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खज़ान कृषि प्रणाली

(प्रारम्भिक परीक्षा: आर्थिक और सामाजिक विकास-सतत् विकास)
(मुख्य परीक्षा: सामान्य अध्ययन, प्रश्नपत्र-3: मुख्य फसलें- देश के विभिन्न भागों में फसलों का पैटर्न – सिंचाई के विभिन्न प्रकार एवं सिंचाई प्रणाली, पशुपालन सम्बंधी अर्थशास्त्र)

चर्चा में क्यों ?

विभिन्न कारणों के चलते गोवा की खज़ान कृषि प्रणाली अस्तित्त्व के संकट से गुज़र रही है। उल्लेखनीय है कि यह गोवा के सलीम अली पक्षी अभयारण्य में एक परम्परागत कृषि प्रणाली है, जिसे ‘खज़ान कृषि’ कहा जाता है।

खज़ान कृषि तथा इसकी कार्य प्रणाली

  • पुर्तगालियों के गोवा आने से पहले इसमें संसाधनों के प्रबंधन का कार्य स्थानीय समुदाय द्वारा किया जाता था। इन समुदायों को ग्राम-संघ कहा जाता था। पुर्तगाली शासन के दौरान इन संघों के नाम में परिवर्तन कर दिया गया था।
  • खज़ान नदी या समुद्र की भूमि का ही हिस्सा होता है। इसमें मैड़ों (भंडारण के लिये चारो तरफ दीवार) का एक नेटवर्क होता है, जो कृषि क्षेत्रों और आस-पास के गाँव को ज्वार (Tide) के प्रवाह से बचाता है।
  • खज़ान भूमि में तीन विशेषताएँ होती हैं- स्लुईस फाटक, पोइम और दो प्रकार के मैड़।
  • बाहरी मैड़ नेटवर्क नदी के ज्वार प्रवाह से क्षेत्र की रक्षा करता है। इस मैड़ का निर्माण स्थानीय रूप से उपलब्ध पत्थर और चिकनी मिट्टी द्वारा किया गया है।
  • मिट्टी का प्रयोग बाहरी मैड़ की दो परतों के बीच में भराव के रूप में किया जाता है, जो ज्वार की लहरों की भेधता का सामना करने में सक्षम होती हैं।
  • आतंरिक मैड़ पुआल, मिट्टी और पत्थरों से बने होते हैं, जो पोषक तत्त्वों को संरक्षित रखते हैं।
  • मैंग्रोव भी ज्वार की लहरों के प्रभाव को कम करते हैं तथा प्राकृतिक ब्रेकर के रूप में जाने जातें हैं।
  • ‘स्लुइस फाटक’ लकड़ी या कंक्रीट से निर्मित होते हैं जो खेत के मुहाने पर बनाए जाते हैं। यह तंत्र उच्च ज्वार के दौरान जल-स्तर को नियंत्रित करता है। इन फाटकों को निरंतर मरम्मत की आवश्यकता होती है।
  • खज़ान भूमि के आखिरी छोर पर एक गड्डा होता है, जिसे ‘पोइम’ कहते हैं। यह कृषि क्षेत्र को उच्च ज्वार से होने वाले नुकसान से बचाता है तथा अतिरिक्त जल के लिये एक भंडार के रूप में भी कार्य करता है। इस जल के भंडार में मछली, केकड़ा और झींगे का पालन पोषण किया जाता है, जो ज्वार प्रवाह के दौरान एक बड़े जाल की सहायता से फँस जाते हैं।
  • इस प्रणाली द्वारा जल की अधिकता को नियंत्रित करके उसका उपयोग धान की खेती के लिये किया जाता है।
  • खज़ान भूमि का प्रत्येक हिस्सा महत्त्वपूर्ण है, जिसे कुशलता से प्रयोग किया जाता है। इन मैड़ों का उपयोग विभिन्न प्रकार की सब्जियाँ उगाने में किया जाता था।

