संदर्भ
भारत में समुद्र केवल प्राकृतिक संपदा का स्रोत नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आजीविका और देश की खाद्य एवं आर्थिक सुरक्षा का आधार भी है। लगभग तीन करोड़ लोगों, विशेषकर हाशिए पर रहने वाले और तटीय समुदायों की आजीविका मत्स्य क्षेत्र पर निर्भर है। पिछले कुछ वर्षों में यह क्षेत्र पारंपरिक मछली पकड़ने की गतिविधि से आगे बढ़कर आधुनिक जलीय कृषि, निर्यात, तकनीक और नीली अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार बन रहा है। इसी परिवर्तन को गति देने के लिए वर्ष 2020 में प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) शुरू की गई थी। 10 सितंबर 2026 को योजना के छह वर्ष पूरे होना भारत के मत्स्य क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण पड़ाव है।
नीली क्रांति से नीली अर्थव्यवस्था की ओर
- प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना की परिकल्पना पूर्ववर्ती नीली क्रांति योजना के आधार पर मत्स्य क्षेत्र की मूल्य श्रृंखला में मौजूद निर्णायक अंतरालों को दूर करने के लिए की गई। इसका उद्देश्य केवल मछली उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि उत्पादन से लेकर प्रसंस्करण, कोल्ड-चेन, परिवहन, विपणन और निर्यात तक पूरी मूल्य श्रृंखला को आधुनिक बनाना है।
- सरकार 2020-21 से ₹20,750 करोड़ के कुल परिव्यय के साथ पीएमएमएसवाई लागू कर रही है। मत्स्य क्षेत्र के प्रति प्रतिबद्धता को देखते हुए बजट अनुमान 2026-27 में ₹2,500 करोड़ का रिकॉर्ड आवंटन किया गया है। वहीं, 11 अगस्त 2026 तक 2020-21 से 2025-26 के दौरान ₹21,394.88 करोड़ की मत्स्य पालन एवं जलीय कृषि परियोजनाओं को मंजूरी दी गई, जिसमें ₹9,510.89 करोड़ केंद्रीय हिस्सा है।
- योजना एक छत्रक व्यवस्था के रूप में कार्य करती है, जिसमें केंद्रीय क्षेत्र (CS) और केंद्र प्रायोजित योजना (CSS) दोनों घटक शामिल हैं। इसके माध्यम से अवसंरचना, आनुवंशिक सुधार, नवाचार, रोग निगरानी, मत्स्य बंदरगाहों का आधुनिकीकरण, मछुआरों की सुरक्षा, सहकारी समितियों, एसएचजी और मछुआरा किसान उत्पादक संगठनों को सहायता दी जा रही है।
उत्पादन और निर्यात में उल्लेखनीय बढ़ोतरी
- पीएमएमएसवाई की सबसे बड़ी उपलब्धि उत्पादन के मोर्चे पर दिखाई देती है। भारत का मछली उत्पादन 2019-20 के 141.64 लाख टन से बढ़कर 2024-25 में रिकॉर्ड 197.75 लाख टन हो गया। यह वृद्धि तकनीकी हस्तक्षेप, बेहतर जलीय कृषि पद्धतियों और अवसंरचना में बढ़ते निवेश का परिणाम है।
- इस क्षेत्र ने रोजगार सृजन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। पीएमएमएसवाई के माध्यम से मत्स्य पालन और जलीय कृषि से संबंधित गतिविधियों में 58 लाख व्यक्तियों के लिए प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर सृजित हुए हैं।
