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सर्दियों में तीन गुना तक बढ़ता कचरे का धुआँ: छोटे शहरों पर सबसे ज्यादा बोझ

संदर्भ  

  • भारत में सर्दी आते ही वायु प्रदूषण पर बहस तेज हो जाती है। वाहनों का धुआँ, उद्योगों का उत्सर्जन, निर्माण कार्य और पराली जलाने को लेकर खूब चर्चा होती है। लेकिन शहरों की गलियों, खाली प्लॉटों और कूड़े के ढेरों में सुलगती आग अक्सर नजरअंदाज कर दी जाती है। वर्ल्ड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (WRI) इंडिया के एक अध्ययन ने इसी उपेक्षित समस्या की गंभीरता सामने रखी है। इसके मुताबिक सर्दियों में खुले में कचरा जलाने की घटनाएँ, जलाए जाने वाले कचरे की मात्रा और उससे होने वाला उत्सर्जन गर्मियों की तुलना में तीन गुना तक बढ़ सकता है।
  • खुले में कचरा जलाना केवल गंदगी खत्म करने का एक गलत तरीका नहीं है। यह सीधे तौर पर वायु गुणवत्ता और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्या है। जब नगर निकायों की कचरा संग्रहण व्यवस्था नियमित नहीं होती, तो घरों, दुकानों और सड़कों के आसपास कचरा जमा होता रहता है। कई जगह लोग या अनौपचारिक कचरा श्रमिक इस कचरे को आग लगाकर नष्ट कर देते हैं। यह आग छोटी दिखाई दे सकती है, लेकिन इससे निकलने वाला धुआँ आसपास रहने वाले लोगों के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। 

कचरे की आग में क्या-क्या जलता है 

  • खुले में जलने वाले कचरे में केवल सूखा जैविक कचरा ही नहीं होता। प्लास्टिक, रबर, कपड़े, पैकेजिंग सामग्री और रासायनिक रूप से उपचारित वस्तुएँ भी इसमें शामिल हो सकती हैं। इनके जलने से PM2.5 और PM10 जैसे सूक्ष्म कणों के साथ कार्बन मोनोऑक्साइड, डाइऑक्सिन और फ्यूरान जैसे प्रदूषक निकलते हैं।
  • विशेष रूप से प्लास्टिक और रबर का जलना चिंता का विषय है, क्योंकि इससे जहरीले और कुछ मामलों में कैंसरकारी रसायन वातावरण में पहुँच सकते हैं। ये प्रदूषक हवा के साथ फैलने के बजाय अक्सर लोगों के आसपास ही मौजूद रहते हैं, क्योंकि कचरा घरों, सड़कों और बस्तियों के नजदीक जलाया जाता है। 
  • भारत में खुले में ठोस कचरा जलाना नियमों के तहत प्रतिबंधित है। सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स, 2016 के अनुसार घर-घर से कचरा एकत्र करना, उसे स्रोत पर अलग करना और उसका वैज्ञानिक तरीके से निपटान सुनिश्चित करना शहरी स्थानीय निकायों की जिम्मेदारी है।

सर्दियों में क्यों बढ़ती है समस्या 

  • डब्ल्यूआरआई इंडिया का अध्ययन 2019 से 2026 के बीच 11 प्रदूषित भारतीय शहरों में किए गए फील्ड सर्वे पर आधारित है। अध्ययन में शामिल शहरों के नाम सार्वजनिक नहीं किए गए हैं। इसके बावजूद इसके निष्कर्ष एक व्यापक चुनौती की ओर इशारा करते हैं।
  • सर्दियों में तापमान गिरने के साथ वातावरण में स्थिरता बढ़ती है। हवा की गति और प्रदूषकों के फैलाव की क्षमता कम होने के कारण धुआँ जमीन के करीब अधिक समय तक बना रह सकता है। ऐसे में कचरे के ढेर से उठने वाला धुआँ स्थानीय स्तर पर लोगों के लंबे समय तक संपर्क में रह सकता है।
  • यही वजह है कि सर्दियों में कचरा जलाने की छोटी-छोटी घटनाएँ भी स्वास्थ्य के लिहाज से अधिक महत्वपूर्ण हो जाती हैं।

बड़े महानगर ही नहीं, छोटे शहर भी चिंता का केंद्र 

  • अध्ययन की एक खास बात यह है कि खुले में कचरा जलाने की समस्या केवल बड़े महानगरों तक सीमित नहीं है। टियर-2 और टियर-3 शहरों में इसकी घटनाएँ अधिक पाई गईं।
  • सर्दियों में टियर-3 शहरों में औसतन 49.6 घटनाएँ प्रति वर्ग किलोमीटर प्रतिदिन दर्ज की गईं। टियर-2 शहरों में यह संख्या 46 और टियर-1 शहरों में 39.4 घटनाएँ रही। 
  • वहीं जलाए गए कचरे की कुल मात्रा के मामले में टियर-2 शहर आगे रहे। इससे एक महत्वपूर्ण तस्वीर सामने आती है—छोटे शहरों में कचरा जलाने की घटनाएँ अधिक बार हो सकती हैं, जबकि अपेक्षाकृत बड़े टियर-2 शहरों में कुल कचरे की मात्रा ज्यादा होने के कारण जलने वाला कचरा भी अधिक हो सकता है। 
  • यह स्थिति बताती है कि देश की वायु गुणवत्ता नीति को केवल दिल्ली, मुंबई जैसे बड़े महानगरों तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं होगा। छोटे और मध्यम शहरों में भी कचरा प्रबंधन और प्रदूषण निगरानी की क्षमता बढ़ानी होगी।

