विदेशी अंशदान (विनियमन) नियमों में बड़ा बदलाव

संदर्भ 

  • हाल ही में केंद्र सरकार ने विदेशी अंशदान (विनियमन) नियमों (FCRA Rules) में महत्वपूर्ण संशोधन करते हुए विदेशी धन प्राप्त करने वाली गैर-सरकारी संस्थाओं (NGOs) के लिए अनुपालन और जवाबदेही की नई रूपरेखा तय की है।

प्रमुख बिंदु 

  • 22 जून को अधिसूचित इन संशोधनों का उद्देश्य विदेशी फंड के उपयोग को अधिक पारदर्शी बनाना, गतिविधियों की स्पष्ट निगरानी सुनिश्चित करना तथा धन के उपयोग को निर्धारित उद्देश्यों तक सीमित रखना है।  
  • इन संशोधनों के बाद विदेशी फंड प्राप्त करने की इच्छुक संस्थाओं को केवल सामान्य पंजीकरण प्राप्त करना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उन्हें अपनी गतिविधियों की प्रकृति, कार्यक्षेत्र और प्रशासनिक संरचना के बारे में विस्तृत जानकारी भी उपलब्ध करानी होगी। इससे सरकार को विदेशी अंशदान के स्रोत, उपयोग और प्रभाव की अधिक प्रभावी निगरानी करने में सहायता मिलेगी।

गतिविधियों का स्पष्ट वर्गीकरण 

  • नए नियमों के तहत विदेशी धन प्राप्त करने वाली संस्थाओं को पाँच निर्धारित श्रेणियों -
    • सामाजिक 
    • आर्थिक 
    • शैक्षिक 
    • सांस्कृतिक और 
    • धार्मिक में से किसी एक या अधिक के अंतर्गत पंजीकरण कराना होगा। 
  • यद्यपि पहले भी इन व्यापक श्रेणियों का प्रावधान था, लेकिन पहली बार प्रत्येक श्रेणी के अंतर्गत अनुमत गतिविधियों की विस्तृत सूची निर्धारित की गई है। 
  • इस कदम को सरकार की उस कोशिश के रूप में देखा जा सकता है, जिसके माध्यम से यह सुनिश्चित किया जाएगा कि विदेशी धन केवल उन्हीं कार्यों में खर्च हो, जिनके लिए संस्था को अनुमति प्रदान की गई है। इससे गतिविधियों की अस्पष्टता कम होगी और नियामकीय निगरानी अधिक प्रभावी बन सकेगी।

विदेशी अंशदान (Foreign Contribution) क्या है?

  • विदेशी अंशदान (Foreign Contribution) की परिभाषा विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम, 2010 (FCRA, 2010) की धारा 2(1)(h) में दी गई है। 
  • इसके अनुसार, किसी भी विदेशी स्रोत (Foreign Source) द्वारा किया गया दान, डिलिवरी या हस्तांतरण (Transfer) निम्नलिखित परिस्थितियों में विदेशी अंशदान माना जाएगा-

(i) किसी वस्तु (Article) का दान: 

  • ऐसी किसी वस्तु का दान, जो किसी व्यक्ति को उसके व्यक्तिगत उपयोग के लिए उपहार स्वरूप दी गई वस्तु न हो, बशर्ते कि उस वस्तु का भारत में बाजार मूल्य, उपहार दिए जाने की तिथि पर, केंद्र सरकार द्वारा समय-समय पर नियमों के माध्यम से निर्धारित राशि से अधिक हो।

(ii) किसी मुद्रा (Currency) का दान: 

  • किसी भी प्रकार की मुद्रा, चाहे वह भारतीय मुद्रा हो या विदेशी मुद्रा, का दान, डिलिवरी या हस्तांतरण।

(iii) प्रतिभूति (Security) का दान: 

  • प्रतिभूति संविदा (विनियमन) अधिनियम, 1956 की धारा 2 के खंड (h) में परिभाषित किसी प्रतिभूति का दान, डिलिवरी या हस्तांतरण। इसमें विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम, 1999 (FEMA) की धारा 2 के खंड (o) में परिभाषित विदेशी प्रतिभूतियाँ भी शामिल हैं।
  • यदि कोई व्यक्ति किसी विदेशी स्रोत से प्रत्यक्ष रूप से या एक अथवा अधिक व्यक्तियों के माध्यम से कोई वस्तु, मुद्रा या विदेशी प्रतिभूति प्राप्त करता है और बाद में उसे किसी अन्य व्यक्ति को दान, प्रदाय या हस्तांतरित करता है, तो वह भी विदेशी अंशदान माना जाएगा।
  • विदेशी अंशदान से प्राप्त धनराशि को धारा 17(1) के अंतर्गत निर्दिष्ट बैंक खाते में जमा करने पर उस पर अर्जित ब्याज, अथवा विदेशी अंशदान से प्राप्त कोई अन्य आय भी विदेशी अंशदान मानी जाएगी।

