संदर्भ
भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद यानी आईसीएमआर के राष्ट्रीय कैंसर रोकथाम एवं अनुसंधान संस्थान के नेतृत्व में किए गए एक अध्ययन ने भारत में निकोटीन पाउच की बढ़ती उपलब्धता को लेकर गंभीर चिंता सामने रखी है। अध्ययन के अनुसार, ये उत्पाद ऑनलाइन मंचों, हुक्का दुकानों और गिग डिलीवरी सेवाओं के माध्यम से भारतीय शहरों तक पहुंच रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्ल्यूएचओ ने भी मई 2026 में निकोटीन पाउच से जुड़े स्वास्थ्य जोखिमों को लेकर चेतावनी जारी की थी। इसके बावजूद भारत में इनके नियमन की कानूनी स्थिति अभी स्पष्ट नहीं है।
निकोटीन पाउच क्या हैं?
- निकोटीन पाउच छोटी, तंबाकू-मुक्त थैलियां होती हैं, जिनमें निकोटीन, स्वादयुक्त पदार्थ और पौधों से प्राप्त रेशे होते हैं। इन्हें होंठ और मसूड़े के बीच रखा जाता है, जहां से निकोटीन सीधे रक्तप्रवाह में पहुंचता है। इनमें धुआं, भाप या थूक उत्पन्न नहीं होता। पारंपरिक धूम्ररहित तंबाकू से अलग इनमें तंबाकू की पत्ती, धूल या तना नहीं होता। इनमें इस्तेमाल निकोटीन तंबाकू से प्राप्त या प्रयोगशाला में कृत्रिम रूप से निर्मित हो सकता है।
क्या कोटपा के तहत आते हैं?
- सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पादों के विज्ञापन, विपणन और बिक्री को सिगरेट एवं अन्य तंबाकू उत्पाद अधिनियम, 2003 यानी कोटपा के तहत नियंत्रित किया जाता है। हालांकि, इस कानून में तंबाकू उत्पादों की परिभाषा विशिष्ट है और इसमें निकोटीन युक्त प्रत्येक उत्पाद को शामिल नहीं किया गया है।
- चूंकि निकोटीन पाउच में तंबाकू नहीं होता और कानून में इनका स्पष्ट उल्लेख भी नहीं है, इसलिए इन्हें कोटपा के दायरे में रखने को लेकर कानूनी प्रश्न उठता है। कानून में स्पष्ट प्रावधान के अभाव में इनके खिलाफ कार्रवाई की वैधानिकता चुनौती के घेरे में आ सकती है।
औषधि कानून की स्थिति भी अस्पष्ट
- निकोटीन को औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 में स्पष्ट रूप से औषधि के रूप में सूचीबद्ध नहीं किया गया है। हालांकि, निकोटीन पैच और गम को निकोटीन की लत के उपचार के लिए चिकित्सीय उपयोग में मंजूरी मिली है। औषधि एवं प्रसाधन सामग्री नियमों की अनुसूची में कुछ कम मात्रा वाले निकोटीन गम और लॉजेंज को लाइसेंस संबंधी आवश्यकताओं से छूट दी गई है।
- इससे एक कानूनी तर्क यह बनता है कि अन्य निकोटीन उत्पाद औषधि कानून के तहत नियंत्रित हो सकते हैं। दूसरी ओर, निकोटीन पाउच किसी बीमारी के उपचार या लत छुड़ाने का चिकित्सीय दावा नहीं करते। इसलिए इन्हें औषधि मानने के बजाय तंबाकू के विकल्प के रूप में देखा जा सकता है।
वेप से अलग क्यों हैं?
- इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट और वेप पर इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट निषेध अधिनियम, 2019 के तहत स्पष्ट प्रतिबंध है। निकोटीन पाउच के लिए ऐसा कोई विशिष्ट केंद्रीय कानून मौजूद नहीं है। यदि सरकार इन्हें भी वेप की तरह प्रतिबंधित करना चाहती है, तो इनके नाम या “निकोटीन युक्त अन्य उत्पाद” के रूप में स्पष्ट प्रावधान किया जा सकता था।
- यही कारण है कि निकोटीन पाउच के आयात, निर्माण और बिक्री की वैधता को लेकर वर्तमान में कानूनी अस्पष्टता बनी हुई है।
क्या इन्हें खाद्य उत्पाद माना जा सकता है?
