संदर्भ
भारत में राजनीतिक दल लोकतंत्र के प्रमुख संस्थान हैं, जो नागरिकों को प्रतिनिधित्व देने के साथ शासन और जनता के बीच सेतु का कार्य करते हैं। छोटे एवं नए दल स्थानीय व क्षेत्रीय आकांक्षाओं को स्वर देते हैं। हालांकि, राजनीतिक दलों के वित्तपोषण में पारदर्शिता का अभाव चिंता का विषय है। हालिया बीबीसी न्यूज़ हिंदी की जाँच के अनुसार, गुजरात के छह पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों को 2023-24 में लगभग ₹1,700 करोड़ का चंदा मिला, जो भारतीय जनता पार्टी को छोड़कर पाँच राष्ट्रीय दलों के कुल ₹1,480 करोड़ से अधिक है। इससे राजनीतिक चंदे, कर छूट, वित्तीय पारदर्शिता और निर्वाचन आयोग की नियामकीय शक्तियों पर गंभीर सवाल उठते हैं।
पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल क्या हैं?
- जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (Representation of the People Act—RP Act) की धारा 29A के तहत नागरिकों द्वारा गठित राजनीतिक दल निर्वाचन आयोग के समक्ष पंजीकरण के लिए आवेदन कर सकते हैं। आवश्यक दस्तावेजों की जाँच और निर्धारित शर्तों की पूर्ति के बाद निर्वाचन आयोग ऐसे दलों को पंजीकृत करता है। यदि कोई दल चुनाव आयोग द्वारा मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय या राज्य दल नहीं है, तो वह पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल यानी आरयूपीपी की श्रेणी में आता है।
- पंजीकरण के कारण राजनीतिक दलों को कई महत्वपूर्ण सुविधाएँ प्राप्त होती हैं। इनमें राजनीतिक चंदे पर आयकर संबंधी छूट, लोकसभा एवं विधानसभा चुनावों में सामान्य चुनाव चिह्न प्राप्त करने की सुविधा तथा चुनाव प्रचार के दौरान 20 स्टार प्रचारकों की अनुमति प्रमुख हैं। बदले में इन दलों पर वित्तीय एवं वैधानिक पारदर्शिता की जिम्मेदारी भी होती है।
- आरयूपीपी को एक वित्तीय वर्ष में ₹20,000 से अधिक का योगदान देने वाले व्यक्तिगत दाताओं का विवरण निर्वाचन आयोग को उपलब्ध कराना होता है। आवश्यक विवरण प्रस्तुत न करने पर संबंधित दल आयकर छूट खो सकता है। इसके अतिरिक्त, ₹2,000 से अधिक के दान को चेक या बैंक हस्तांतरण जैसे बैंकिंग माध्यमों से स्वीकार करने की व्यवस्था की गई है।
लेटर पैड पार्टियों की चुनौती
- मुख्य समस्या आरयूपीपी की संख्या और उनकी वास्तविक राजनीतिक सक्रियता के बीच अंतर से जुड़ी है। निर्वाचन आयोग के अनुसार जुलाई 2025 तक देश में 2,800 से अधिक आरयूपीपी थे, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में इनमें से केवल लगभग 750 दलों ने चुनाव लड़ा। शेष दलों को प्रायः ‘लेटर पैड पार्टियाँ’ कहा जाता है, क्योंकि उनकी राजनीतिक गतिविधियाँ अत्यंत सीमित होती हैं।
- यह स्थिति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वर्तमान आरपी एक्ट निर्वाचन आयोग को केवल चुनाव न लड़ने, आंतरिक संगठनात्मक चुनाव न कराने या आवश्यक रिटर्न दाखिल न करने के आधार पर किसी राजनीतिक दल का पंजीकरण रद्द करने की स्पष्ट शक्ति नहीं देता।
- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस बनाम Institute of Social Welfare & Ors. (2002) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने भी स्पष्ट किया था कि आरपी एक्ट के तहत निर्वाचन आयोग सामान्य परिस्थितियों में राजनीतिक दल का पंजीकरण रद्द नहीं कर सकता। केवल असाधारण परिस्थितियों में, जैसे धोखाधड़ी से पंजीकरण प्राप्त करना, संविधान के प्रति निष्ठा समाप्त करना या सरकार द्वारा दल को गैरकानूनी घोषित किया जाना, पंजीकरण रद्द किया जा सकता है। इस सीमित शक्ति के कारण बड़ी संख्या में निष्क्रिय दल लंबे समय तक पंजीकृत बने रह सकते हैं।
वित्तीय पारदर्शिता का संकट
