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पॉलीसिलिकॉन विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए पीएलआई योजना

संदर्भ 

भारत ने पिछले एक दशक में नवीकरणीय ऊर्जा, विशेषकर सौर ऊर्जा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। सौर मॉड्यूल और सेल विनिर्माण क्षमता में तेजी से विस्तार हुआ है, लेकिन पूरी सौर मूल्य श्रृंखला में भारत अभी आत्मनिर्भर नहीं है। इसकी सबसे महत्वपूर्ण कड़ी पॉलीसिलिकॉन के उत्पादन में देश लगभग पूरी तरह आयात पर निर्भर है। इसी चुनौती को दूर करने के लिए नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) पॉलीसिलिकॉन विनिर्माण हेतु एक अलग उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना तैयार कर रहा है। यह पहल भारत की सौर आपूर्ति श्रृंखला को अधिक सुरक्षित, आत्मनिर्भर और प्रतिस्पर्धी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकती है।  

सौर विनिर्माण मूल्य श्रृंखला  

  • सौर फोटोवोल्टिक उद्योग में कच्चे माल से तैयार पैनल तक कई चरण होते हैं। उच्च शुद्धता वाले सिलिकॉन से पॉलीसिलिकॉन, फिर उसे पिघलाकर इंगट, इंगट को काटकर वेफर, वेफर को संसाधित करके सौर सेल और अंततः सेल को जोड़कर सौर मॉड्यूल तैयार किए जाते हैं। 
  • पॉलीसिलिकॉन, इंगट और वेफर को अपस्ट्रीम, जबकि सेल और मॉड्यूल को डाउनस्ट्रीम क्षेत्र कहा जाता है। किसी भी विनिर्माण श्रृंखला की दीर्घकालिक मजबूती के लिए शुरुआती चरणों में घरेलू क्षमता आवश्यक होती है।  

भारत की वर्तमान स्थिति 

  • भारत में सौर मॉड्यूल विनिर्माण क्षमता 213 गीगावाट से अधिक तथा सौर सेल क्षमता लगभग 32 गीगावाट है। इंगट और वेफर विनिर्माण क्षमता अभी सीमित है, लेकिन जून 2028 तक इसके लगभग 80 गीगावाट तक पहुँचने की संभावना है। 
  • इसके विपरीत, पॉलीसिलिकॉन के घरेलू वाणिज्यिक उत्पादन की क्षमता लगभग नगण्य है। भारत को इसके लिए आयात पर निर्भर रहना पड़ता है और वैश्विक आपूर्ति में चीन की प्रमुख भूमिका है। इससे भारत की सौर आपूर्ति श्रृंखला भू-राजनीतिक तनाव, व्यापारिक प्रतिबंधों और वैश्विक आपूर्ति व्यवधानों के प्रति संवेदनशील बनी रहती है।  

पॉलीसिलिकॉन का रणनीतिक महत्व 

  • पॉलीसिलिकॉन क्रिस्टलीय सिलिकॉन आधारित सौर सेल के निर्माण का प्रमुख प्रारंभिक पदार्थ है। इसकी विश्वसनीय आपूर्ति सौर उद्योग के विस्तार के लिए आवश्यक है। भारत की आयात निर्भरता इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि वैश्विक उत्पादन में चीन का बड़ा योगदान है। आपूर्ति में व्यवधान होने पर इसका प्रभाव मॉड्यूल और सेल सहित पूरी डाउनस्ट्रीम श्रृंखला पर पड़ सकता है। 
  • इसके अतिरिक्त, उच्च शुद्धता वाला पॉलीसिलिकॉन सेमीकंडक्टर उद्योग में भी उपयोग होता है। इसलिए घरेलू उत्पादन से भारत के सौर उद्योग के साथ-साथ चिप निर्माण पारिस्थितिकी तंत्र को भी मजबूती मिल सकती है।

अलग पीएलआई योजना की आवश्यकता

  • मौजूदा सौर पीवी पीएलआई योजना में पॉलीसिलिकॉन से लेकर इंगट, वेफर, सेल और मॉड्यूल तक पूरी मूल्य श्रृंखला को प्रोत्साहित करने का प्रावधान है। इसके बावजूद मॉड्यूल और सेल निर्माण में तो तेजी आई, कुछ इंगट क्षमता भी विकसित हुई, लेकिन व्यावसायिक स्तर पर पॉलीसिलिकॉन उत्पादन स्थापित नहीं हो सका। 
  • इसका कारण पॉलीसिलिकॉन उद्योग की विशिष्ट प्रकृति है। यह सामान्य इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण के बजाय रासायनिक, पूंजी-गहन और ऊर्जा-गहन उद्योग है। इसमें बड़े निवेश, उन्नत शोधन तकनीक और प्रतिस्पर्धी ऊर्जा लागत की आवश्यकता होती है। इसलिए इसके लिए अलग और लक्षित नीति समर्थन आवश्यक माना जा रहा है। 
  • प्रस्तावित पीएलआई योजना का उद्देश्य देश में पॉलीसिलिकॉन विनिर्माण को बढ़ावा देना और 10 गीगावाट से अधिक क्षमता के निर्माण को समर्थन देना है। हालाँकि योजना का अंतिम आकार और प्रोत्साहन संरचना अभी स्पष्ट नहीं है।  