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भारतीय कानून में खाद्य पदार्थ की परिभाषा काफी व्यापक है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी कई मामलों में मानव द्वारा चबाई या उपभोग की जाने वाली वस्तुओं को व्यापक खाद्य परिभाषा के अंतर्गत माना है। इसी आधार पर यह तर्क दिया जा सकता है कि निकोटीन पाउच को औषधि के बजाय खाद्य उत्पाद माना जाए। हालांकि, इस व्याख्या को लेकर भी स्पष्ट नियामकीय स्थिति आवश्यक है।
आयात पर क्या स्थिति है?
- विदेशी व्यापार विकास एवं विनियमन अधिनियम, 1992 और सीमा शुल्क अधिनियम, 1962 सरकार को वस्तुओं के आयात को प्रतिबंधित या निषिद्ध करने की शक्ति देते हैं। विदेश व्यापार महानिदेशालय यानी डीजीएफटी वस्तुओं के आयात की स्थिति निर्धारित करता है।
- हार्मोनाइज्ड सिस्टम में बदलाव के बाद तंबाकू-मुक्त मौखिक निकोटीन उत्पादों के लिए अलग वर्गीकरण किया गया है। भारत में तंबाकू-मुक्त मौखिक निकोटीन पाउच को प्रतिबंधित श्रेणी में रखा गया है। इसका अर्थ है कि इन्हें सामान्य वस्तुओं की तरह केवल शुल्क चुकाकर आयात नहीं किया जा सकता, बल्कि संबंधित अनुमति या आयात लाइसेंस की आवश्यकता हो सकती है।
ड्यूटी-फ्री दुकानों की चुनौती
- कुछ भारतीय हवाई अड्डों की ड्यूटी-फ्री दुकानों में निकोटीन पाउच उपलब्ध होने की बात सामने आई है। हालांकि, ड्यूटी-फ्री दुकानें भारतीय कानून से पूरी तरह बाहर नहीं होतीं। उन्हें मुख्य रूप से सीमा शुल्क, कर और शुल्क संबंधी कुछ छूट प्राप्त होती है।
- ड्यूटी-फ्री दुकानों में वही वस्तुएं बेची जा सकती हैं जिन्हें यात्री नियमों के अनुसार देश के भीतर ला या बाहर ले जा सकते हैं। सिगरेट और शराब जैसी वस्तुओं का स्पष्ट उल्लेख है, लेकिन निकोटीन पाउच का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। इसलिए इनके आयात और बिक्री के लिए वैध अनुमति का प्रश्न महत्वपूर्ण बन जाता है।
सरकार के सामने क्या चुनौती है?
- निकोटीन पाउच का मामला केवल कानूनी मुद्दा नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ा प्रश्न भी है। यदि इनके उपयोग और मांग में तेजी आती है, तो भविष्य में प्रतिबंध लगाने पर तस्करी बढ़ सकती है, जैसा कि इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट के मामले में देखा गया है।
- इसलिए सरकार को स्वास्थ्य जोखिमों का वैज्ञानिक आकलन करते हुए इनके निर्माण, आयात, बिक्री और विज्ञापन के संबंध में स्पष्ट कानूनी ढांचा तैयार करना चाहिए। यदि आवश्यक हो तो विदेशी व्यापार और सीमा शुल्क कानूनों के तहत स्पष्ट अधिसूचना जारी की जा सकती है।
निष्कर्ष
निकोटीन पाउच तंबाकू-मुक्त होने के बावजूद निकोटीन की आपूर्ति करते हैं और तेजी से उभरता हुआ उपभोक्ता उत्पाद बन रहे हैं। भारत में इनके संबंध में सबसे बड़ी समस्या नियमन की अस्पष्टता है। कोटपा, औषधि कानून, खाद्य कानून और आयात नियमों की अलग-अलग व्याख्याओं के कारण स्थिति जटिल बनी हुई है। निकोटीन पाउच का मुद्दा सार्वजनिक स्वास्थ्य, तकनीकी नवाचार और नियामकीय क्षमता के बीच संतुलन की चुनौती है। सरकार को इनके स्वास्थ्य प्रभाव और बाजार विस्तार को ध्यान में रखते हुए समयबद्ध, स्पष्ट और वैज्ञानिक आधार वाला नियामकीय ढांचा विकसित करना चाहिए, ताकि भविष्य में अनियंत्रित बाजार और तस्करी दोनों की समस्या से बचा जा सके।