संदर्भ
भारत की अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्व केवल खाद्य सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि करोड़ों किसानों की आजीविका भी इससे जुड़ी है। कृषि क्षेत्र में किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक उनकी उपज का उचित और लाभकारी मूल्य सुनिश्चित करना है। बाजार में कीमतों का उतार-चढ़ाव, बंपर उत्पादन, मांग-आपूर्ति में असंतुलन और फसल कटाई के समय कीमतों में गिरावट किसानों को कई बार अपनी उपज मजबूरी में कम दाम पर बेचने के लिए विवश करती है। इसी चुनौती से निपटने और न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के लाभ को प्रभावी बनाने के उद्देश्य से सरकार ने सितंबर 2018 में प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान (पीएम-आशा) की शुरुआत की।
पीएम-आशा अभियान से संबंधित प्रमुख बिंदु
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पीएम-आशा को एक ऐसे एकीकृत ढांचे के रूप में विकसित किया गया है, जो किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाने के साथ-साथ उपभोक्ताओं को आवश्यक खाद्य वस्तुओं की कीमतों में अत्यधिक उतार-चढ़ाव से राहत देने का प्रयास करता है। इसका मूल उद्देश्य किसानों को मूल्य जोखिम से सुरक्षा देना, मजबूरी में कम कीमत पर बिक्री रोकना और कृषि बाजार में मूल्य स्थिरता कायम करना है।
चार प्रमुख घटकों पर आधारित व्यवस्था
पीएम-आशा के तहत चार प्रमुख मूल्य समर्थन तंत्रों को एकीकृत किया गया है –
मूल्य समर्थन योजना (पीएसएस):
- मूल्य समर्थन योजना (पीएसएस) के तहत जब कटाई के समय बाजार कीमत एमएसपी से नीचे चली जाती है, तो मुख्य रूप से दालों, तिलहनों और खोपरा की एमएसपी पर खरीद की जाती है। राज्य सरकारों के अनुरोध पर नेफेड और एनसीसीएफ जैसी केंद्रीय नोडल एजेंसियां इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। खरीद वर्ष 2024-25 से सामान्यतः किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के कुल उत्पादन के 25 प्रतिशत तक खरीद की अनुमति है।
- वहीं घरेलू दलहन उत्पादन को बढ़ावा देने और आयात पर निर्भरता घटाने के लिए तुअर, उड़द और मसूर की खरीद राज्य के उत्पादन के 100 प्रतिशत तक की जा सकती है। इससे किसानों को बाजार कीमत गिरने की स्थिति में मूल्य सुरक्षा मिलती है।
मूल्य स्थिरीकरण कोष (पीएसएफ):
- मूल्य स्थिरीकरण कोष (पीएसएफ) का उद्देश्य किसानों के साथ-साथ उपभोक्ताओं को भी मूल्य अस्थिरता से राहत देना है। दालों, प्याज और आलू जैसी आवश्यक वस्तुओं का बफर स्टॉक तैयार किया जाता है। कटाई के मौसम में खरीद और कम आवक वाले मौसम में बाजार में आपूर्ति बढ़ाने से कीमतों में अचानक होने वाली वृद्धि को नियंत्रित करने का प्रयास किया जाता है। पीएसएफ को पीएम-आशा में शामिल किया गया है, जबकि इसका प्रबंधन उपभोक्ता मामलों के विभाग के पास है।
मूल्य अंतर भुगतान योजना (पीडीपीएस):
- मूल्य अंतर भुगतान योजना (पीडीपीएस) में सरकार किसानों की पूरी उपज की भौतिक खरीद नहीं करती। इसके बजाय अधिसूचित बाजारों में एमएसपी और वास्तविक बाजार मूल्य के बीच के अंतर का भुगतान सीधे किसानों के बैंक खातों में किया जाता है।
