भारतीय श्रम कानून के इतिहास में 20 अगस्त 2026 का दिन महत्वपूर्ण पड़ाव माना गया। सर्वोच्च न्यायालय की नौ-सदस्यीय संविधान पीठ ने करीब 48 वर्ष पुराने ‘बैंगलोर वाटर सप्लाई एंड सीवरेज बोर्ड बनाम आर. राजप्पा’ फैसले में तय ‘उद्योग’ की व्यापक अवधारणा पर पुनर्विचार करते हुए पुराने और नए श्रम कानूनों के बीच स्पष्ट अंतर कर दिया। अदालत ने कहा कि औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के तहत लंबित मामलों में 1978 का सिद्धांत लागू रहेगा, लेकिन औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 के तहत नए मामलों में यह फैसला स्वतः आधार नहीं बनेगा।
1978 के Bangalore Water Supply फैसले ने ‘उद्योग’ की परिभाषा को इतना व्यापक बनाया था कि अस्पताल, शैक्षणिक संस्थान, क्लब और कई गैर-पारंपरिक सेवा गतिविधियां भी श्रम कानून के दायरे में आ गई थीं। अब नई संहिता के तहत ‘उद्योग’ की सीमा उसके अपने प्रावधानों, भाषा और संदर्भ के आधार पर तय होगी।
1978 में बदली थी ‘उद्योग’ की तस्वीर
21 फरवरी 1978 को सात-सदस्यीय संविधान पीठ ने Bangalore Water Supply and Sewerage Board v. R. Rajappa मामले में औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 2(j) में ‘उद्योग’ की व्यापक व्याख्या की। न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्ण अय्यर द्वारा दिए गए ऐतिहासिक फैसले में ‘ट्रिपल टेस्ट’ विकसित किया गया।
इसके तहत किसी गतिविधि को उद्योग मानने के लिए देखा जाता था कि वह व्यवस्थित और संगठित हो, उसमें नियोक्ता-कर्मचारी सहयोग हो तथा वस्तुओं या सेवाओं का उत्पादन या वितरण मानवीय जरूरतों को पूरा करता हो। लाभ कमाना अनिवार्य शर्त नहीं थी।
इस व्यापक व्याख्या के चलते अस्पताल, विश्वविद्यालय, क्लब और कुछ सरकारी कल्याणकारी गतिविधियां भी श्रम कानून के दायरे में आ गईं। यही वजह है कि यह फैसला करीब पांच दशकों तक भारतीय श्रम न्यायशास्त्र में श्रमिक अधिकारों का महत्वपूर्ण आधार बना रहा।
मामला नौ-सदस्यीय पीठ तक कैसे पहुंचा?
समय के साथ 1978 के फैसले की व्यापक व्याख्या पर सवाल उठने लगे। यह मामला 2002 की एक अपील से जुड़ा था। 2005 में पांच-सदस्यीय पीठ ने इसे बड़ी पीठ को भेजा और 2017 में सात-सदस्यीय पीठ ने नौ-सदस्यीय संविधान पीठ के समक्ष भेजने का फैसला किया, क्योंकि मूल Bangalore Water Supply फैसला भी सात-सदस्यीय पीठ ने दिया था।
अदालत के सामने यह सवाल भी था कि सरकारी सामाजिक-कल्याण गतिविधियों को किस सीमा तक ‘उद्योग’ माना जाए और राज्य के कौन-कौन से कार्य ‘संप्रभु कार्य’ की श्रेणी में आते हैं।
इसी बीच औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 21 नवंबर 2025 से लागू हो गई और उसने औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 का स्थान ले लिया। नई संहिता में ‘उद्योग’ की परिभाषा धारा 2(p) में दी गई है। इससे 1978 के फैसले की नई श्रम व्यवस्था में प्रासंगिकता का सवाल और महत्वपूर्ण हो गया।
सुप्रीम कोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष
नौ-सदस्यीय पीठ ने सर्वसम्मति से स्पष्ट किया कि 1947 के कानून के तहत लंबित मामलों का फैसला 1978 के Bangalore Water Supply सिद्धांत के आधार पर किया जाएगा। यानी पुराने कानून के तहत चल रहे विवादों में व्यापक ‘उद्योग’ परीक्षण कायम रहेगा। अंतिम रूप से निपट चुके मामलों को भी बाद की नई व्याख्या के कारण नहीं खोला जाएगा।
लेकिन नई औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 के लिए स्थिति अलग है। अदालत ने स्पष्ट किया कि IRC की धारा 2(p) की व्याख्या उसके अपने पाठ और संदर्भ के आधार पर की जाएगी। 1978 का फैसला नई संहिता की व्याख्या के लिए बाध्यकारी आधार नहीं होगा। इस तरह भविष्य के मामलों के लिए एक नया न्यायिक क्षेत्र खुल गया है।
ट्रिपल टेस्ट पर न्यायाधीशों में मतभेद
नौ-सदस्यीय पीठ 1978 के ट्रिपल टेस्ट को लेकर पूरी तरह एकमत नहीं थी। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के साथ न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा, आलोक अराधे और विपुल एम. पंचोली ने माना कि मूल ढांचा आज भी प्रासंगिक है, लेकिन आधुनिक परिस्थितियों के अनुरूप इसमें कुछ बदलाव जरूरी हैं। इन चारों न्यायाधीशों ने ट्रिपल टेस्ट का पुनर्गठन किया। हालांकि, यह नया परीक्षण पुराने लंबित मामलों पर लागू नहीं होगा और वहां 1978 का मूल सिद्धांत ही प्रभावी रहेगा।
दूसरी ओर, न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना, दीपांकर दत्ता और उज्जल भुइयां ने 1978 के फैसले की दोबारा समीक्षा की जरूरत पर असहमति जताई। न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा ने भी नए कानून के लागू होने के बाद पुराने कानून की व्याख्या को फिर से विकसित करने को अनावश्यक माना। वहीं न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने मामले की सुनवाई को उचित माना, लेकिन ट्रिपल टेस्ट के पुनर्गठन से असहमति जताई।
श्रमिकों और नियोक्ताओं के लिए क्या मायने?
