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रोटावायरस टीका शोध कार्य : प्रभाव एवं चुनौतियाँ

(प्रारंभिक परीक्षा: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 3: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में भारतीयों की उपलब्धियाँ; देशज रूप से प्रौद्योगिकी का विकास और नई प्रौद्योगिकी का विकास)

संदर्भ

भारत में रोटावायरस (Rotavirus) बच्चों में गैस्ट्रोएन्टराइटिस (Gastroenteritis) अर्थात दस्त व उल्टी जैसी गंभीर बीमारियों का एक प्रमुख कारण है। हर साल पांच वर्ष से कम आयु के हजारों बच्चों की मौत इसी संक्रमण से होती है। हाल ही में नेचर पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन में यह दिखाया गया है कि भारत में विकसित रोटावैक (Rotavac) वैक्सीन ने बच्चों में इस बीमारी के मामलों को उल्लेखनीय रूप से कम किया है।

क्या है रोटावैक

  • रोटावैक (Rotavac) भारत में विकसित एक ओरल वैक्सीन (Oral Vaccine) या मुख के माध्यम से दिया जाने वाला टीका है जिसे बच्चों को 6, 10 व 14 सप्ताह की आयु में दिया जाता है।
  • यह टीका रोटावायरस संक्रमण से बचाव करता है जो बच्चों में गंभीर दस्त (Severe Diarrhea) का कारण बनता है।
  • यह टीका भारत बायोटेक (Bharat Biotech) ने विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग और अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों, जैसे- NIH (USA) व PATH के सहयोग से विकसित किया था। 
  • इसे बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन से भी सहायता मिली थी।

क्या है सार्वजनिक टीकाकरण कार्यक्रम (UIP) 

  • भारत सरकार का सार्वजनिक टीकाकरण कार्यक्रम (Universal Immunisation Programme: UIP) देश का सबसे बड़ा सार्वजनिक स्वास्थ्य अभियान है जिसके तहत बच्चों व गर्भवती महिलाओं को नि:शुल्क टीके उपलब्ध कराए जाते हैं।
  • रोटावैक को वर्ष 2016 में UIP में शामिल किया गया, ताकि सभी बच्चों को बिना किसी लागत के यह सुरक्षा प्रदान की जा सके।

हालिया अध्ययन के बारे में

  • परिचय : नेचर मेडिसिन जर्नल में प्रकाशित यह अध्ययन वर्ष 2016 से 2020 के बीच 9 राज्यों के 31 अस्पतालों में किया गया।
  • उद्देश्य : रोटावैक के आने से पहले और बाद में बच्चों में रोटावायरस संक्रमण की दर की तुलना करना है।

मुख्य बिंदु

  • अध्ययन के अनुसार, रोटावैक की प्रभावशीलता लगभग 54% रही। यह उसी स्तर की है जो क्लिनिकल ट्रायल में दर्ज की गई थी।
  • वैक्सीन का प्रभाव पहले दो वर्षों में सर्वाधिक देखा गया, जब बच्चों में संक्रमण का जोखिम सर्वाधिक होता है।
  • अध्ययन में यह भी पाया गया कि बच्चों के अस्पताल में भर्ती होने के मामलों में अत्यधिक कमी आई है।
  • यह पहली बार था जब भारत ने अपने स्वदेशी वैक्सीन पर इतने बड़े पैमाने पर वास्तविक दुनिया में प्रभाव का अध्ययन किया।

भविष्य पर प्रभाव

  • यह अध्ययन दिखाता है कि भारत का वैक्सीन विकास कार्यक्रम वैज्ञानिक रूप से सक्षम और वैश्विक स्तर पर भरोसेमंद बन रहा है।
  • रोटावैक की सफलता से भारत भविष्य में अन्य स्वदेशी टीकों के विकास में आगे बढ़ सकता है।
  • इससे भारत टीका निर्यातक देश के रूप में अधिक मजबूत होगा।
  • रोटावायरस से जुड़ी शिशु मृत्यु दर में निरंतर कमी आने की संभावना है।

चुनौतियाँ

  • देश के ग्रामीण और दूरस्थ इलाकों में वैक्सीन पहुंच अभी भी एक चुनौती है।
  • जागरूकता की कमी के कारण कुछ क्षेत्रों में टीकाकरण दर कम है।
  • वैक्सीन को ठंडा रखने की व्यवस्था कई जगहों पर पर्याप्त नहीं है।
  • वैज्ञानिक आंकड़ों का दीर्घकालिक विश्लेषण जारी रखना आवश्यक है ताकि टीके की दीर्घकालिक प्रभावशीलता सुनिश्चित की जा सके।

आगे की राह

  • टीकाकरण कवरेज बढ़ाना : सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि रोटावैक हर बच्चे तक पहुँचे, विशेष रूप से ग्रामीण इलाकों में।
  • जागरूकता अभियान : माता-पिता और समुदाय स्तर पर रोटावायरस से बचाव के लिए शिक्षा व प्रचार अभियान की जरूरत है।
  • निरंतर निगरानी : वैक्सीन की दीर्घकालिक प्रभावशीलता का अध्ययन जारी रखना होगा।
  • वैज्ञानिक अनुसंधान में निवेश : रोटावैक की सफलता भारत को प्रेरित करती है कि वह अपने संसाधनों से और अधिक बीमारियों के टीके विकसित करे।
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