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दुर्लभ रोगों की दवाएँ: भारत के फार्मा क्षेत्र का अगला अवसर

चर्चा में क्यों?

  • भारत सस्ती जेनेरिक दवाओं के निर्माण के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है। अब भारत के सामने अगली बड़ी चुनौती दुर्लभ रोगों (Rare Diseases) के लिए दवाओं को सुलभ और किफायती बनाना है।
  • भारत अपनी बड़ी रोगी आबादी, कम लागत वाले दवा निर्माण, जेनेरिक दवाओं, बायोसिमिलर और उन्नत चिकित्सा तकनीकों की क्षमता का उपयोग करके दुर्लभ रोगों की दवाओं के वैश्विक केंद्र के रूप में उभर सकता है।

दुर्लभ रोग क्या हैं?

  • दुर्लभ रोग ऐसे रोग हैं जो किसी व्यक्ति या आबादी के बहुत छोटे हिस्से को प्रभावित करते हैं। हालांकि प्रत्येक रोग से प्रभावित लोगों की संख्या कम होती है, लेकिन दुनिया में लगभग 8,000 दुर्लभ रोग मौजूद हैं और सामूहिक रूप से ये करोड़ों लोगों को प्रभावित करते हैं।
  • भारत में अब तक लगभग 1,004 दुर्लभ आनुवंशिक विकारों की पहचान की जा चुकी है।
  • इन रोगों के लिए विकसित दवाओं को अक्सर ऑर्फन ड्रग्स (Orphan Drugs) कहा जाता है, क्योंकि इनका बाजार छोटा होने के कारण पहले दवा कंपनियों के लिए इनका विकास व्यावसायिक रूप से आकर्षक नहीं था।

ऑर्फन ड्रग्स को बढ़ावा देने के लिए वैश्विक प्रयास

  • दुर्लभ रोगों के लिए दवाएँ विकसित करने में कंपनियों की कम रुचि को देखते हुए कई देशों ने विशेष प्रोत्साहन दिए।

अमेरिका का Orphan Drug Act

  • अमेरिका ने 1983 में Orphan Drug Act लागू किया।
  • इसके तहत कंपनियों को कई प्रकार के प्रोत्साहन दिए गए, जैसे—
    • कर संबंधी प्रोत्साहन। 
    • अनुसंधान अनुदान। 
    • नियामक शुल्क में छूट। 
    • कुछ दवाओं के लिए बाजार में विशेष अवधि की सुरक्षा। 
  • इससे दुर्लभ रोगों की दवाओं के विकास में कंपनियों की रुचि बढ़ी।
  • लेख के अनुसार, कानून लागू होने से पहले अमेरिका में ऐसी केवल 38 दवाओं को मंजूरी मिली थी, जबकि 2022 तक यह संख्या 1,122 हो गई।
  • बाद में जापान, ऑस्ट्रेलिया और यूरोपीय संघ ने भी दुर्लभ रोगों की दवाओं के विकास को प्रोत्साहित करने के लिए समान नीतियाँ अपनाईं।

दुर्लभ रोगों की दवाएँ इतनी महंगी क्यों हैं?

दुर्लभ रोगों की दवाओं के सामने एक प्रमुख समस्या यह है कि इनके लिए रोगियों की संख्या बहुत कम होती है।

इसके कारण-

  • नैदानिक परीक्षणों के लिए रोगियों को ढूँढना कठिन होता है। 
  • अनुसंधान एवं विकास की लागत अधिक होती है। 
  • दवाओं का बाजार छोटा होता है। 
  • उन्नत जीन और कोशिका उपचार अत्यधिक महंगे होते हैं। 
  • कम मात्रा में उच्च गुणवत्ता वाला उत्पादन करना चुनौतीपूर्ण होता है। 

इसी कारण कुछ दुर्लभ रोगों की दवाओं की कीमत करोड़ों रुपये तक पहुँच जाती है।

उदाहरण के लिए, लेख में दी गई कुछ दवाओं की कीमत इस प्रकार है—

  • Lenmeldy: लगभग 42.5 लाख डॉलर, एक बार का उपचार।
  • Hemgenix: लगभग 35 लाख डॉलर, एक बार का उपचार।
  • Elevidys: लगभग 32 लाख डॉलर, एक बार का उपचार।
  • Zokinvi: लगभग 10–12 लाख डॉलर प्रति वर्ष।
  • Skyclarys: लगभग 3.7 लाख डॉलर प्रति वर्ष।
  • Trikafta: लगभग 2–3 लाख डॉलर प्रति वर्ष।

इस प्रकार अधिकांश मरीजों के लिए इन दवाओं तक पहुँच केवल व्यक्तिगत आय के आधार पर संभव नहीं है और सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं, बीमा या अन्य वित्तीय सहायता की आवश्यकता पड़ती है।