- यह भुगतान एमएसपी के अधिकतम 15 प्रतिशत तक हो सकता है। मुख्य रूप से तिलहन के लिए उपयोग की जाने वाली यह व्यवस्था बड़े पैमाने पर खरीद, परिवहन और भंडारण की जरूरत को कम करती है।
बाजार हस्तक्षेप योजना (एमआईएस):
- चौथा घटक बाजार हस्तक्षेप योजना (एमआईएस) है, जो टमाटर, प्याज और आलू जैसे जल्दी खराब होने वाले कृषि एवं बागवानी उत्पादों के लिए महत्वपूर्ण है।
- इन उत्पादों के लिए एमएसपी लागू नहीं होता। जब बाजार कीमतें पिछले सामान्य सत्र की तुलना में कम से कम 10 प्रतिशत गिर जाती हैं, तब किसानों को राहत देने के लिए बाजार हस्तक्षेप किया जा सकता है। बंपर उत्पादन और मांग से अधिक आपूर्ति की स्थिति में यह व्यवस्था विशेष रूप से उपयोगी है।
बढ़ती वित्तीय प्रतिबद्धता
- पीएम-आशा के महत्व को सरकार के बढ़ते बजट प्रावधान से भी समझा जा सकता है। वर्ष 2024-25 में योजना के तहत वास्तविक व्यय 5,437.99 करोड़ रुपये रहा। वर्ष 2025-26 में बजट आवंटन 6,941.36 करोड़ रुपये किया गया, जबकि 2026-27 में इसे बढ़ाकर 7,200 करोड़ रुपये कर दिया गया। यह बढ़ता आवंटन किसानों की आय सुरक्षा और मूल्य आश्वासन तंत्र को मजबूत करने की दिशा में सरकार की निरंतर वित्तीय प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
लागत से ऊपर एमएसपी का आश्वासन
- एमएसपी व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि प्रमुख फसलों के लिए घोषित एमएसपी उत्पादन लागत से ऊपर रखा जाता है। वर्ष 2026-27 के आंकड़ों के अनुसार सामान्य धान की उत्पादन लागत 1,627 रुपये प्रति क्विंटल, जबकि एमएसपी 2,441 रुपये प्रति क्विंटल है। यानी लागत की तुलना में 814 रुपये प्रति क्विंटल का अंतर है।
- इसी प्रकार पीले सोयाबीन की लागत 3,805 रुपये और एमएसपी 5,708 रुपये प्रति क्विंटल है, जिससे 1,903 रुपये का अंतर बनता है। गेहूं की उत्पादन लागत 1,239 रुपये और एमएसपी 2,585 रुपये प्रति क्विंटल है, जबकि जूट की लागत 3,662 रुपये और एमएसपी 5,925 रुपये प्रति क्विंटल है। जूट में लागत और एमएसपी के बीच 2,293 रुपये प्रति क्विंटल का अंतर है, जो दिए गए उदाहरणों में सबसे अधिक है।
- इस प्रकार एमएसपी किसानों को उत्पादन लागत से ऊपर लाभकारी मूल्य का आधार देता है और पीएम-आशा इस मूल्य आश्वासन को वास्तविक बाजार परिस्थितियों में लागू करने का तंत्र उपलब्ध कराती है।
खेत से बाजार तक मजबूत होती कनेक्टिविटी
- किसानों की आय बढ़ाने के लिए केवल एमएसपी पर्याप्त नहीं है। भंडारण, परिवहन, बाजार तक पहुंच और डिजिटल व्यापार व्यवस्था भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। इसी दिशा में कृषि अवसंरचना कोष (एआईएफ) और ई-नाम जैसी पहलें महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।
- एआईएफ के तहत 2,14,437 परियोजनाओं के लिए 96,426 करोड़ रुपये के ऋण स्वीकृत किए गए हैं। ई-नाम ने 23 राज्यों और 4 केंद्र शासित प्रदेशों की 1,656 मंडियों को एकीकृत किया है और इसके माध्यम से 4,94,847 करोड़ रुपये का व्यापार संभव हुआ है। ई-नाम पर 4,776 एफपीओ पंजीकृत हैं, जबकि 7,334 एफपीओ ओएनडीसी से जुड़े हैं। इसके अतिरिक्त 25,081 कृषि विपणन अवसंरचना परियोजनाओं तथा 50,249 गोदामों, जिनकी कुल भंडारण क्षमता 992.6 लाख मीट्रिक टन है, को मंजूरी दी गई है।