पतन के कारण

  • खज़ान कृषि प्रणाली के समाप्त होने का मुख्य कारण लोगों की मत्स्यपालन में बढ़ती रुचि है।
  • सरकारी सहायता की कमी के चलते यह प्रणाली अपने अस्तित्त्व के लिये संघर्ष कर रही है।
  • इस तंत्र की समाप्ति का एक कारण यह भी है कि आधुनिक पीढ़ी विशेष रूप से युवा आबादी कृषि में कम रुचि रखती है।
  • विशेष रूप से वर्ष 1961 के कृषि सुधारों के बाद तथा वर्तमान समय में कई कारणों के चलते यह भूमि परती और क्षय की स्थिति में है।
  • कम उत्पादकता तथा रख-रखाव की कमी के चलते यह भूमि प्राकृतिक रूप से मैंग्रोव के पुनर्ग्रहण हेतु उपयुक्त हो गई है।
  • मैंग्रोव (वनों) को कानून द्वारा संरक्षण प्राप्त है। अतः इनकी कटाई अवैध है तथा जिन क्षेत्रों में ये पेड़ उगाए जाते हैं, वे तटीय विनियमन क्षेत्र के दायरे में आते हैं। वर्ष  2011 की अधिसूचना के अनुसार, मैंग्रोव क्षेत्रों को तटीय विनियमन क्षेत्र-I (CRZ-I) के रूप में वर्गीकृत किया गया है, जिनमें विकासीय गतिविधियाँ प्रतिबंधित हैं।

महत्त्व

  • खज़ान प्रणाली किसानों और मछुआरों को समन्वय के साथ कार्य करने का मौका प्रदान करती है, जो कि गोवा की मछली, करी और चावल को प्रधान व्यंजन के रूप में बनाए रखने में सहायता करती है।
  • गोवा तथा भारत के अधिकांश राज्यों के स्थानीय समुदाय के लोगों की आजीविका कृषि पर निर्भर है। यह प्रणाली भारत के किसानों की आजीविका का मुख्य साधन बनने की क्षमता रखती है। साथ ही, यह भारत सरकार के वर्ष 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने के लक्ष्य में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
  • यह प्रणाली सामुदायिक कृषि का एक अभूतपूर्व उदहारण है, जिसे वर्तमान समय में सहकारी कृषि के रूप में अपनाया जा रहा है।

सलीम अली पक्षी अभयारण्य

  • सलीम अली पक्षी अभयारण्य गोवा का सबसे छोटा संरक्षित क्षेत्र है। इसमें लगभग दो वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में हरे-भरे मैंग्रोव वन हैं।
  • यह अभ्यारण चोराव पर स्थित है जोकि एक एस्चुएरी द्वीप है, यह गोवा की राजधानी पणजी से पाँच किलोमीटर दूर मंडोवी नदी में है।
  • यह अभ्यारण और इसके चारो-ओर का क्षेत्र मगरमच्छ, चिकने ऊदबिलाव, चमकादड़, सर्प, केकड़े, और मृदा झींगुर का आवास है।

आगे की राह

  • वर्तमान में बहुत ही कम खज़ान किसान बचे हैं। किसानों की घटती संख्या का मुख्य कारण यह है कि पुराने समय में इस प्रणाली का अच्छी तरह से रख-रखाव किया जाता था और लोग आराम से खेती कर सकते थे, लेकिन वर्तमान परिस्थितियाँ खज़ान किसानों के बिल्कुल विपरीत हैं।
  • खज़ान की बहाली के लिये सरकार से कई बार अपील की गई, किंतु कोई कार्यवाही नहीं हुई, केवल कुछ स्थानों पर स्लुइस फाटकों की मरम्मत की गई लेकिन इन स्थानों पर किसान खज़ान प्रणाली के महत्त्व को नहीं समझते हैं।
  • वर्ष 2012 के बाद से खज़ान भूमि विधयेक की चर्चा चल रही है, जिसका उद्देश्य मैड़, पोइम और स्लुइस फाटकों की देखभाल के साथ-साथ इस प्रणाली को बनाए रखने हेतु कई महत्त्वपूर्ण प्रावधान किये गए है। इस विधयेक को पारित किया जाना चाहिये क्योंकि यह इस कृषि प्रणाली को पुनर्जीवित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करेगा।
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