भारत के सामने दो प्रमुख चुनौतियाँ

1. उपचार की अत्यधिक लागत

  • भारत सरकार दुर्लभ रोगों के पात्र मरीजों को उपचार के लिए ₹50 लाख तक की सहायता प्रदान करती है।
  • हालांकि, कुछ जीन उपचारों की लागत इससे कई गुना अधिक हो सकती है। ऐसे मामलों में मरीजों के परिवारों को क्राउडफंडिंग का सहारा लेना पड़ता है।
  • लेख के अनुसार, 2025 के मध्य में कोलकाता के एक 16 महीने के बच्चे के जीन उपचार के लिए लगभग ₹9 करोड़ क्राउडफंडिंग के माध्यम से जुटाए गए।

2. उपचार की उपलब्धता

  • दुर्लभ रोगों के लिए कई दवाएँ विकसित की जा चुकी हैं, लेकिन लेख के अनुसार वे केवल लगभग 5% दुर्लभ रोगों और संबंधित स्थितियों को ही कवर करती हैं।
  • अर्थात बहुत से मरीजों के पास महंगी दवाएँ उपलब्ध होने के बावजूद उपयुक्त उपचार ही मौजूद नहीं है।

दुर्लभ रोगों की नई दवाएँ विकसित करने की चुनौतियाँ

रोगियों की पहचान

  • नैदानिक परीक्षणों के लिए पर्याप्त संख्या में उपयुक्त रोगियों को ढूँढना कठिन होता है।
  • नैदानिक परीक्षणों के लिए उपयुक्त मानदंड
  • दवा की प्रभावशीलता मापने के लिए उपयुक्त क्लिनिकल एंडपॉइंट्स निर्धारित करना चुनौतीपूर्ण होता है।

छोटे स्तर पर उत्पादन

  • दवा को कम मात्रा में बनाते हुए भी उच्च गुणवत्ता और सुरक्षा बनाए रखना आवश्यक है।

वितरण

  • दुर्लभ रोगों के मरीज देश के विभिन्न हिस्सों में फैले होते हैं। इसलिए दवा की उपलब्धता और वितरण भी चुनौतीपूर्ण है।

भारत के पास क्या अवसर है?

1. बड़ी आबादी

  • भारत की आबादी 1.4 अरब से अधिक है।
  • किसी रोग की व्यापकता कम होने के बावजूद भारत की विशाल आबादी के कारण उस रोग से प्रभावित लोगों की कुल संख्या पर्याप्त हो सकती है।
  • इसके अलावा कुछ समुदायों में अंतर्विवाह (Endogamy) की अधिकता के कारण कुछ आनुवंशिक रोगों की व्यापकता सामान्य आबादी की तुलना में अधिक हो सकती है।
  • उदाहरण के लिए, लेख के अनुसार भारत के कुछ जातीय समूहों में बीटा-थैलेसीमिया की व्यापकता 10.5% तक पाई गई है, जबकि सामान्य भारतीय आबादी में यह लगभग 3.7% बताई गई है।

2. रोगी समूह और रजिस्ट्रियाँ

  • भारत में दुर्लभ रोगों से संबंधित रोगी सहायता समूह और रोगी रजिस्ट्रियाँ तेजी से विकसित हो रही हैं।
  • उदाहरण—
  • GNE मायोपैथी के लगभग 70 लोगों पर दीर्घकालिक अध्ययन। 
  • Rett Syndrome की रोगी रजिस्ट्री में 400 से अधिक मरीज। 

ऐसी रजिस्ट्रियाँ नैदानिक परीक्षणों के लिए उपयुक्त मरीजों की पहचान में मदद कर सकती हैं।

3. भारत की दवा निर्माण क्षमता

भारत को अक्सर “दुनिया की फार्मेसी” कहा जाता है।

भारत की प्रमुख क्षमताएँ हैं-

  • जेनेरिक दवाएँ। 
  • बायोसिमिलर। 
  • छोटे अणु वाली दवाएँ। 
  • जीन और कोशिका आधारित उपचार। 
  • कम लागत वाला दवा निर्माण। 
  • बड़े पैमाने पर दवा निर्यात। 

भारत में CAR-T जैसी व्यक्तिगत चिकित्सा तकनीक का भी उत्पादन अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप किया जा रहा है।

इससे भारत के पास दुर्लभ रोगों की दवाओं के कम लागत वाले उत्पादन की मजबूत संभावना है।