- निर्यात के मोर्चे पर भी भारत ने महत्वपूर्ण प्रगति की है। मत्स्य निर्यात का मूल्य 2019-20 के ₹46,663 करोड़ से बढ़कर 2025-26 में ₹73,890 करोड़ हो गया। इससे स्पष्ट है कि मत्स्य क्षेत्र अब ग्रामीण आजीविका के साथ-साथ विदेशी मुद्रा अर्जन और कृषि-निर्यात का भी महत्वपूर्ण आधार बन रहा है।
पारंपरिक मत्स्य पालन से तकनीक-संचालित जलीय कृषि तक
- पीएमएमएसवाई ने आधुनिक तकनीकों को अपनाने पर विशेष जोर दिया है। अंतर्देशीय जलीय कृषि के लिए 52,058 जलाशय पिंजरों और 23,285.06 हेक्टेयर तालाब क्षेत्र को मंजूरी दी गई है। इसके अलावा 12,081 पुनर्चक्रणीय जलीय कृषि प्रणालियों (RAS) और 4,205 बायो-फ्लोक इकाइयों को सहायता दी गई है।
- आरएएस में जल को फिल्टर कर पुनः उपयोग किया जाता है, जिससे कम भूमि और पानी में गहन मत्स्य पालन संभव होता है। वहीं बायो-फ्लोक तकनीक लाभकारी सूक्ष्मजीवों के माध्यम से जल में पोषक तत्वों का पुनर्चक्रण करती है। ये दोनों तकनीकें जल दक्षता, उत्पादकता और पर्यावरणीय स्थिरता की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।
- समुद्री संसाधनों के विविधीकरण की दिशा में भी पहल हुई है। 12 एकीकृत एक्वापार्कों को ₹713.80 करोड़ की लागत से मंजूरी दी गई है, जबकि समुद्री शैवाल की खेती एवं संबंधित गतिविधियों के लिए पिछले पाँच वर्षों में ₹198.17 करोड़ की परियोजनाएँ स्वीकृत की गई हैं। साथ ही 2,672 सजावटी मत्स्य पालन एवं एकीकृत सजावटी मत्स्य इकाइयों को भी सहायता मिली है।
‘नेट से बाजार’ तक मजबूत होती मूल्य श्रृंखला
- मत्स्य उत्पादन बढ़ाना तभी सार्थक है जब उत्पाद को सुरक्षित रूप से बाजार तक पहुँचाया जा सके। फसलोत्तर नुकसान, अपर्याप्त कोल्ड-चेन और कमजोर बाजार संपर्क लंबे समय से इस क्षेत्र की प्रमुख चुनौतियाँ रहे हैं।
- पीएमएमएसवाई के तहत पिछले पाँच वर्षों में 28 मछली पकड़ने के बंदरगाहों, 25 मछली उतारने के केंद्रों और 23 ड्रेजिंग परियोजनाओं के लिए ₹3,741.89 करोड़ मंजूर किए गए हैं। इसके अतिरिक्त कोल्ड-चेन और विपणन अवसंरचना के लिए ₹2,797 करोड़ की मंजूरी दी गई है।
- 11 अगस्त 2026 तक स्वीकृत परियोजनाओं में 28,489 मछली परिवहन इकाइयाँ, 1,394 जीवित मछली बिक्री इकाइयाँ, 6,018 मछली कियोस्क, 117 खुदरा मछली बाजार, 775 कोल्ड स्टोरेज एवं आइस प्लांट और 24 थोक मछली बाजार शामिल हैं। इससे उत्पादन को बेहतर कीमत और बाजार से जोड़ने में मदद मिल सकती है।
छोटे मछुआरों से डिजिटल मत्स्य अर्थव्यवस्था तक
- मत्स्य क्षेत्र के छोटे एवं बिखरे उत्पादकों की सौदेबाजी क्षमता बढ़ाने के लिए मछुआरा किसान उत्पादक संगठनों (FFPOs) को प्रोत्साहित किया जा रहा है। 2021-22 से 2025-26 के बीच 2,195 एफएफपीओ की स्थापना के लिए ₹544.86 करोड़ की परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है। सामूहिक खरीद, उत्पादन और विपणन के माध्यम से ये संगठन छोटे मछुआरों की आय और बाजार पहुँच बढ़ा सकते हैं।
