संदर्भ
दक्षिण एशियाई आबादी में मधुमेह, हृदय रोग और अन्य गैर-संचारी बीमारियों का बोझ लगातार बढ़ रहा है। इसके बावजूद इन बीमारियों के आनुवंशिक कारणों और जोखिम का अध्ययन करने वाले वैश्विक शोध में दक्षिण एशियाई लोगों का प्रतिनिधित्व बेहद कम है। यह अंतर केवल वैज्ञानिक अनुसंधान की कमी नहीं है, बल्कि भविष्य की स्वास्थ्य सेवाओं की सटीकता और समानता से भी जुड़ा सवाल है।
प्रमुख बिंदु
- आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता और मशीन लर्निंग स्वास्थ्य क्षेत्र में तेजी से अपनी जगह बना रहे हैं। बड़ी मात्रा में आनुवंशिक और स्वास्थ्य संबंधी आंकड़ों का विश्लेषण करके ये तकनीकें बीमारी का पहले पता लगाने, रोग के जोखिम का अनुमान लगाने, मरीजों की निगरानी करने और व्यक्ति के अनुरूप उपचार तय करने में मदद कर सकती हैं।
- लेकिन इन तकनीकों की गुणवत्ता काफी हद तक उस डेटा पर निर्भर करती है, जिससे उन्हें प्रशिक्षित किया जाता है। यदि डेटा में किसी आबादी का प्रतिनिधित्व कम है, तो उसके लिए तैयार किए गए स्वास्थ्य उपकरण भी कम सटीक हो सकते हैं।
वैश्विक शोध में दक्षिण एशियाई आबादी की कमी
- जीनोम-वाइड एसोसिएशन अध्ययनों में लंबे समय से यूरोपीय मूल के लोगों का दबदबा रहा है। हालिया विश्लेषणों के अनुसार, दक्षिण एशियाई लोग दुनिया की लगभग एक-चौथाई आबादी हैं, लेकिन वैश्विक आनुवंशिक अध्ययनों में उनका प्रतिनिधित्व बहुत कम है।
- इसका सीधा असर उन तकनीकों पर पड़ता है, जो आनुवंशिक आंकड़ों के आधार पर बीमारी का जोखिम बताती हैं। उदाहरण के लिए, पॉलीजेनिक रिस्क स्कोर में कई आनुवंशिक बदलावों को जोड़कर किसी व्यक्ति में बीमारी की संभावना का अनुमान लगाया जाता है। यदि इन्हें मुख्य रूप से यूरोपीय आबादी के आंकड़ों से तैयार किया गया हो, तो दक्षिण एशियाई लोगों में उनकी सटीकता प्रभावित हो सकती है।
- यह समस्या इसलिए गंभीर है क्योंकि दक्षिण एशियाई आबादी में मधुमेह और हृदय रोग जैसे रोगों का जोखिम कई अन्य आबादियों की तुलना में अधिक पाया जाता है। ऐसे में जिस आबादी को बेहतर जोखिम आकलन और शुरुआती उपचार की सबसे अधिक जरूरत है, उसी के लिए उपलब्ध आनुवंशिक मॉडल अपेक्षाकृत कम विश्वसनीय हो सकते हैं।
दक्षिण एशिया को एक समान आबादी मानना भी समस्या
- दक्षिण एशिया स्वयं आनुवंशिक रूप से बेहद विविध क्षेत्र है। भारत में ही हजारों समुदाय हैं और कई समूहों में लंबे समय से अंतर्विवाह की परंपरा रही है। इससे अलग-अलग समुदायों में विशिष्ट आनुवंशिक बदलाव और बीमारी से जुड़े जोखिम विकसित हुए हैं।
- इसलिए पूरे दक्षिण एशिया या भारत को एक ही आनुवंशिक समूह मानना वैज्ञानिक रूप से पर्याप्त नहीं है। आदिवासी, ग्रामीण, अंतर्विवाही और अलग-अलग भाषाई समुदायों को शोध में शामिल करना आवश्यक है। ऐसा न होने पर दुर्लभ लेकिन महत्वपूर्ण आनुवंशिक बदलावों की पहचान मुश्किल हो सकती है।
जीनोमइंडिया से उम्मीद
- भारत ने इस डेटा अंतर को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है। जीनोमइंडिया परियोजना का उद्देश्य देश की आनुवंशिक विविधता का व्यापक मानचित्र तैयार करना है। परियोजना में 83 अलग-अलग आबादी समूहों से नमूने शामिल किए गए हैं और 10,000 से अधिक लोगों के पूरे जीनोम का अनुक्रमण पूरा किया जा चुका है।