- आरयूपीपी की वित्तीय पारदर्शिता भी गंभीर चिंता का विषय है। Association for Democratic Reforms की जुलाई 2025 की रिपोर्ट के अनुसार 2022-23 के संदर्भ में केवल लगभग 26% आरयूपीपी की वार्षिक रिपोर्टें सार्वजनिक रूप से उपलब्ध थीं। इसका अर्थ है कि बड़ी संख्या में राजनीतिक दलों की वित्तीय गतिविधियों और चंदे से संबंधित जानकारी सार्वजनिक निगरानी से बाहर रहती है।
- यदि किसी राजनीतिक दल को कर छूट, चुनाव चिह्न और अन्य सुविधाएँ मिलती हैं, लेकिन उसकी वित्तीय गतिविधियों की पर्याप्त सार्वजनिक निगरानी नहीं होती, तो ऐसी व्यवस्था के दुरुपयोग की संभावना बढ़ जाती है। कुछ निष्क्रिय दलों को कर चोरी, धन शोधन और अवैध वित्तीय लेन-देन के लिए माध्यम के रूप में इस्तेमाल किए जाने की आशंका इसी कारण पैदा होती है।
- यह समस्या केवल चुनावी सुधार तक सीमित नहीं है, बल्कि सुशासन, वित्तीय जवाबदेही और लोकतांत्रिक पारदर्शिता से भी जुड़ी हुई है।
सुधार की आवश्यकता
- इस समस्या से निपटने के लिए निर्वाचन आयोग को पर्याप्त वैधानिक शक्तियाँ देना आवश्यक है। विधि आयोग की 255वीं रिपोर्ट ने सुझाव दिया था कि यदि कोई राजनीतिक दल लगातार 10 वर्षों तक चुनाव नहीं लड़ता, तो उसका पंजीकरण रद्द किया जा सके। निर्वाचन आयोग ने भी 2016 के अपने चुनाव सुधार संबंधी ज्ञापन में आरपी एक्ट में संशोधन कर उसे पंजीकरण रद्द करने की शक्ति देने की सिफारिश की थी।
- हालाँकि, केवल चुनाव लड़ने की शर्त पर्याप्त नहीं होगी। कोई दल केवल कानूनी औपचारिकता पूरी करने के लिए एक-दो उम्मीदवार उतारकर भी अपनी स्थिति बनाए रख सकता है। इसलिए राजनीतिक दलों की वित्तीय गतिविधियों की आयकर विभाग और अन्य प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा डिजिटल निगरानी आवश्यक है। संदिग्ध लेन-देन, असामान्य चंदे और दानदाताओं के पैटर्न की नियमित जाँच की जानी चाहिए।
- निर्वाचन आयोग ने यह भी सुझाव दिया है कि चुनाव में सीट जीतने वाले दलों को ही कर छूट दी जाए। लेकिन यह व्यवस्था लोकतांत्रिक दृष्टि से अत्यधिक कठोर हो सकती है, क्योंकि कई छोटे दल नियमित रूप से चुनाव लड़ते हैं, परंतु उन्हें सीट नहीं मिलती। इससे राजनीतिक बहुलवाद प्रभावित हो सकता है।
- इसके बजाय उचित न्यूनतम मत-प्रतिशत की सीमा निर्धारित करना अधिक संतुलित उपाय हो सकता है। जिस प्रकार आरयूपीपी (RUPPs) को सामान्य चुनाव चिह्न प्रदान करने के लिए मत-प्रतिशत से संबंधित प्रावधान हैं, उसी प्रकार एक उपयुक्त वोट-शेयर सीमा पूरी करने वाले दलों को ही राजनीतिक चंदे पर कर छूट का लाभ दिया जा सकता है।
निष्कर्ष
- पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल भारतीय लोकतंत्र में राजनीतिक भागीदारी और बहुलवाद के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन लोकतांत्रिक स्वतंत्रता का अर्थ वित्तीय जवाबदेही से मुक्त होना नहीं है। वर्तमान व्यवस्था में राजनीतिक दलों की बड़ी संख्या, सीमित नियामकीय शक्तियाँ और कमजोर वित्तीय प्रकटीकरण एक गंभीर संस्थागत चुनौती प्रस्तुत करते हैं।
- आवश्यकता ऐसी संतुलित व्यवस्था की है जो एक ओर छोटे एवं नए राजनीतिक दलों के लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा करे और दूसरी ओर राजनीतिक चंदे के दुरुपयोग पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करे। इसके लिए निर्वाचन आयोग को उपयुक्त de-registration powers, राजनीतिक दलों द्वारा अनिवार्य एवं समयबद्ध वित्तीय प्रकटीकरण, डिजिटल लेन-देन की निगरानी तथा कर छूट के लिए उचित मत-प्रतिशत सीमा जैसे सुधार लागू किए जाने चाहिए।
- अंततः राजनीतिक वित्तपोषण में पारदर्शिता लोकतंत्र की विश्वसनीयता का अनिवार्य आधार है। राजनीतिक दलों को मिलने वाली सुविधाएँ जनता के विश्वास और वैधानिक जवाबदेही के साथ जुड़ी होनी चाहिए, ताकि चुनावी लोकतंत्र का उपयोग किसी भी प्रकार की अवैध वित्तीय गतिविधि के लिए न किया जा सके।