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बिहार और छत्तीसगढ़ में पीएम-आशा के क्रियान्वयन में प्रगति
- बिहार में एनसीसीएफ के माध्यम से पहली बार संगठित रूप से मसूर की खरीद शुरू की गई है। खरीद व्यवस्था को मजबूत करने के लिए 48 पीएसीएस और एफपीओ को जोड़ा गया है। 10 अगस्त 2026 तक एनसीसीएफ ने 1,042.65 मीट्रिक टन मसूर खरीदी, जिसमें 358 किसानों का पंजीकरण हुआ और 285 किसानों को सीधा लाभ मिला। वहीं नेफेड ने 1,814.13 मीट्रिक टन मसूर की खरीद की, जिसमें 495 किसान पंजीकृत हुए और 455 किसानों को लाभ मिला।
- छत्तीसगढ़ में पीएम-आशा की खरीद व्यवस्था को 200 पीएसीएस और 12 एफपीओ के नेटवर्क के जरिए मजबूत किया गया है। 10 अगस्त 2026 तक एनसीसीएफ ने 18,392.228 मीट्रिक टन चना, 22.231 मीट्रिक टन मसूर और 1,035.0205 मीट्रिक टन सरसों खरीदी। इसके तहत 21,721 किसान पंजीकृत हुए और 13,790 किसानों को लाभ मिला। नेफेड ने भी 17,020.65 मीट्रिक टन चना और 355.05 मीट्रिक टन मसूर की खरीद की, जिसमें 46,146 किसान पंजीकृत हुए और 13,673 किसानों को लाभ मिला।
- इन प्रयासों से दोनों राज्यों में एमएसपी पर खरीद, किसानों की बाजार तक पहुंच और दलहन उत्पादन में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिला है।
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पारदर्शिता और तकनीक से बेहतर खरीद
- पीएम-आशा में किए गए हालिया सुधारों ने खरीद व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और किसान-केंद्रित बनाने पर जोर दिया है। किसानों का बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण, पूर्व-पंजीकृत किसानों से सीधी खरीद, अतिरिक्त खरीद केंद्रों की स्थापना तथा टमाटर, प्याज और आलू के लिए परिवहन सहायता जैसे उपाय किसानों की बाजार तक पहुंच को बेहतर बनाने में सहायक हैं। डिजिटल प्रक्रियाओं से बिचौलियों की भूमिका कम करने और भुगतान को सीधे किसानों तक पहुंचाने की संभावना भी मजबूत हुई है।
निष्कर्ष
- पीएम-आशा किसानों की आय सुरक्षा, एमएसपी के प्रभावी क्रियान्वयन और कृषि बाजार में मूल्य स्थिरता के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में उभरी है। इसके चारों घटक अलग-अलग बाजार परिस्थितियों में किसानों और उपभोक्ताओं की जरूरतों को पूरा करने का प्रयास करते हैं। बढ़ता वित्तीय आवंटन, डिजिटल सुधार, खरीद केंद्रों का विस्तार और कृषि अवसंरचना में निवेश इस व्यवस्था को और मजबूत कर रहे हैं।
- हालांकि, इसकी वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि छोटे और सीमांत किसानों तक खरीद और भुगतान की सुविधा कितनी व्यापकता से पहुंचती है। समय पर खरीद, पारदर्शी पंजीकरण, पर्याप्त भंडारण और मजबूत बाजार कनेक्टिविटी को लगातार बेहतर करना होगा। इन प्रयासों के साथ पीएम-आशा न केवल किसानों को उनकी उपज का बेहतर मूल्य दिला सकती है, बल्कि भारत में अधिक स्थिर, पारदर्शी और किसान-केंद्रित कृषि अर्थव्यवस्था के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।