकता है। इसी रिपोर्ट के आधार पर न्यायालय ने सर्जरी की अनुमति प्रदान की।
सूचित सहमति: चिकित्सा कानून की आधारशिला
- आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था का एक मूलभूत सिद्धांत है - सूचित सहमति। किसी भी बड़े चिकित्सा हस्तक्षेप से पहले मरीज को उसके उद्देश्य, संभावित लाभ, जोखिम और परिणामों की पूरी जानकारी दी जाती है और उसके बाद उसकी स्वैच्छिक अनुमति प्राप्त की जाती है।
- लेकिन जब कोई व्यक्ति बौद्धिक रूप से इतना अक्षम हो कि वह उपचार की प्रकृति को समझ ही न सके, तब यह सिद्धांत व्यावहारिक कठिनाइयों का सामना करता है। ऐसे मामलों में डॉक्टर और अभिभावक स्वयं निर्णय नहीं ले सकते, क्योंकि यह व्यक्ति की शारीरिक स्वतंत्रता और अधिकारों से जुड़ा प्रश्न होता है। यहीं पर न्यायपालिका की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।
पैरेंस पैट्रिए सिद्धांत और न्यायालय की भूमिका
- ऐसे मामलों में भारतीय न्यायालय अक्सर पैरेंस पैट्रिए (Parens Patriae) सिद्धांत का उपयोग करते हैं। इसका अर्थ है कि राज्य अथवा न्यायालय उन व्यक्तियों के संरक्षक के रूप में कार्य करेगा जो स्वयं अपने हितों की रक्षा करने में सक्षम नहीं हैं।
- हालांकि न्यायालय केवल अभिभावक की इच्छा के आधार पर निर्णय नहीं देता। वह चिकित्सा विशेषज्ञों की राय, व्यक्ति की स्थिति, संभावित जोखिमों और उपलब्ध विकल्पों का मूल्यांकन कर यह निर्धारित करने का प्रयास करता है कि संबंधित व्यक्ति के हित में सर्वोत्तम निर्णय क्या है।
- इस प्रक्रिया का उद्देश्य व्यक्ति के स्वास्थ्य, सम्मान और शारीरिक अखंडता की रक्षा करना होता है।
दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकार और कानूनी सुरक्षा
- भारत में दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा के लिए दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 (RPwD Act) लागू है। इस कानून की धारा 10 विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह किसी भी दिव्यांग व्यक्ति को उसकी स्वतंत्र और सूचित सहमति के बिना ऐसी चिकित्सा प्रक्रिया से गुजरने से बचाती है, जो उसकी प्रजनन क्षमता को स्थायी रूप से प्रभावित कर सकती हो।
- यह प्रावधान इसलिए जोड़ा गया था क्योंकि दुनिया भर में लंबे समय तक बौद्धिक विकलांगता वाली महिलाओं को जबरन नसबंदी और प्रजनन नियंत्रण जैसी प्रक्रियाओं का सामना करना पड़ा था। कई बार इन कदमों को सुविधा, सामाजिक नियंत्रण या संभावित यौन शोषण के परिणामों से बचाव के नाम पर उचित ठहराया गया।
- इसलिए वर्तमान कानून व्यक्ति की स्वायत्तता को प्राथमिकता देता है और किसी भी अपवाद के लिए न्यायिक जांच आवश्यक बनाता है।
अनावश्यक हिस्टेरेक्टॉमी पर सर्वोच्च न्यायालय की चिंता
- हाल के वर्षों में भारत में अनावश्यक हिस्टेरेक्टॉमी के मामलों को लेकर गंभीर चिंताएं सामने आई हैं। इसी संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय ने डॉ. नरेंद्र गुप्ता बनाम भारत संघ मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणियां की थीं।
- याचिका में आरोप लगाया गया था कि सरकारी स्वास्थ्य बीमा योजनाओं के अंतर्गत अनेक महिलाओं, विशेषकर आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर वर्गों की महिलाओं पर, बिना पर्याप्त चिकित्सा आवश्यकता के गर्भाशय निष्कासन की सर्जरी की जा रही है।
- सर्वोच्च न्यायालय ने इसे स्वास्थ्य के अधिकार का उल्लंघन मानते हुए राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को स्वास्थ्य मंत्रालय के दिशा-निर्देशों को सख्ती से लागू करने का निर्देश दिया। साथ ही, निगरानी समितियों के गठन और नियमों का उल्लंघन करने वाले अस्पतालों के विरुद्ध कार्रवाई की भी व्यवस्था की गई।
- यह निर्णय बताता है कि हिस्टेरेक्टॉमी जैसी प्रक्रियाओं को केवल चिकित्सीय आवश्यकता और वैध सहमति के आधार पर ही किया जाना चाहिए।
