चर्चा में क्यों?
- नार्कोलेप्सी (Narcolepsy) पर महत्वपूर्ण शोध करने वाले दो वैज्ञानिकों को हाल ही में एक प्रतिष्ठित विज्ञान पुरस्कार से सम्मानित किया गया। नार्कोलेप्सी एक तंत्रिका संबंधी विकार है, जिसमें व्यक्ति को अचानक नींद आने लगती है और वह बिना चेतावनी के सो सकता है।
नार्कोलेप्सी (Narcolepsy) के बारे में
- नार्कोलेप्सी एक नींद संबंधी विकार है, जिसमें दिन के समय अत्यधिक नींद आती है और अचानक नींद के दौरे पड़ सकते हैं। व्यक्ति सामान्य गतिविधि करते हुए भी अचानक सो सकता है।
- यह मस्तिष्क की सोने और जागने के समय को नियंत्रित करने की क्षमता को प्रभावित करता है। इसके कारण काम करने, पढ़ाई करने और सामाजिक या व्यक्तिगत संबंधों को बनाए रखने में कठिनाई हो सकती है।
- यह एक अपेक्षाकृत दुर्लभ बीमारी है, लेकिन इसका प्रबंधन किया जा सकता है और यह सामान्यतः जीवनभर रहने वाली स्थिति होती है।
नार्कोलेप्सी के प्रमुख प्रकार
- टाइप-1 नार्कोलेप्सी: इसमें अचानक मांसपेशियों की ताकत कम हो जाती है जिसे कैटाप्लेक्सी (Cataplexy) कहते हैं। इसके साथ मस्तिष्क में हाइपोक्रेटिन/ऑरेक्सिन नामक रसायन का स्तर बहुत कम पाया जा सकता है। यह रसायन जागृत अवस्था तथा नींद के चक्र को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
- टाइप-2 नार्कोलेप्सी: इसमें दिन में अत्यधिक नींद आने की समस्या होती है, लेकिन आमतौर पर कैटाप्लेक्सी नहीं होता।
- सेकेंडरी नार्कोलेप्सी: मस्तिष्क की चोट, किसी घाव (lesion) अथवा अन्य चिकित्सीय या आनुवंशिक बीमारी के कारण भी नार्कोलेप्सी विकसित हो सकती है। इसमें लक्षण अधिक गंभीर हो सकते हैं और व्यक्ति को सामान्य से अधिक समय तक नींद आ सकती है।
नार्कोलेप्सी के कारण
- नार्कोलेप्सी का सटीक कारण अभी पूरी तरह ज्ञात नहीं है।
- टाइप-1 नार्कोलेप्सी से पीड़ित लोगों में हाइपोक्रेटिन (ऑरेक्सिन) का स्तर कम होता है। यह मस्तिष्क में पाया जाने वाला रसायन है, जो जागृत रहने और आरईएम नींद में प्रवेश करने की प्रक्रिया को नियंत्रित करता है।
- कैटाप्लेक्सी वाले लोगों में हाइपोक्रेटिन का स्तर विशेष रूप से कम पाया जाता है। हालांकि, मस्तिष्क में हाइपोक्रेटिन बनाने वाली कोशिकाएँ क्यों नष्ट होती हैं, इसका निश्चित कारण अभी स्पष्ट नहीं है।
- विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे ऑटोइम्यून प्रतिक्रिया हो सकती है। ऐसी स्थिति में शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली गलती से अपनी ही कोशिकाओं पर हमला करने लगती है।
- आनुवंशिक कारक भी नार्कोलेप्सी में भूमिका निभा सकते हैं। हालांकि, माता-पिता से बच्चे में इसके विरासत में जाने की संभावना बहुत कम होती है—लगभग 1% से 2%।
- कुछ मामलों में नार्कोलेप्सी का संबंध एच1एन1 फ्लू (स्वाइन फ्लू) के संपर्क से भी बताया गया है।
नार्कोलेप्सी के लक्षण
हर व्यक्ति में इसके लक्षण अलग-अलग हो सकते हैं। सामान्य लक्षणों में शामिल हैं:
- दिन में अत्यधिक नींद आना: दिन के समय बहुत अधिक नींद महसूस होना या बिना चेतावनी के अचानक सो जाना।
- कैटाप्लेक्सी: तेज भावनात्मक प्रतिक्रिया, जैसे हँसी या उत्तेजना, के बाद अचानक मांसपेशियों की ताकत कम हो जाना। इससे व्यक्ति के हाथ से वस्तु गिर सकती है या वह गिर सकता है।
- मतिभ्रम (Hallucinations): सोते समय या जागते समय ऐसी चीजें दिखाई या सुनाई देना जो वास्तव में मौजूद नहीं हैं।
- स्लीप पैरालिसिस: सोते समय या जागने पर थोड़े समय के लिए शरीर को हिलाने या बोलने में असमर्थ होना।
- ऑटोमैटिक व्यवहार: अर्ध-निद्रा की अवस्था में कोई काम करते रहना, जैसे चलना, और बाद में उस गतिविधि की याद न रहना।
- रात में नींद खराब होना: बार-बार जागना या गहरी नींद न आना, भले ही व्यक्ति आसानी से सो जाए।
नार्कोलेप्सी अपने आप में आमतौर पर जानलेवा नहीं होती, लेकिन अचानक नींद आने या मांसपेशियों की कमजोरी के कारण दुर्घटना या चोट का जोखिम बढ़ सकता है। वाहन चलाते समय, मशीनों का इस्तेमाल करते हुए या तैराकी और ऊँचाई पर चढ़ने जैसी गतिविधियों में यह जोखिम अधिक होता है।
नार्कोलेप्सी का उपचार
- नार्कोलेप्सी का फिलहाल स्थायी इलाज उपलब्ध नहीं है। हालांकि, उचित उपचार और जीवनशैली संबंधी उपायों से इसके लक्षणों को नियंत्रित किया जा सकता है और व्यक्ति की दैनिक जीवन-गुणवत्ता में सुधार लाया जा सकता है।