संदर्भ
- पृथ्वी पर मंडरा रहे जलवायु संकट के बीच अब कूटनीति के मोर्चे पर एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। हाल ही में नेपाल द्वारा उठाया गया कदम इस बात का प्रमाण है कि विकासशील देश अब केवल 'मानवीय सहायता' या 'दान' पर निर्भर रहने के बजाय वैश्विक उत्सर्जक देशों से 'कानूनी दायित्व' और 'मुआवजे' की मांग करने लगे हैं।
आपदा का विकराल रूप और नेपाल का आक्रामक रुख
- 26 अगस्त को नेपाल में एक विनाशकारी हिमनद (ग्लेशियर) के ढहने और अचानक आई भयंकर बाढ़ के कारण 1,200 से अधिक लोगों की जान चली गई। इस बड़ी त्रासदी के बाद, नेपाल के विदेश मंत्री ने 1 सितंबर को ऐतिहासिक घोषणा करते हुए स्पष्ट किया कि उनका देश "एक ऐसे वैश्विक संकट की भारी कीमत चुका रहा है जिसे उसने पैदा नहीं किया।"
- यह प्रतिक्रिया पारंपरिक राहत अपीलों से बिल्कुल अलग थी। नेपाल ने विदेशी कूटनीति को दान मांगने के दायरे से निकालकर कानूनी जवाबदेही तय करने की दिशा में मोड़ दिया है। इस साहसिक कदम ने एक राष्ट्रीय आपदा को वैश्विक जलवायु न्याय की एक बड़ी परीक्षा में बदल दिया है।
थर्ड पोल विरोधाभास और हिमालयी संकट
- इस पूरी स्थिति का सबसे बड़ा विमर्श 'थर्ड पोल' (हिंदू कुश हिमालय) से जुड़ा है। नेपाल वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में मात्र 0.1% का योगदान देता है और अपनी लगभग पूरी बिजली का उत्पादन नवीकरणीय जलविद्युत से करता है। इसके बावजूद, भौगोलिक स्थिति के कारण वह ग्लोबल वार्मिंग के सबसे बड़े दुष्प्रभावों को झेल रहा है।
- वैज्ञानिक आंकड़ों के अनुसार, हिंदू कुश हिमालयी क्षेत्र वैश्विक औसत से लगभग दोगुनी तेजी से गर्म हो रहा है, जिससे यहां के ग्लेशियर अपने ऐतिहासिक मानदंडों से दस गुना तेजी से पिघल रहे हैं। उत्तरी यूरेशियाई आर्कटिक की वार्मिंग और समताप मंडलीय ध्रुवीय भंवर (स्ट्रैटोस्फेरिक पोलर वोर्टेक्स) जैसे वैश्विक टेलीकनेक्शन के कारण यह असंतुलन दक्षिण एशियाई मानसून को भी बुरी तरह प्रभावित कर रहा है।
जलविद्युत अर्थव्यवस्था पर गहरा आघात
नेपाल की आर्थिकी और विकास रणनीति पूरी तरह से जलविद्युत पर आधारित थी। देश ने अपनी 43,000 मेगावाट की व्यावसायिक क्षमता के बल पर एक क्षेत्रीय ऊर्जा निर्यातक बनने का मुकाम हासिल किया था। हालांकि, अगस्त की इस आपदा ने उस प्रगति को बड़ा झटका दिया:
- देश की स्थापित जलविद्युत क्षमता का लगभग 10% हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया।
- देवीघाट जैसे पुराने सतही संयंत्र नष्ट हो गए और निर्माणधीन परियोजनाएं मलबे में दब गईं।
- नेपाल को अपनी घरेलू ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए बिजली का निर्यात रोकना पड़ा और आयात का सहारा लेना पड़ा।
- इस आपदा से कुल 4 अरब से 7 अरब डॉलर का आर्थिक नुकसान हुआ है, जो नेपाल के कुल सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग दसवां हिस्सा है। भविष्य में होने वाले पुनर्निर्माण कार्यों के लिए जलवायु-अनुकूल और भूमिगत इंजीनियरिंग की आवश्यकता होगी, जिससे लागत में 10% से 12% की वृद्धि तय है।
जलवायु वित्त तंत्र की विफलता
- नेपाल के इस कदम ने मौजूदा वैश्विक जलवायु वित्त वास्तुकला की पोल खोल दी है। COP27 और COP28 में स्थापित लॉस एंड डैमेज फंड' (FRLD) वर्तमान में धीमी नौकरशाही और संसाधनों की कमी से जूझ रहा है।
- पायलट चरण के नियमों के तहत मिलने वाले सीमित अनुदान (जो अधिकतम 5 करोड़ से 2 करोड़ डॉलर के बीच हैं) 7 अरब डॉलर की तबाही के सामने ऊंट के मुंह में जीरे समान हैं। इसके अलावा, विश्व बैंक द्वारा इस फंड की अस्थायी मेजबानी किए जाने के कारण विकासशील देशों में यह आशंका भी है कि यह तथाकथित "मुआवजा" अंततः उन्हें भारी-भरकम कर्ज के जाल में न फंसा दे।
वैश्विक दक्षिण (Global South) के लिए एक मिसाल
- भले ही काठमांडू को इस तात्कालिक कूटनीतिक संघर्ष में अरबों डॉलर का चेक तुरंत न मिले, लेकिन इस कदम ने वैश्विक राजनीति की दिशा बदल दी है। नेपाल ने जलवायु क्षति के वास्तविक पैमाने और उपलब्ध वित्तीय सहायता के बीच की खाई को दुनिया के सामने उजागर कर दिया है। 'दान' के बजाय 'दायित्व' के इस ढांचे ने ग्लोबल साउथ के अन्य देशों के लिए एक मजबूत और विघटनकारी मिसाल कायम की है।
भारत के लिए इसके कूटनीतिक निहितार्थ
- यह पूरी घटना भारतीय जलवायु कूटनीति के लिए भी एक अनोखी स्थिति पैदा करती है। भारत लंबे समय से ऐतिहासिक उत्सर्जन और प्रति-व्यक्ति मेट्रिक्स के आधार पर 'समान लेकिन विभेदित उत्तरदायित्व' (Common But Differentiated Responsibilities) की वकालत करता रहा है। जब दक्षिण एशिया के भीतर ही कोई पड़ोसी देश इस सिद्धांत को लागू करता है, तो भारत के सामने एक नया कूटनीतिक संतुलन बनाने की चुनौती खड़ी होती है।
- साथ ही, हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों का तेजी से पीछे हटना और पारिस्थितिक अस्थिरता केवल नेपाल की नहीं, बल्कि उत्तरी भारत के करोड़ों लोगों के जीवन और नदी तंत्र से जुड़ी हुई एक साझा चुनौती है। इसलिए, यह संकट केवल कूटनीति या मुआवजे का नहीं, बल्कि संपूर्ण उपमहाद्वीप के दीर्घकालिक अस्तित्व और पर्यावरण संरक्षण का है।