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सार्वजनिक परीक्षा सुधार 2.0 (पीईआर 2.0)

संदर्भ 

भारत में राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं में बार-बार सामने आ रही अनियमितताओं के बीच शिक्षा सुधार से जुड़े विशेषज्ञों ने Public Examination Reform 2.0 (PER 2.0) की आवश्यकता पर जोर दिया है। इसका उद्देश्य परीक्षा में गड़बड़ी सामने आने के बाद केवल तात्कालिक कार्रवाई करने के बजाय पूरी परीक्षा प्रणाली को इस तरह तैयार करना है कि अनियमितताओं की गुंजाइश पहले से ही न्यूनतम हो। 

पीईआर 2.0 के बारे में   

  • सार्वजनिक परीक्षा सुधार 2.0 उच्च-दांव वाली प्रवेश और भर्ती परीक्षाओं के लिए एक व्यापक, चरणबद्ध परीक्षा-सुरक्षा व्यवस्था की अवधारणा है।
  • जहां पहले के सुधारों में मुख्य रूप से अभ्यर्थियों के लिए पारदर्शिता और सूचना उपलब्ध कराने पर जोर था, वहीं पीईआर 2.0 परीक्षा प्रक्रिया के आंतरिक सुरक्षा तंत्र और संस्थागत जवाबदेही को केंद्र में रखता है।  
  • इसमें प्रश्नपत्र तैयार करने से लेकर अंतिम परिणाम और मेरिट सूची जारी होने तक प्रत्येक चरण के लिए मानकीकृत एवं स्वतंत्र रूप से ऑडिट किए जा सकने वाले एसओपी, डिजिटल निगरानी तथा प्रश्नपत्र की पूरी ‘चेन ऑफ कस्टडी’ सुनिश्चित करने की बात कही गई है।  

पीईआर 2.0 की आवश्यकता:

  • प्रश्नपत्र तैयार करने के चरण में जोखिम: हाल ही के पेपर लीक मामलों से संकेत मिला है कि परीक्षा में सेंध केवल प्रश्नपत्र के भौतिक परिवहन के दौरान ही नहीं होती। प्रश्न तैयार करने, मॉडरेशन और विशेषज्ञों के स्तर पर भी संवेदनशील सूचनाओं के लीक होने की आशंका रहती है। इसलिए सुरक्षा व्यवस्था को परीक्षा के शुरुआती चरण से ही मजबूत करना जरूरी है। 
  • केवल भौतिक सुरक्षा पर्याप्त नहीं: पुलिस सुरक्षा या प्रश्नपत्र के परिवहन को सुरक्षित बनाना तभी प्रभावी होगा, जब डिजिटल सिस्टम, डेटाबेस की अनुमति और संस्थागत प्रक्रियाओं में भी मजबूत निगरानी हो। कमजोर डिजिटल या प्रशासनिक कड़ी पूरी सुरक्षा व्यवस्था को प्रभावित कर सकती है। 
  • प्रश्नों और अनुवाद में त्रुटियां: प्रश्नपत्र में गलत विकल्प, तथ्यात्मक त्रुटि या भाषा एवं अनुवाद संबंधी खामियां परीक्षा की विश्वसनीयता को प्रभावित करती हैं। ऐसी स्थिति में अभ्यर्थियों के लिए त्वरित शिकायत और सुधार तंत्र आवश्यक है। 
  • समितियों की सिफारिशों का कमजोर क्रियान्वयन: समय-समय पर विभिन्न समितियों और विशेषज्ञ समूहों ने परीक्षा सुधार के सुझाव दिए हैं, लेकिन उनकी सिफारिशों को बाध्यकारी समयसीमा और जवाबदेह Action Taken Report से जोड़ने की कमी रही है। केवल समिति गठित करना पर्याप्त नहीं, बल्कि उसके सुझावों का क्रियान्वयन भी सुनिश्चित होना चाहिए। 
  • मेरिट की विश्वसनीयता की रक्षा: परीक्षा में अनियमितता, असामान्य रूप से बढ़े हुए अंक या परिणामों में संदिग्ध पैटर्न लाखों अभ्यर्थियों के भविष्य और मानसिक विश्वास को प्रभावित करते हैं। इसलिए परीक्षा की निष्पक्षता और मेरिट की विश्वसनीयता बनाए रखना आवश्यक है।

पीईआर 2.0 के प्रमुख स्तंभ: 