- इसी दिशा में प्रधानमंत्री मत्स्य किसान समृद्धि सह-योजना (PM-MKSSY) महत्वपूर्ण है। 2023-24 से 2026-27 तक चार वर्षों के लिए लागू इस उप-योजना का वित्तीय परिव्यय ₹6,000 करोड़ है। इसका जोर मत्स्य क्षेत्र के औपचारिकीकरण, बीमा, संस्थागत वित्त, गुणवत्ता आश्वासन और ट्रेसेबिलिटी पर है।
- सितंबर 2024 में शुरू किया गया राष्ट्रीय मत्स्य डिजिटल प्लेटफॉर्म (NFDP) इसी डिजिटल बदलाव का प्रमुख उदाहरण है। 8 सितंबर 2026 तक इस पर 37.01 लाख से अधिक व्यक्तिगत और 37.23 लाख से अधिक कुल पंजीकरण हो चुके हैं। यह मंच ऋण, बीमा, ट्रेसेबिलिटी और सरकारी प्रोत्साहनों तक पहुँच को आसान बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण है।
जलवायु परिवर्तन के दौर में सतत् मत्स्य पालन
- जलवायु परिवर्तन तटीय समुदायों के सामने नई चुनौतियाँ खड़ी कर रहा है। चक्रवात, समुद्री तापमान में बदलाव और तटीय पारिस्थितिक तंत्र का क्षरण मछुआरों की आजीविका को प्रभावित कर सकता है। पीएमएमएसवाई के अंतर्गत 100 तटीय मछुआरा गांवों को जलवायु-सुदृढ़ तटीय मछुआरा गांवों के रूप में चिन्हित किया गया है। प्रत्येक गांव के लिए ₹200 लाख की इकाई लागत निर्धारित है और इसका पूर्ण वित्तपोषण सरकार द्वारा किया जा रहा है।
- हालाँकि, भविष्य की राह आसान नहीं है। अति-मछली पकड़ना, जलवायु परिवर्तन, रोग, तकनीकी निवेश की ऊँची लागत, गुणवत्तापूर्ण ऋण तक सीमित पहुँच और वैश्विक बाजार मानकों जैसी चुनौतियाँ बनी हुई हैं। इसलिए उत्पादन वृद्धि के साथ संसाधन संरक्षण, वैज्ञानिक मत्स्य प्रबंधन, जलवायु-स्मार्ट जलीय कृषि और मूल्य संवर्धन पर समान जोर देना होगा।
निष्कर्ष
- छह वर्षों में पीएमएमएसवाई ने भारतीय मत्स्य क्षेत्र को पारंपरिक आजीविका से आगे बढ़ाकर आधुनिक, तकनीक-संचालित और बाजारोन्मुख क्षेत्र बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण आधार तैयार किया है। उत्पादन में वृद्धि, निर्यात का विस्तार, 58 लाख रोजगार अवसर, आधुनिक जलीय कृषि प्रणालियाँ, मजबूत कोल्ड-चेन, एफएफपीओ और एनएफडीपी जैसे कदम इस परिवर्तन के महत्वपूर्ण संकेतक हैं।
- अब चुनौती इन उपलब्धियों को समावेशी और सतत् विकास में बदलने की है। यदि छोटे मछुआरों की आय, महिलाओं की भागीदारी, तटीय पारिस्थितिकी के संरक्षण और जलवायु-सुदृढ़ता को विकास की मुख्यधारा में शामिल किया जाता है, तो पीएमएमएसवाई भारत की नीली अर्थव्यवस्था, खाद्य सुरक्षा और तटीय समृद्धि का शक्तिशाली आधार बन सकती है। यही दृष्टिकोण एसडीजी-14 (जल के नीचे जीवन) के अनुरूप भारत के जलीय संसाधनों के जिम्मेदार एवं सतत् उपयोग को भी सुनिश्चित करेगा।