- 2026 में सामने आए विश्लेषण के अनुसार, जीनोमइंडिया के 9,768 व्यक्तियों के पूरे जीनोम के अध्ययन में लगभग 13 करोड़ आनुवंशिक बदलाव पाए गए, जिनमें करीब 4.4 करोड़ बदलाव वैश्विक डेटाबेस में पहले दर्ज नहीं थे। यह दिखाता है कि भारतीय आबादी की आनुवंशिक विविधता का एक बड़ा हिस्सा अब तक वैश्विक शोध में दर्ज ही नहीं हुआ था।
- इन आंकड़ों का महत्व केवल वैज्ञानिक खोज तक सीमित नहीं है। भारतीय आबादी के अनुरूप आनुवंशिक जोखिम मॉडल, सस्ती जांच तकनीक और अधिक सटीक उपचार विकसित करने में भी इनका उपयोग किया जा सकता है।
डेटा की कमी के पीछे असमान संसाधन
- दक्षिण एशियाई आबादी के कम प्रतिनिधित्व का एक कारण अनुसंधान के लिए उपलब्ध संसाधनों में वैश्विक असमानता भी है। बड़े जैव-भंडार, डिजिटल स्वास्थ्य रिकॉर्ड, अत्याधुनिक प्रयोगशालाएं और विशाल जनसंख्या-आधारित अध्ययन मुख्य रूप से अधिक संसाधन वाले देशों में विकसित हुए हैं।
- दक्षिण एशियाई देशों में स्वास्थ्य संबंधी कई तात्कालिक चुनौतियां हैं—जैसे संक्रामक रोग, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य और गैर-संचारी रोग। इसलिए जीनोमिक अनुसंधान को लंबे समय तक अपेक्षाकृत कम प्राथमिकता मिली। हालांकि अब भारत, श्रीलंका और पाकिस्तान जैसे देशों में बड़े आनुवंशिक डेटाबेस और जैव-भंडार विकसित किए जा रहे हैं।
- समस्या यह है कि ये पहलें अक्सर अलग-अलग संस्थानों या बीमारियों तक सीमित हैं और डेटा एकत्र करने तथा सुरक्षित रखने के तरीके भी अलग हैं। ऐसे में अलग-अलग डेटाबेस को एक साथ जोड़कर बड़े और उपयोगी अध्ययन करना कठिन हो जाता है।
क्षेत्रीय सहयोग जरूरी
- इस स्थिति से निपटने के लिए दक्षिण एशियाई देशों के बीच सहयोग बढ़ाना जरूरी है। भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे देशों में मौजूद जैव-भंडार और जनसंख्या-आधारित अध्ययनों को साझा मानकों और सुरक्षित डिजिटल ढांचे से जोड़ा जा सकता है।
- हालांकि डेटा साझा करते समय केवल वैज्ञानिक लाभ पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं होगा। स्थानीय वैज्ञानिकों और संस्थानों की भागीदारी, डेटा की सुरक्षा, गोपनीयता, बौद्धिक संपदा और शोध के लाभों में उचित हिस्सेदारी भी सुनिश्चित करनी होगी। इससे यह भी सुनिश्चित होगा कि जिन समुदायों से डेटा लिया गया है, वे भविष्य में होने वाले वैज्ञानिक और चिकित्सकीय लाभों से वंचित न रहें।
डेटा की विविधता ही सटीक स्वास्थ्य सेवा की आधारशिला
- आने वाले समय में एआई और जीनोमिक्स चिकित्सा व्यवस्था को तेजी से बदलने वाले हैं। लेकिन यदि इन तकनीकों की बुनियाद असंतुलित डेटा पर होगी, तो वे मौजूदा स्वास्थ्य असमानताओं को कम करने के बजाय उन्हें और बढ़ा सकती हैं।
- इसलिए दक्षिण एशियाई आबादी को वैश्विक आनुवंशिक शोध में केवल संख्या बढ़ाने के लिए शामिल करना पर्याप्त नहीं है। भारत और पूरे दक्षिण एशिया की वास्तविक आनुवंशिक विविधता को शोध का हिस्सा बनाना होगा। स्थानीय डेटा, स्थानीय वैज्ञानिक क्षमता और क्षेत्रीय सहयोग के आधार पर ही ऐसी स्वास्थ्य तकनीक विकसित की जा सकती है, जो दक्षिण एशियाई लोगों के लिए अधिक सटीक और समान हो।
- जीनोमइंडिया जैसी परियोजनाएं इस दिशा में महत्वपूर्ण शुरुआत हैं। अब आवश्यकता इस बात की है कि इन प्रयासों को व्यापक बनाया जाए, कम प्रतिनिधित्व वाले समुदायों को जोड़ा जाए और आनुवंशिक आंकड़ों का जिम्मेदार तथा समान उपयोग सुनिश्चित किया जाए। तभी कृत्रिम बुद्धिमत्ता और व्यक्तिगत चिकित्सा का लाभ वास्तव में सभी आबादियों तक पहुंच सकेगा।