इस फैसले का सीधा असर भविष्य के श्रम विवादों पर पड़ेगा। 1978 की व्यापक व्याख्या में लाभ कमाना ‘उद्योग’ होने की अनिवार्य शर्त नहीं था, जिससे गैर-पारंपरिक संस्थानों के कर्मचारियों को भी औद्योगिक विवाद कानून का संरक्षण मिला।
अब IRC के तहत अदालतें धारा 2(p) में दी गई ‘उद्योग’ की परिभाषा और उसके अपवादों के आधार पर फैसला करेंगी। ऐसे में अस्पताल, शैक्षणिक संस्थान, गैर-लाभकारी संगठन, सरकारी निकाय और सेवा क्षेत्र की विभिन्न संस्थाओं की कानूनी स्थिति नए सिरे से न्यायिक जांच के दायरे में आ सकती है।
नियोक्ताओं के लिए भी यह फैसला महत्वपूर्ण है, क्योंकि किसी संस्था को ‘उद्योग’ माना जाना कर्मचारियों के अधिकारों, औद्योगिक विवादों और नियोक्ता की कानूनी जिम्मेदारियों से सीधे जुड़ा है। पुराने मामलों में 1978 का परीक्षण लागू रहेगा, जबकि नए विवादों में IRC के प्रावधान निर्णायक होंगे।
श्रम कानून में दो अलग दौर
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सबसे बड़ा संदेश यही है कि भारतीय श्रम कानून अब दो अलग कानूनी चरणों में देखा जाएगा।
पहला चरण औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 का है, जिसके लंबित मामलों में Bangalore Water Supply की व्यापक व्याख्या कायम रहेगी।
दूसरा चरण औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 का है, जिसमें ‘उद्योग’ की अवधारणा को नए वैधानिक ढांचे के भीतर विकसित किया जाएगा।
इसलिए यह कहना गलत होगा कि सुप्रीम कोर्ट ने 1978 के ऐतिहासिक फैसले को पूरी तरह पलट दिया है। अदालत ने वास्तव में उसके प्रभाव की सीमा निर्धारित की है। पुराने कानून के लंबित मामलों में वह फैसला अब भी महत्वपूर्ण है, लेकिन नई संहिता के मामलों में उसका स्वतः इस्तेमाल नहीं होगा।
आगे की चुनौती
आने वाले वर्षों में सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि नई औद्योगिक संबंध संहिता के तहत ‘उद्योग’ की सीमा कहां तक तय की जाती है। सेवा क्षेत्र, डिजिटल सेवाएं, गैर-लाभकारी संस्थाएं और सरकारी कल्याणकारी गतिविधियां पारंपरिक उद्योग की अवधारणा को चुनौती दे रही हैं।
ऐसे में 1978 का Bangalore Water Supply फैसला भारतीय श्रम न्यायशास्त्र की महत्वपूर्ण विरासत बना रहेगा, लेकिन नई संहिता के तहत अदालतों को बदलती आर्थिक परिस्थितियों और श्रमिक हितों के बीच संतुलन बनाना होगा।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला पुराने और नए श्रम कानूनों के बीच स्पष्ट विभाजन रेखा खींचता है। पुराने विवादों में 1978 का सिद्धांत लागू रहेगा, जबकि भविष्य के मामलों में ‘उद्योग’ की सीमा नई संहिता के आधार पर तय होगी।