गर्भपात और बौद्धिक विकलांगता: एक अलग कानूनी चुनौती
- बौद्धिक विकलांग महिलाओं से जुड़े अधिकांश न्यायिक विवाद गर्भाशय निष्कासन नहीं, बल्कि गर्भपात से संबंधित होते हैं। विशेष रूप से वे मामले, जिनमें यौन हिंसा के परिणामस्वरूप गर्भधारण हुआ हो।
- चिकित्सीय गर्भसमापन अधिनियम, 1971 के तहत मानसिक बीमारी से पीड़ित महिला के मामले में अभिभावक की सहमति के आधार पर गर्भपात कराया जा सकता है। लेकिन यह प्रावधान बौद्धिक विकलांगता वाली महिलाओं पर लागू नहीं होता।
- यही वह कानूनी जटिलता है जो बार-बार न्यायालयों के सामने आती है। एक ओर महिला की सहमति को अनिवार्य माना जाता है, वहीं दूसरी ओर कई मामलों में उसकी निर्णय क्षमता पर प्रश्न उठते हैं।
न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णय
भारतीय न्यायपालिका ने समय-समय पर ऐसे मामलों में महत्वपूर्ण सिद्धांत विकसित किए हैं।
- सुचिता श्रीवास्तव बनाम चंडीगढ़ प्रशासन (2009) – हल्की बौद्धिक विकलांगता से पीड़ित एक बलात्कार पीड़िता अपने बच्चे को रखना चाहती थी। सर्वोच्च न्यायालय ने उसकी पसंद को बरकरार रखा और फैसला सुनाया कि प्रजनन संबंधी निर्णय अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षित हैं।
- ज़ेड बनाम बिहार राज्य (2017) – एक विकलांग एचआईवी-पॉजिटिव बलात्कार पीड़िता ने गर्भपात की मांग की थी, लेकिन अस्पताल ने अवैध रूप से तीसरे पक्ष (थर्ड-पार्टी) की सहमति की मांग की। इस प्रक्रिया में गर्भधारण कानूनी सीमा को पार कर गया। सर्वोच्च न्यायालय ने इसे लापरवाही बताते हुए इसकी कड़ी निंदा की और मुआवजे का आदेश दिया।
- उड़ीसा उच्च न्यायालय (2020) – चिकित्सा सुरक्षा के आधार पर 24 सप्ताह के गर्भ को समाप्त करने की अनुमति देने से इनकार कर दिया गया था। इसके बजाय अदालत ने राज्य को मुआवजा देने और प्रसवोत्तर देखभाल (पोस्टनेटल केयर) सुनिश्चित करने का आदेश दिया।
- गुजरात उच्च न्यायालय (2024) – बौद्धिक विकलांगता से पीड़ित एक 15 वर्षीय आदिवासी लड़की को मेडिकल बोर्ड की इस रिपोर्ट के आधार पर कि गर्भावस्था जारी रखने से उसे शारीरिक और मानसिक नुकसान होगा, 28 सप्ताह के गर्भपात की अनुमति दी गई।
- इन सभी मामलों का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि वे दो मूलभूत सिद्धांतों के बीच टकराव को सामने लाते हैं।
- पहला सिद्धांत है व्यक्तिगत स्वायत्तता, जिसके अनुसार प्रत्येक महिला को अपने शरीर और प्रजनन संबंधी निर्णय लेने का अधिकार है। यह अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 तथा अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों द्वारा संरक्षित है।
- दूसरा सिद्धांत है सर्वोत्तम हित (Best Interests), जिसके अनुसार यदि कोई व्यक्ति स्वयं निर्णय लेने में सक्षम नहीं है, तो उसके स्वास्थ्य, सुरक्षा और गरिमा को ध्यान में रखते हुए उसके लिए सबसे उपयुक्त निर्णय लिया जाना चाहिए।
- इन दोनों सिद्धांतों में संतुलन बनाना आसान नहीं है। यदि स्वायत्तता को पूर्ण प्राथमिकता दी जाए तो कुछ मामलों में व्यक्ति की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है, जबकि केवल सर्वोत्तम हित के आधार पर निर्णय लेने से व्यक्ति की स्वतंत्रता और अधिकारों के हनन का खतरा पैदा हो सकता है।
निष्कर्ष
- कर्नाटक उच्च न्यायालय का हालिया निर्णय केवल एक चिकित्सा अनुमति का मामला नहीं है, बल्कि यह भारतीय न्याय व्यवस्था के सामने मौजूद उन जटिल चुनौतियों को भी रेखांकित करता है, जहाँ मानवाधिकार, चिकित्सा आवश्यकता और कानूनी सिद्धांत एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं।
- ऐसे मामलों में न्यायालयों का प्रयास रहता है कि दिव्यांग व्यक्ति की गरिमा, स्वायत्तता और स्वास्थ्य के बीच संतुलन स्थापित किया जाए। भविष्य में भी बौद्धिक विकलांगता और प्रजनन अधिकारों से जुड़े मामलों में यही संतुलन भारतीय न्यायशास्त्र की सबसे बड़ी कसौटी बना रहेगा।