सौर विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र का विस्तार 

  • भारत सौर सेल विनिर्माण क्षमता को लगभग 32 गीगावाट से बढ़ाकर 100 गीगावाट करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इसी प्रकार, इंगट और वेफर क्षमता को जून 2028 तक कम-से-कम 80 गीगावाट तक पहुँचाने की योजना है। इंगट और वेफर के लिए Approved List of Models and Manufacturers (ALMM) व्यवस्था भी लागू की गई है। 
  • सौर सेल में घरेलू स्रोतों के उपयोग को बढ़ावा दिए जाने के साथ अपस्ट्रीम क्षमता का विस्तार और अधिक आवश्यक हो गया है। यदि भारत को सौर क्षेत्र में वास्तविक आत्मनिर्भरता प्राप्त करनी है, तो केवल मॉड्यूल निर्माण बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा; पूरी मूल्य शृंखला को मजबूत करना होगा। 

चौबीसों घंटे उपलब्ध रहने वाली नवीकरणीय ऊर्जा (RE-RTC) और सस्ती हरित ऊर्जा 

  • भारत की स्वच्छ ऊर्जा रणनीति विनिर्माण के साथ-साथ सस्ती और विश्वसनीय बिजली उपलब्ध कराने पर भी केंद्रित है। Round-the-Clock Renewable Energy (RE-RTC) के माध्यम से सौर, पवन और ऊर्जा भंडारण को एकीकृत कर निरंतर नवीकरणीय बिजली उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है।  
  • सोलर एनर्जी कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड की नवीनतम आरई-आरटीसी निविदा में लगभग ₹5.25 प्रति यूनिट का टैरिफ सामने आया है। परियोजना में प्रत्येक समय-खंड में लगभग 90 प्रतिशत सुनिश्चित बिजली उपलब्धता और दिन में लगभग 50 प्रतिशत सौर ऊर्जा का प्रावधान है। शेष आपूर्ति अन्य नवीकरणीय स्रोतों और ऊर्जा भंडारण से पूरी की जानी है।  
  • सौर, पवन, भंडारण और आरई-आरटीसी के बेहतर एकीकरण से औसत बिजली खरीद लागत लगभग ₹5.20 से घटकर ₹4.85 प्रति यूनिट तक आने की संभावना है। इससे उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मकता, डेटा सेंटर क्षेत्र और हरित ऊर्जा संक्रमण को बढ़ावा मिल सकता है।

व्यापक स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण 

  • भारत ने 300 गीगावाट से अधिक गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित विद्युत क्षमता हासिल कर ली है और 2030 तक इसे 500 गीगावाट तक पहुँचाने का लक्ष्य रखा है। हरित अमोनिया को उर्वरक संयंत्रों और हरित हाइड्रोजन को तेल रिफाइनरियों तक पहुँचाकर इनके लिए शुरुआती बाजार तैयार किए जा रहे हैं। 
  • जहाजरानी में हरित मेथनॉल, परिवहन तथा स्टील उद्योग में स्वच्छ ऊर्जा आधारित पायलट परियोजनाएँ भी चल रही हैं। भूटान के साथ सौर ऊर्जा सहयोग और दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय बिजली बाजार की दिशा में प्रयास भारत की ऊर्जा सुरक्षा और क्षेत्रीय ऊर्जा कूटनीति को मजबूत कर सकते हैं।

पॉलीसिलिकॉन पहल का महत्व 

  • पॉलीसिलिकॉन विनिर्माण को बढ़ावा देने से आयात निर्भरता कम, आपूर्ति श्रृंखला अधिक सुरक्षित और घरेलू मूल्य संवर्धन अधिक हो सकता है। इससे सेमीकंडक्टर पारिस्थितिकी तंत्र को भी समर्थन मिलेगा तथा भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी।
  • यह पहल चीन पर निर्भरता घटाने के साथ भारत को एक एकीकृत और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी सौर विनिर्माण केंद्र के रूप में विकसित करने में सहायक हो सकती है। 

प्रमुख चुनौतियाँ 

  • इस क्षेत्र में सबसे बड़ी चुनौतियाँ अधिक पूंजी निवेश, लंबी निवेश-वसूली अवधि, ऊर्जा की उच्च खपत और उन्नत तकनीक की आवश्यकता हैं। उच्च शुद्धता वाले पॉलीसिलिकॉन के उत्पादन की तकनीक कुछ वैश्विक कंपनियों के पास केंद्रित है। 
  • इसके अतिरिक्त, चीन के बड़े पैमाने के उत्पादन और कम लागत के कारण भारतीय उत्पादों को प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए दीर्घकालिक नीति समर्थन आवश्यक होगा। उत्पादन के दौरान रासायनिक उप-उत्पादों और उत्सर्जन के प्रबंधन के लिए कठोर पर्यावरणीय मानकों का पालन भी अनिवार्य होगा। 

निष्कर्ष 

  • पॉलीसिलिकॉन के लिए अलग पीएलआई योजना भारत की सौर विनिर्माण रणनीति को डाउनस्ट्रीम विस्तार से पूर्ण मूल्य श्रृंखला की आत्मनिर्भरता की ओर ले जा सकती है। भारत ने मॉड्यूल और सेल निर्माण में उल्लेखनीय प्रगति की है, लेकिन वास्तविक आत्मनिर्भरता के लिए पॉलीसिलिकॉन, इंगट और वेफर जैसे अपस्ट्रीम चरणों में घरेलू क्षमता विकसित करना आवश्यक है।  
  • नीति समर्थन, उन्नत तकनीक, प्रतिस्पर्धी ऊर्जा लागत, कुशल मानव संसाधन और पर्यावरणीय स्थिरता के संतुलित विकास से भारत चीन पर अपनी निर्भरता कम कर सकता है। इससे न केवल ऊर्जा सुरक्षा और औद्योगिक आत्मनिर्भरता मजबूत होगी, बल्कि भारत के लिए एक सुरक्षित, एकीकृत और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी हरित विनिर्माण अर्थव्यवस्था की आधारशिला भी तैयार होगी। 
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