भारत में नैदानिक परीक्षणों की संभावना

  • भारत में बड़ी रोगी आबादी और विभिन्न आनुवंशिक समूहों की मौजूदगी दुर्लभ रोगों के नैदानिक परीक्षणों के लिए उपयोगी हो सकती है।
  • लेकिन वर्तमान में भारतीय मरीज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होने वाले ऑर्फन ड्रग परीक्षणों में पर्याप्त रूप से शामिल नहीं हैं।
  • इसलिए सरकार को-विदेशी दवा कंपनियाँ + भारतीय शोध संस्थान + रोगी संगठन के बीच सहयोग को बढ़ावा देना चाहिए।
  • विदेशी कंपनियों को भारत में दुर्लभ रोगों के लिए दवा विकास केंद्र स्थापित करने के लिए भी प्रोत्साहित किया जा सकता है।

लाभ-साझेदारी का विचार

  • दुर्लभ रोगों के शोध में रोगियों और देशों से प्राप्त आनुवंशिक एवं जैविक जानकारी महत्वपूर्ण हो सकती है।
  • इसलिए Benefit Sharing यानी लाभ-साझेदारी का विचार महत्वपूर्ण है।
  • इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अनुसंधान में योगदान देने वाले देशों और समुदायों को विकसित होने वाले उत्पादों और उपचारों का उचित लाभ मिले।
  • यह विचार विश्व स्वास्थ्य संगठन के Pandemic Agreement के संदर्भ में भी चर्चा में रहा है।
  • भारत के संदर्भ में इसका अर्थ यह हो सकता है कि यदि भारतीय मरीज किसी दवा के विकास में योगदान देते हैं, तो विकसित दवा भारत में उनके लिए सुलभ और किफायती भी हो।

भारत में दुर्लभ रोगों की दवाओं का निर्माण

भारत पहले से ही कम लागत पर उच्च गुणवत्ता वाली दवाओं के निर्माण में सक्षम है।

लेख के अनुसार-

  • भारत अमेरिकी जेनेरिक दवाओं के लगभग 47% प्रिस्क्रिप्शन की आपूर्ति करता है। 
  • अमेरिका के बाहर अमेरिकी नियामकों द्वारा स्वीकृत सबसे अधिक दवा निर्माण केंद्र भारत में हैं। 
  • भारत अमेरिका और यूरोपीय संघ को बायोसिमिलर निर्यात करता है। 
  • अमेरिका में बिकने वाले बायोसिमिलर का लगभग 15% भारत से आता है। 

इस क्षमता का उपयोग दुर्लभ रोगों की दवाओं के उत्पादन में भी किया जा सकता है।

Rule 101 और भारत का नियामक अवसर

  • New Drugs and Clinical Trials Rules, 2019 के Rule 101 के तहत CDSCO ने कुछ देशों को निर्दिष्ट किया है।
  • इन देशों में अमेरिका और ब्रिटेन भी शामिल हैं।
  • यदि इन निर्दिष्ट देशों में किसी दवा को मंजूरी मिल चुकी है, तो कुछ परिस्थितियों में भारत में उस दवा के लिए दोबारा नया नैदानिक परीक्षण आवश्यक नहीं होता।

इससे संभावित लाभ

  • नियामक प्रक्रिया तेज हो सकती है। 
  • दोहराए गए नैदानिक परीक्षणों की आवश्यकता कम हो सकती है। 
  • लागत कम हो सकती है। 
  • भारत में दवाओं की उपलब्धता बढ़ सकती है। 
  • घरेलू निर्माण को प्रोत्साहन मिल सकता है। 

हालांकि, इसके लिए स्पष्ट दिशानिर्देश, पारदर्शी प्रक्रिया और मजबूत सुरक्षा व्यवस्था आवश्यक है।

भारत सरकार क्या कर सकती है?

1. सरल और तेज नियामक व्यवस्था

  • दुर्लभ रोगों की दवाओं के लिए अलग और स्पष्ट नियामक मार्ग विकसित किया जा सकता है।
  • लेकिन इसमें :-
    • सुरक्षा। 
    • प्रभावशीलता। 
    • जैवसमतुल्यता। 
    • विषाक्तता परीक्षण। 
    • औषधि निगरानी। 
    • अच्छे विनिर्माण मानक।  से समझौता नहीं होना चाहिए।

2. PLI जैसी प्रोत्साहन व्यवस्था

  • दुर्लभ रोगों की चयनित दवाओं के निर्माण के लिए Production Linked Incentive (PLI) जैसी व्यवस्था विकसित की जा सकती है।
  • प्रोत्साहन को इससे जोड़ा जा सकता है-
    • उत्पादन। 
    • निवेश। 
    • निर्यात। 
    • मरीजों तक पहुँच। 

3. कर प्रोत्साहन

  • दुर्लभ रोगों की दवाओं के निर्माण में निवेश करने वाली कंपनियों को कर संबंधी प्रोत्साहन दिए जा सकते हैं।

