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मलेरिया और जीन ड्राइव तकनीक

संदर्भ  

  • दशकों से मलेरिया नियंत्रण के पारंपरिक उपाय जैसे मच्छरदानी, कीटनाशक और दवाइयाँ लाखों जिंदगियां बचाने में सफल रहे हैं। इसके बावजूद, मलेरिया आज भी दुनिया की सबसे घातक बीमारियों में से एक है, जो हर साल विशेष रूप से उप-सहारा अफ्रीका में पाँच लाख से अधिक मासूमों की जान ले लेती है। यद्यपि अब, वैज्ञानिक एक क्रांतिकारी दृष्टिकोण पर काम कर रहे हैं अर्थात मच्छरों को खत्म करने के बजाय, उन्हें इस तरह बदल देना कि वे मलेरिया फैला ही न सकें। 

ट्रांसमिशन जीरो: तंजानिया का नेतृत्व और वैश्विक नवाचार  

  • तंजानिया के इफाकारा स्वास्थ्य संस्थान और इंपीरियल कॉलेज लंदन के शोधकर्ताओं ने हाल ही में नेचर पत्रिका में एक महत्वपूर्ण अध्ययन प्रकाशित किया है। यह ट्रांसमिशन जीरो परियोजना का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य आनुवंशिक इंजीनियरिंग के माध्यम से मलेरिया के प्रसार को रोकना है। 
  • इस शोध की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि वैज्ञानिकों ने पहली बार स्थानीय अफ्रीकी क्षेत्रों में पाए जाने वाले मलेरिया परजीवियों को आनुवंशिक रूप से संशोधित मच्छरों के माध्यम से सफलतापूर्वक रोककर दिखाया है।  

जीन ड्राइव (Gene Drive): प्रकृति के नियमों को चुनौती 

सामान्यतः, किसी जीव के जीन उसकी संतान में पहुँचने की संभावना 50% होती है। लेकिन CRISPR–Cas9 तकनीक का उपयोग कर वैज्ञानिक इस नियम को बदल रहे हैं :

  • वैज्ञानिक एक ऐसी प्रणाली तैयार कर रहे हैं जो प्रजनन के दौरान दूसरे गुणसूत्र पर अपनी प्रतिलिपि बना लेती है।
  • इसके कारण 90% से अधिक संतानों में संशोधित जीन पहुँच जाता है, जिससे पूरी आबादी में यह बदलाव तेजी से फैल जाता है। 

दोहरी रणनीति: दमन बनाम संशोधन 

शोधकर्ता मुख्य रूप से दो प्रकार के जीन ड्राइव पर काम कर रहे हैं :

  • जनसंख्या दमन (Population Suppression) : इसमें मादा मच्छरों की प्रजनन क्षमता को लक्षित किया जाता है ताकि उनकी आबादी धीरे-धीरे खत्म हो जाए।
  • जनसंख्या संशोधन (Population Modification) : इसे प्रतिस्थापन भी कहा जाता है। इसमें मच्छर जीवित रहते हैं, लेकिन उनके शरीर में ऐसे जीन डाल दिए जाते हैं जो मलेरिया परजीवी (Plasmodium) को संक्रामक अवस्था तक पहुँचने से पहले ही नष्ट कर देते हैं। 

प्रयोगशाला से वास्तविक दुनिया की ओर 

2015 से 2021 के बीच हुए प्रयोगों ने इस तकनीक की प्रभावकारिता को साबित किया है :  

  • इनडोर प्रयोग : बड़े पिंजरों में किए गए परीक्षणों में डबल्ससेक्स नामक जीन को लक्षित कर मच्छरों की पूरी आबादी को कुछ ही महीनों में समाप्त कर दिया गया। 
  • तंजानिया का सफल परीक्षण : स्थानीय वैज्ञानिकों ने उच्च-सुरक्षा वाली प्रयोगशालाओं में स्थानीय एनोफेलेस गैम्बिया मच्छरों को संशोधित किया। जब इन मच्छरों को मलेरिया पीड़ित बच्चों के रक्त का सेवन कराया गया, तो उनके भीतर परजीवी विकसित होने में विफल रहे। 

चुनौतियाँ 

यद्यपि यह तकनीक बेहद आशाजनक है, लेकिन इसके सामने कई वैज्ञानिक और नैतिक चुनौतियाँ हैं : 

  • पारिस्थितिक जोखिम : किसी प्रजाति को पूरी तरह समाप्त करने या बदलने के पर्यावरण पर क्या प्रभाव होंगे, इसका गहन मूल्यांकन अभी शेष है। 
  • प्रतिरोध : मलेरिया परजीवी भी समय के साथ इन आनुवंशिक हथियारों के प्रति प्रतिरोध विकसित कर सकते हैं।
  • सामुदायिक भागीदारी : किसी भी संशोधित मच्छर को खुले पर्यावरण में छोड़ने से पहले नियामक मंजूरी और स्थानीय समुदायों का विश्वास जीतना अनिवार्य है। 

आगे की राह 

  • अधिकांश विशेषज्ञ मानते हैं कि जीन ड्राइव अकेले मलेरिया का समाधान नहीं है। इसके लिए मच्छरदानी, कीटनाशक, दवाइयाँ, टीके और मजबूत स्वास्थ्य प्रणालियों का संयोजन आवश्यक होगा। यदि यह तकनीक पूरी तरह सुरक्षित और स्वीकार्य साबित होती है, तो यह मलेरिया नियंत्रण में एक महत्वपूर्ण अतिरिक्त साधन बन सकती है। फिलहाल, जीन-चालित मच्छरों को अभी तक प्राकृतिक वातावरण में नहीं छोड़ा गया है। भविष्य में ऐसा करने का निर्णय व्यापक पर्यावरणीय मूल्यांकन, सख्त नियामक प्रक्रियाओं और समुदाय की भागीदारी के आधार पर ही लिया जाएगा। 
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