  • प्रश्नपत्र निर्माण और अनुवाद की सुरक्षा: प्रश्न तैयार करने वाले विशेषज्ञों की पृष्ठभूमि जांच, हितों के टकराव की घोषणा और समय-समय पर जिम्मेदारियों में बदलाव किया जाए। अनुवाद प्रक्रिया में सुरक्षित तकनीकी प्रणालियों का प्रयोग कर अनावश्यक मानवीय हस्तक्षेप कम किया जा सकता है।
  • एंड-टू-एंड डिजिटल निगरानी: भूमिका-आधारित डिजिटल पहुंच, बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण, डिजिटल वॉटरमार्क, प्रत्येक गतिविधि की लॉगिंग और प्रश्नपत्र के हर डिजिटल एवं भौतिक हस्तांतरण की निगरानी की जाए।
  • जोखिम आधारित परीक्षा केंद्र व्यवस्था: परीक्षा केंद्रों का पारदर्शी और तकनीक आधारित आवंटन हो। निजी परीक्षा केंद्रों का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन और सीसीटीवी जैसी निगरानी व्यवस्था स्थानीय स्तर पर मिलीभगत की संभावना को कम कर सकती है। 
  • स्वतंत्र फॉरेंसिक ऑडिट: परीक्षा के बाद परिणामों में असामान्य पैटर्न और संदिग्ध अंक समूहों की सांख्यिकीय जांच की जाए। साथ ही साइबर सुरक्षा का स्वतंत्र ऑडिट, सुरक्षित व्हिसलब्लोअर व्यवस्था और परीक्षा की सत्यनिष्ठा पर सार्वजनिक रिपोर्ट अनिवार्य की जा सकती है।  

परीक्षा सुधारों के सामने प्रमुख चुनौतियां 

  • भारत में लाखों अभ्यर्थियों और अनेक भाषाओं में एक साथ परीक्षा आयोजित करना बड़ी प्रशासनिक चुनौती है।
  • निजी परीक्षा केंद्रों, सॉफ्टवेयर कंपनियों और अस्थायी कर्मचारियों पर अत्यधिक निर्भरता सुरक्षा में कमजोर कड़ियां पैदा कर सकती है।
  • बड़े व्यावसायिक कोचिंग नेटवर्क और परीक्षा से जुड़े आर्थिक हित प्रश्नपत्र तक अवैध पहुंच का जोखिम बढ़ा सकते हैं।
  • डिजिटल प्रणाली के विस्तार से हैकिंग, नेटवर्क में छेड़छाड़ और एआई के माध्यम से तैयार की गई फर्जी सामग्री जैसी नई चुनौतियां सामने आ रही हैं।
  • केंद्र और राज्यों की परीक्षा एजेंसियों के बीच अलग-अलग क्षमताओं तथा कानूनी व्यवस्थाओं के कारण एक समान सुरक्षा मानक लागू करना कठिन है। 

आगे की राह 

  • राष्ट्रीय परीक्षा सत्यनिष्ठा पर श्वेत पत्र: देश की प्रमुख परीक्षा संस्थाओं में सामने आई कमियों, लंबित सुधारों और सफल प्रयोगों को एक राष्ट्रीय दस्तावेज में दर्ज किया जाना चाहिए। 
  • एकीकृत परीक्षा-सुरक्षा ढांचा: NTA, UPSC, राज्य लोक सेवा आयोगों और भर्ती बोर्डों के लिए समान एवं बाध्यकारी एसओपी तैयार किए जाने चाहिए। 
  • Secure-by-Design व्यवस्था: सुरक्षा उपायों को किसी परीक्षा में गड़बड़ी होने के बाद जोड़ने के बजाय परीक्षा प्रणाली की मूल डिजाइन में ही सुरक्षा और पारदर्शिता को शामिल किया जाना चाहिए।
  • पुरानी सिफारिशों का समयबद्ध क्रियान्वयन: निलेकणी और राधाकृष्णन समिति जैसे विशेषज्ञ समूहों की उपयोगी सिफारिशों को लागू करने के लिए स्पष्ट समयसीमा और जवाबदेही तय की जानी चाहिए। इसमें डेटा एन्क्रिप्शन, प्रश्न बैंक का सुरक्षित रैंडमाइजेशन और बायोमेट्रिक सत्यापन जैसे उपाय शामिल हो सकते हैं।
  • त्वरित न्याय और व्हिसलब्लोअर सुरक्षा: परीक्षा संबंधी धोखाधड़ी के मामलों में शीघ्र सुनवाई और प्रभावी दंड की व्यवस्था के साथ अनियमितताओं की सूचना देने वाले लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए। सार्वजनिक परीक्षाएं (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2024 के प्रावधानों का प्रभावी क्रियान्वयन भी महत्वपूर्ण है। 

निष्कर्ष 

  • भारत में सार्वजनिक परीक्षाओं की विश्वसनीयता केवल प्रश्नपत्र की सुरक्षा तक सीमित नहीं है। प्रश्न निर्माण, मॉडरेशन, अनुवाद, डिजिटल हस्तांतरण, परीक्षा केंद्र, मूल्यांकन और परिणाम विश्लेषण जैसे प्रत्येक चरण को सुरक्षित और जवाबदेह बनाना आवश्यक है। 
  • पीईआर 2.0 का मूल विचार यही है कि परीक्षा सुरक्षा को ‘गड़बड़ी के बाद प्रतिक्रिया’ के बजाय ‘पहले से सुरक्षित प्रणाली’ के रूप में विकसित किया जाए। ऐसी व्यवस्था न केवल अनियमितताओं को कम करेगी, बल्कि परीक्षा संस्थानों में भरोसा बहाल करने, योग्यता आधारित चयन की रक्षा करने और लाखों युवाओं की आकांक्षाओं को सुरक्षित रखने में भी मदद करेगी।
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