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भारत में बढ़ती बेरोज़गारी की समस्या

संदर्भ

हाल ही में, रेलवे में रोज़गार आवेदकों द्वारा किये गए आंदोलनों की रिपोर्ट भारतीय युवाओं के बीच व्यापक पैमाने पर रोज़गार असुरक्षा की समस्या को प्रकट करती है। इस परिदृश्य में भारत में बेरोज़गारी स्तर का मूल्यांकन प्रासंगिक हो जाता है। 

भारत में बेरोजगारी से संबंधित आँकड़े

  • राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय ने वर्ष 2017-18 में 6.1% बेरोज़गारी दर की सूचना दी थी, जो विगत चार दशकों में सबसे अधिक थी। वर्ष 2020 के अप्रैल-मई के बाद से आने वाले महीनों में तस्वीर और अधिक निराशाजनक साबित हुई है।
  • सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (CMIE) के एक अध्ययन के अनुसार, दिसंबर 2021 में 7.91 % बेरोज़गारी दर के साथ लगभग 53 मिलियन भारतीय बेरोज़गार थे, जिनमें से अधिकांश महिलाएँ थी। हालाँकि, जनवरी 2022 में बेरोज़गारी में कुछ गिरावट दर्ज की गई, किंतु वर्तमान में भी यह आँकड़ा लगभग 6.57% है।
  • मध्यम और निचले स्तर की सरकारी नौकरियों के लिये इच्छुक अधिक योग्यता वाले युवाओं के प्रवेश से कम योग्यता वाले छात्रों पर दबाव है। रोज़गार की सुरक्षा के कारण कम वेतन वाले सरकारी रोज़गार को अत्यधिक प्रतिष्ठित किया जाता है। यही कारण है कि अत्यधिक योग्यता वाले छात्र भी कम वेतन वाले सरकारी रोज़गार के लिये आवेदन करते हैं।

कम वेतन वाली सरकारी नौकरियों पर बल

  • निजी क्षेत्र की नौकरियों में ‘हायर एंड फायर’ नीति के कारण उच्च रोज़गार असुरक्षा, काम के अत्यधिक घंटे, कम वेतन के कारण सरकारी नौकरियों के प्रति आकर्षण में वृद्धि हुई है।
  • सरकारी नौकरियों के सीमित होने और कई मूल पदों के अनुबंधीकरण और आउटसोर्सिंग होने से रोज़गार के अवसरों में कमी के कारण नौकरियों की विभिन्न श्रेणियों में तीव्र प्रतिस्पर्धा बनी हुई है।
  • ऐतिहासिक रूप से भारत में केवल कुछ ही नियोक्ता-कर्मचारी कार्य संबंध राज्य के विनियमन के अधीन हैं। हालाँकि, विगत कुछ वर्षों में औपचारिक क्षेत्र में श्रम-पूंजी संबंधों के राज्य विनियमन में लगातार गिरावट आई है। इस विनियमन को सार्वजनिक क्षेत्र के तेज़ी से निजीकरण के साथ जोड़ा गया है। इस बढ़ती प्रवृत्ति ने रोज़गार बाज़ार में नए प्रवेशकों के लिये लाभकारी रोज़गार के अवसरों को कम करने के अलावा, कुशल और कम कुशल कार्यबल दोनों के लिये आवधिक बेरोज़गारी में वृद्धि की है।

अधिप्लावन प्रभाव (Spillover Effect)

  • इस समग्र प्रक्रिया के प्रभाव कई गुना हैं। एक स्तर पर, औपचारिक क्षेत्र में नियोक्ता-कर्मचारी कार्य संबंधों पर नियंत्रण की कमी ने उच्च कुशल श्रमिकों की आवधिक बेरोज़गारी की समस्या उत्पन्न की है, जो कम-कुशल, अनौपचारिक क्षेत्र की नौकरियों में प्रवेश कर रहे हैं। 
  • इसी तरह, भारत के रोज़गार क्षेत्र में मध्य-स्तर और उच्च-स्तरीय पेशेवर नौकरियों के भीतर आवधिक बेरोज़गारी के स्पिलओवर प्रभाव ने अधिक योग्य युवाओं को निचले पायदान की सरकारी नौकरियों में प्रवेश के लिये प्रेरित किया है। इस प्रवृत्ति ने ही कम शैक्षिक योग्यता वाले लोगों के लिये एक गहरा संकट उत्पन्न कर दिया है। 
  • स्वास्थ्य, शिक्षा और समग्र रूप से सामाजिक क्षेत्र पर राज्य द्वारा कम किये गए व्यय ने भी अपर्याप्त रोज़गार का सृजन किया है।
  • उच्च शिक्षा के क्षेत्र में छात्र आवेदकों की संख्या में लगातार वृद्धि हुई है। यह परिदृश्य स्वाभाविक रूप से नए सार्वजनिक-वित्त पोषित उच्च शिक्षण संस्थानों के निर्माण और मौजूदा संस्थानों के विस्तार के माध्यम से योग्य शिक्षकों की भर्ती की मांग करता है। हालाँकि सरकारें मौजूदा सार्वजनिक वित्त-पोषित उच्च शिक्षण संस्थानों में शिक्षकों की भर्ती को प्रतिबंधित व उनमें देरी भी करती हैं। उदाहरण के लिये, दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे बड़े सार्वजनिक वित्त-पोषित विश्वविद्यालय में वर्तमान में लगभग 4300 तदर्थ शिक्षक कार्यरत हैं जबकि उनकी स्थायी पदों पर नियुक्तियों को बार-बार रोका जा रहा है।

योग्यता द्वारा प्रतिषेध

  • बेहतर वेतन वाली सरकारी नौकरियों में भर्ती के लिये निर्धारित शैक्षिक योग्यता में मनमानी वृद्धि के साथ-साथ पेशेवर प्रशिक्षण संस्थानों में प्रवेश के लिये निर्धारित नए मानदंडों के द्वारा रोज़गार की बढ़ती असुरक्षा को समझा जा सकता है। यह प्रवृत्ति न केवल उच्च शिक्षा संस्थानों में शिक्षण पदों के लिये यू.जी.सी. नेट के अलावा पी.एच.डी. उपाधि की अनिवार्यता निर्धारित होने में दिखती है, बल्कि इसे स्कूल शिक्षण जैसी नौकरियों में भर्ती के लिये केंद्रीकृत पात्रता परीक्षा में भी स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। 
  • अधिकतर संस्थान सीटों और रिक्तियों की संख्या में वृद्धि करने में विफल रहते हैं। अत: उम्मीदवारों की बढ़ती संख्या को कम करने के लिये एक कठिन मानदंड का उपयोग किया जाता है।

निष्कर्ष

वर्तमान में भारत जनसंख्या लाभांश की स्थिति में है, किंतु एक बड़ा शिक्षित युवा वर्ग बेरोज़गार है। ऐसे में न केवल रोज़गारपरक शिक्षा की गुणवत्ता में वृद्धि करने की आवश्यकता है बल्कि रोज़गार के अवसर भी सृजित करने की आवश्यकता है ताकि भारत अपने जनसंख्या लाभांश का उचित उपयोग कर सके।

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