कुल प्रदूषण में हिस्सा कम, लेकिन खतरा बड़ा 

  • अध्ययन का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह भी है कि खुले में कचरा जलाने का योगदान शहर के कुल PM2.5 और PM10 उत्सर्जन में 1 प्रतिशत से भी कम था। पहली नजर में यह संख्या छोटी लग सकती है। लेकिन यहीं इस समस्या की वास्तविक चुनौती छिपी है।
  • शहर के कुल प्रदूषण का औसत किसी व्यक्ति के वास्तविक प्रदूषण संपर्क को नहीं बताता। यदि किसी घर के ठीक सामने या पास कचरा जल रहा है, तो उस परिवार को निकलने वाला जहरीला धुआँ सीधे सांस के साथ शरीर में प्रवेश कर सकता है।
  • इसलिए शहरव्यापी उत्सर्जन और स्थानीय प्रदूषण के संपर्क में अंतर समझना जरूरी है। किसी स्रोत का कुल प्रदूषण में योगदान कम हो सकता है, लेकिन स्थानीय स्तर पर उसका स्वास्थ्य प्रभाव काफी बड़ा हो सकता है। 

गरीब बस्तियों पर दोहरा बोझ 

  • डब्ल्यूआरआई अध्ययन सामाजिक असमानता की एक गंभीर तस्वीर भी सामने रखता है। कम आय वाले इलाकों में खुले में कचरा जलाने की घटनाएँ अधिक पाई गईं। टियर-2 शहरों के गरीब इलाकों में सर्दियों के दौरान सबसे अधिक दर करीब 84 घटनाएँ प्रति वर्ग किलोमीटर प्रतिदिन रही, जो टियर-2 शहरों के औसत 46 से काफी अधिक है। 
  • इसके पीछे सबसे बड़ा कारण नगर सेवाओं में असमानता माना गया है। जहाँ नियमित कचरा संग्रहण नहीं होता, वहाँ लोगों के सामने कचरा हटाने के विकल्प सीमित हो जाते हैं। नतीजा यह होता है कि जिन समुदायों को पहले ही बेहतर सार्वजनिक सेवाएँ नहीं मिलतीं, वही प्रदूषण का अतिरिक्त स्वास्थ्य बोझ भी उठाते हैं।

समाधान आग बुझाने से नहीं, व्यवस्था सुधारने से आएगा 

  • इस समस्या का समाधान केवल कचरा जलाने वालों पर जुर्माना लगाने से नहीं होगा। जरूरी है कि कचरा संग्रहण की व्यवस्था उन इलाकों तक पहुँचे जहाँ अभी सेवाएँ कमजोर हैं।
  • स्रोत पर कचरे का पृथक्करण मिश्रित कचरे को कम कर सकता है। पर्याप्त प्रसंस्करण और वैज्ञानिक निपटान क्षमता विकसित करनी होगी, ताकि संग्रहित कचरा ट्रांसफर प्वाइंट या सड़कों पर जमा न रहे। टियर-2 और टियर-3 शहरों में निगरानी व्यवस्था को मजबूत करना भी जरूरी है।
  • सर्दियों की वायु गुणवत्ता कार्ययोजनाओं में खुले में कचरा जलाने को एक अलग स्थानीय प्रदूषण स्रोत के रूप में शामिल किया जाना चाहिए। साथ ही अनौपचारिक कचरा श्रमिकों को सुरक्षा उपकरण और बेहतर कार्य परिस्थितियाँ उपलब्ध कराना जरूरी है, क्योंकि वे अक्सर कचरे और उसके धुएँ के सबसे सीधे संपर्क में रहते हैं। 
  • आखिरकार, कचरे की आग केवल धुआँ नहीं पैदा करती। वह यह भी बताती है कि किसी शहर की कचरा प्रबंधन व्यवस्था कहाँ विफल हो रही है। सर्दियों में जब हवा पहले ही प्रदूषकों को जमीन के करीब रोक रही हो, तब गलियों और बस्तियों में जलते कचरे को नजरअंदाज करना सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए महँगा साबित हो सकता है। इसलिए स्वच्छ हवा की लड़ाई में कचरे के ढेर को बुझाना उतना ही जरूरी है, जितना वाहनों और उद्योगों के उत्सर्जन को नियंत्रित करना। 
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