निम्नलिखित प्राप्तियाँ विदेशी अंशदान की परिभाषा से बाहर होंगी

  • भारत में किसी विदेशी स्रोत से प्राप्त शुल्क (Fee);
  • भारत में किसी शैक्षणिक संस्था द्वारा विदेशी छात्रों से ली गई फीस;
  • किसी व्यक्ति द्वारा अपने व्यवसाय, व्यापार या वाणिज्य के सामान्य संचालन के दौरान वस्तुओं या सेवाओं के बदले प्राप्त लागत या भुगतान;
  • ऐसी फीस या लागत के भुगतान हेतु किसी विदेशी स्रोत या उसके एजेंट से प्राप्त राशि।
  • अर्थात, व्यवसाय, व्यापार, वाणिज्य या शैक्षणिक सेवाओं के बदले प्राप्त वैध भुगतान को विदेशी अंशदान नहीं माना जाएगा। 

पारदर्शिता और सूचना प्रकटीकरण

  • संशोधित नियम संस्थाओं पर सूचना प्रकटीकरण की अतिरिक्त जिम्मेदारियाँ भी डालते हैं। अब एनजीओ को अपनी वेबसाइट, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, प्रकाशनों तथा कार्यक्रमों के भौगोलिक दायरे की जानकारी देना अनिवार्य होगा।
  • विशेषज्ञों के अनुसार, यह प्रावधान डिजिटल युग में संस्थाओं की सार्वजनिक जवाबदेही को बढ़ाने का प्रयास है। सरकार के लिए यह जानकारी न केवल निगरानी का माध्यम बनेगी, बल्कि जनता भी किसी संस्था की गतिविधियों और कार्यक्षेत्र के बारे में अधिक जानकारी प्राप्त कर सकेगी। 

शुल्क संरचना में बड़ा परिवर्तन 

  • नियमों में एक महत्वपूर्ण बदलाव शुल्क व्यवस्था से भी जुड़ा है। पहले एफसीआरए (FCRA) पंजीकरण के लिए एकमुश्त शुल्क का प्रावधान था, लेकिन अब प्रत्येक स्वीकृत उद्देश्य तथा प्रत्येक राज्य या केंद्र शासित प्रदेश में संचालन के लिए अलग-अलग शुल्क देय होगा। 
  • इसका सीधा प्रभाव उन संस्थाओं पर पड़ सकता है जो अनेक राज्यों में विभिन्न प्रकार की गतिविधियाँ संचालित करती हैं। ऐसे संगठनों की अनुपालन लागत बढ़ सकती है और उन्हें अपनी परियोजनाओं की योजना अधिक सावधानी से बनानी पड़ सकती है। 

प्रमुख पदाधिकारी की विस्तृत परिभाषा 

  • सरकार ने केवल संस्थागत गतिविधियों तक ही नहीं, बल्कि संगठन के नेतृत्व ढांचे तक भी नियमों का विस्तार किया है। संशोधन के तहत प्रमुख पदाधिकारी की परिभाषा को व्यापक बनाया गया है। अब ट्रस्टी, साझेदार, हिंदू अविभाजित परिवार (HUF) के कर्ता, संचालन निकाय के सदस्य तथा संगठन के प्रबंधन या नियंत्रण से जुड़े अन्य व्यक्ति भी इस श्रेणी में शामिल होंगे।
  • इस परिवर्तन का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना प्रतीत होता है कि संस्था के संचालन में प्रभाव रखने वाले सभी व्यक्तियों की जवाबदेही तय की जा सके और किसी भी प्रकार की नियामकीय जांच केवल औपचारिक पदाधिकारियों तक सीमित न रहे। 

विदेशी नागरिकों की भूमिका पर सख्ती 

  • संशोधित नियमों के अनुसार, यदि किसी संस्था के प्रमुख पदाधिकारियों में भारतीय मूल के व्यक्तियों को छोड़कर विदेशी नागरिक शामिल हैं, तो सामान्य परिस्थितियों में ऐसी संस्था को एफसीआरए पंजीकरण या पूर्व अनुमति प्राप्त करने के योग्य नहीं माना जाएगा। हालांकि केंद्र सरकार को विशेष परिस्थितियों में छूट देने का अधिकार रहेगा। 
  • यह प्रावधान राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेशी प्रभाव को लेकर सरकार की बढ़ती सतर्कता को दर्शाता है। इसके माध्यम से विदेशी फंड प्राप्त करने वाली संस्थाओं के नेतृत्व में विदेशी नागरिकों की भूमिका पर अधिक नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास किया गया है।  