4. तकनीकी हस्तांतरण

  • राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं और दवा कंपनियों के बीच तकनीकी हस्तांतरण तथा प्रक्रिया विकास को बढ़ावा दिया जा सकता है।

5. Advance Market Commitments

  • सरकार Advance Market Commitments (AMC) के माध्यम से कंपनियों से निश्चित मात्रा में दवाएँ खरीदने की प्रतिबद्धता कर सकती है।इससे कंपनियों को बाजार की अनिश्चितता से सुरक्षा मिलेगी।

6. सरकारी स्वास्थ्य नेटवर्क का उपयोग

दुर्लभ रोगों की दवाओं को निम्न माध्यमों से मरीजों तक पहुँचाया जा सकता है—

  • दुर्लभ रोगों के लिए Centres of Excellence। 
  • केंद्रीय सरकारी स्वास्थ्य योजना। 
  • प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि केंद्र। 

7. विकासशील देशों को निर्यात

  • भारत अपनी कम लागत वाली विनिर्माण क्षमता का उपयोग निम्न और मध्यम आय वाले देशों को भी किफायती दुर्लभ रोगों की दवाएँ उपलब्ध कराने के लिए कर सकता है।

आगे की राह

  • भारत को केवल सस्ती जेनेरिक दवाओं का निर्माता बने रहने के बजाय दुर्लभ रोगों की दवाओं के लिए एक संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करना चाहिए।
  • इसके लिए :- रोगी रजिस्ट्री → अनुसंधान → नैदानिक परीक्षण → नियामक सुधार → दवा निर्माण → सरकारी खरीद → किफायती उपलब्धता की पूरी श्रृंखला को मजबूत करना होगा।
  • सरकारी सहायता का उद्देश्य केवल कंपनियों को सब्सिडी देना नहीं होना चाहिए। इसका उद्देश्य शुरुआती निवेश के जोखिम को कम करके दुर्लभ रोगों की दवाओं के निर्माण को व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य बनाना होना चाहिए।

UPSC प्रारंभिक परीक्षा MCQ

प्रश्न. भारत में दुर्लभ रोगों की दवाओं के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. दुर्लभ रोगों के उपचार के लिए विशेष रूप से विकसित दवाओं को सामान्यतः ऑर्फन ड्रग्स (Orphan Drugs) कहा जाता है। 
  2. अमेरिका ने दुर्लभ रोगों की दवाओं के विकास को प्रोत्साहित करने के लिए 1983 में Orphan Drug Act लागू किया था। 
  3. भारत में अब तक लगभग 1,004 दुर्लभ आनुवंशिक विकारों की पहचान की गई है। 
  4. New Drugs and Clinical Trials Rules, 2019 के Rule 101 के तहत अमेरिका में स्वीकृत प्रत्येक दुर्लभ रोग की दवा को भारत में स्वतः विपणन की मंजूरी मिल जाती है। 

उपर्युक्त कथनों में से कौन-से सही हैं?

A. केवल 1 और 2
B. केवल 1, 2 और 3
C. केवल 2, 3 और 4
D. 1, 2, 3 और 4

FAQs

Q1. दुर्लभ रोग (Rare Diseases) क्या हैं?

उत्तर :-दुर्लभ रोग ऐसी बीमारियाँ हैं जो व्यक्तिगत रूप से बहुत कम लोगों को प्रभावित करती हैं। हालांकि, दुनिया में लगभग 8,000 दुर्लभ रोग हैं और सामूहिक रूप से ये करोड़ों लोगों को प्रभावित करते हैं।

Q2. ऑर्फन ड्रग्स (Orphan Drugs) क्या हैं?

उत्तर :-दुर्लभ रोगों के उपचार के लिए विकसित दवाओं को ऑर्फन ड्रग्स कहा जाता है। इनके लिए रोगियों की संख्या कम होने के कारण इनके विकास में दवा कंपनियों की व्यावसायिक रुचि ऐतिहासिक रूप से सीमित रही है।

Q3. अमेरिका ने दुर्लभ रोगों की दवाओं को बढ़ावा देने के लिए क्या कदम उठाया?

उत्तर :-अमेरिका ने 1983 में Orphan Drug Act लागू किया। इसके तहत कर प्रोत्साहन, अनुदान, नियामक शुल्क में छूट और पात्र दवाओं के लिए बाजार विशेषाधिकार जैसे प्रोत्साहन दिए गए।

Q4. भारत में दुर्लभ रोगों से संबंधित प्रमुख चुनौती क्या है?

उत्तर :-भारत में प्रमुख चुनौतियाँ दवाओं की अत्यधिक कीमत, उपचार की सीमित उपलब्धता, नैदानिक परीक्षणों के लिए मरीजों की पहचान और दुर्लभ रोगों के लिए पर्याप्त अनुसंधान एवं विकास से जुड़ी हैं।

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