प्रकाशनों की अनिवार्य घोषणा 

  • नए नियमों के तहत संस्थाओं को यह भी बताना होगा कि संस्था या उसके किसी प्रमुख पदाधिकारी ने वर्ष के दौरान कोई पुस्तक, पत्रिका, समाचार-पत्र लेख अथवा अन्य प्रकाशन प्रकाशित किया है या नहीं।
  • यह प्रावधान केवल वित्तीय गतिविधियों तक सीमित निगरानी की बजाय संस्थाओं के वैचारिक और सार्वजनिक हस्तक्षेपों पर भी ध्यान केंद्रित करता दिखाई देता है। इससे सरकार को यह समझने में सहायता मिल सकती है कि विदेशी फंड प्राप्त करने वाली संस्थाएँ सार्वजनिक विमर्श में किस प्रकार की भूमिका निभा रही हैं। 

राजनीतिक गतिविधियों पर स्पष्ट सीमाएँ 

  • संशोधनों में कुछ गतिविधियों के साथ विशेष शर्तें भी जोड़ी गई हैं। उदाहरण के लिए, शैक्षिक गतिविधियों के अंतर्गत संवैधानिक अधिकारों, मौलिक कर्तव्यों और नागरिक जिम्मेदारियों से संबंधित जागरूकता कार्यक्रमों को स्पष्ट रूप से गैर-राजनीतिक रखने की शर्त रखी गई है।
  • इसी प्रकार सांस्कृतिक गतिविधियों में भारतीय परंपराओं से प्रेरित समकालीन कला के संवर्धन को अनुमति दी गई है, लेकिन राजनीतिक अथवा वैचारिक सामग्री को इससे बाहर रखा गया है।
  • इन प्रावधानों से यह संकेत मिलता है कि सरकार विदेशी धन के उपयोग को सामाजिक और विकासात्मक गतिविधियों तक सीमित रखना चाहती है तथा राजनीतिक या वैचारिक प्रभाव की संभावनाओं को कम करना चाहती है।

धार्मिक और सामाजिक गतिविधियों का दायरा 

  • धार्मिक श्रेणी के अंतर्गत धार्मिक शिक्षा, सत्संग, नैतिक शिक्षा, ध्यान शिविर तथा शमशान और कब्रिस्तान के रखरखाव जैसी गतिविधियों को अनुमति दी गई है। हालांकि धर्मांतरण से जुड़ी गतिविधियों को स्पष्ट रूप से बाहर रखा गया है।
  • वहीं सामाजिक और आर्थिक श्रेणियों में भी अनेक गतिविधियों को शामिल किया गया है, जिससे विकास, कल्याण और सामुदायिक सेवाओं से जुड़े कार्यों के लिए विदेशी फंड के उपयोग की अनुमति बनी रहेगी। 

उल्लंघनों पर कठोर दंड 

  • नियमों के साथ-साथ गृह मंत्रालय ने एफसीआरए उल्लंघनों के लिए दंड व्यवस्था को भी अधिक स्पष्ट और कठोर बनाया है। निर्धारित उद्देश्य से हटकर विदेशी धन का उपयोग, स्वीकृत क्षेत्र से बाहर खर्च, प्रशासनिक व्यय की सीमा का उल्लंघन, सट्टात्मक निवेश या धन का दुरुपयोग अब भारी आर्थिक दंड को आमंत्रित करेगा। 
  • अधिकांश मामलों में दंड संबंधित राशि के 30 प्रतिशत तक या न्यूनतम ₹1 लाख, जो भी अधिक हो, निर्धारित किया गया है। यह व्यवस्था संस्थाओं को वित्तीय अनुशासन बनाए रखने और नियमों के अनुपालन के लिए प्रेरित करने का प्रयास करती है। 

निष्कर्ष 

  • एफसीआरए नियमों में किए गए ये संशोधन विदेशी फंड प्राप्त करने वाली संस्थाओं के लिए अधिक पारदर्शिता, जवाबदेही और नियामकीय निगरानी की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हैं। सरकार का तर्क है कि इससे विदेशी अंशदान का उपयोग निर्धारित उद्देश्यों तक सीमित रहेगा और राष्ट्रीय हितों की बेहतर सुरक्षा सुनिश्चित होगी। दूसरी ओर, कई संस्थाओं के लिए बढ़ी हुई अनुपालन आवश्यकताएँ, अतिरिक्त शुल्क और विस्तृत रिपोर्टिंग व्यवस्था प्रशासनिक बोझ को बढ़ा सकती हैं। 
  • आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि ये संशोधन विदेशी वित्तपोषण वाले नागरिक समाज संगठनों के कार्य संचालन, स्वतंत्रता और विकासात्मक गतिविधियों को किस प्रकार प्रभावित करते हैं तथा सरकार और गैर-सरकारी क्षेत्र के बीच संतुलन किस दिशा में विकसित होता है।
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